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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 68

घट रामायण / ७५
भया बिकल मुख नरक समाना। जठर अगिन तन तपन जराना॥
आजिज भया बिकल बहु भारी। अति दुख में रहा बिकल दुखारी॥
तब साहिब से अरज पुकारी। बदौंछोर मोहिं लेव उबारी॥
निस दिन बँदगी करों तुम्हारी। अब मोहिं काढ़ौ महा दुखारी॥
अब तोहिं नेक न बिसरौ साँईं। बार बार सुमिरौं चित लाई॥
दीन दुखी से मन नहिं लाऊँ। आठ पहर तुम्हरा गुन गाऊँ॥
अर्थ-उत्पत्ति की ही दशा में नारी योनि के भीतर ही उस ब्रह्म ने उसे मन दे दिया और इस मन ने
गर्भ के भीतर ही शिशु को पहचान लिया। उत्पत्ति का कारण वीर्य है-यह बात मन को भली अवश्य
लगती है॥
इसका वर्णन मैं बनाकर (व्यवस्थित करके) इस प्रकार कहता हूँ-और तभी (मेरी बात सुनने के
बाद ही) हृदय में सत्य का समावेश होगा अर्थात् बात समझ में आ पाएगी॥
गर्भ की बात को विचार करते हुए सुनो-वह माता-पिता के 'रज -वीर्य' के संभोग का फल है
किन्तु शिशु गर्भ में ऊर्ध्वमुखी उल्टा रहकर दुःखों को भोगता है-और वह कष्ट मुक्ति के लिए माँ के
उदर में किसे बुलावे? वह वहाँ नितान्त व्याकुल एवं नरक सदृश जीवन यापन करता है। वह वहाँ
जठराग्नि से उसकी शरीर की आग की तपन से तप्त रही है॥
अत्यधिक व्याकुल एवं आजिज होकर अत्यन्त पीड़ा में वह व्याकुल उस साहब (ब्रह्म) को आर्त
होकर पुकारता है कि इस जटिल बन्धन से मुक्त करने वाले प्रभु! (बन्दिछोर) मुझे उबार लें। मैं रात-
दिन तुम्हारी बन्दगी करता रहूँगा और अब उस महादुखारी को शीघ्र मुक्त कर दें॥ हे स्वामी! अब एक
क्षण के लिए आपको नहीं भूलूँगा और बार-बार चित्त लगाकर आपका स्मरण करूँगा। अब अपनी
दीनता से तथा अपने दुःख में मन न लगाकर, आठों प्रहर आपका ही गुणगान करता रहूँगा॥
॥सोरठा॥
इतना किया करार, जब गर्भ में बाहिर भया।
भूला सिरजनहार, तुलसी भौ जग जाल में॥
अर्थ-तुलसीसाहब कहते हैं कि जब वह गर्भ से बाहर आता है, तब उसने जितनी प्रतिज्ञा कर रखी
भवजाल में फँसकर उस बनाने वाले प्रभु को वह भूल गया॥
॥चौपाई॥
अब बाहिर का लागा रंगा। माता मोह पिता के संगा॥
लरिकाई लट पट जग खेला। तोतरि बात मात सँग बोला॥
भाई बंद सकल परिवारा। ठुमठुम पाँव चलै तेहि लारा॥
लरिकाई ऐसी विधि खोई। तरुन भये तरुनी सँग मोही॥
मन की मौज करै रस रंगा। भूला ज्ञान भया चित भंगा॥
अब साहिब की याद बिसारी। माया मोह बँधा संसारी॥
मद में मस्त कछू नहिं सूझै। साध संत को कछु न बूझै॥
खान पान निस दिन मद माता। कामिन संग रहै रँगराता॥
जिन यह घट का साज बनाया। ताहि बिसारि जगत मन लाया॥