घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८८ / घट रामायण
पचपन कोठा हिंडोला नामूँ। नारी नवो बसै तेहि ठामूँ॥
छप्पन कोठा निरधर नाऊँ। अठारा भार बसै तेहि ठाऊँ॥
सतावन कोठा कफादे नावाँ। जीव की मीच बसै तेहि ठावाँ ॥
अट्ठावन सुमेरबल नावाँ। मङ्गल पुरुष चरित्तर गावाँ ॥
उनसठ कोठा छैसुन्दर नाँमा। आतम रूप बसै तेहि ठामाँ ॥
साठ कोठा धौलाधर नाऊँ। तीनों लोक मही तेहि ठाऊँ ॥
इकसठ कोठा जैसुन्दर नामूँ। बलधर पुरुष बसै तेहि ठामूँ ॥
बासठ कोठा हीरापुर नामूँ। नीर चुवै झरि झरि तेहि ठामूँ ॥
त्रेसठ कोठा कलाकर नावाँ। चौंधा भवन बसै तेहि ठावाँ ॥
चौंसठ तिल बिक्रम कहलावै। जलथल कुम्भ बसै तेहि ठाँवै ॥
पैंसठ कोठा सुरतसर नामूँ। जप तप जज्ञ करै तेहि ठामूँ ॥
छासठ कोठा सिखरिचल नाऊँ। जोगी असंखन जोग कराऊँ ॥
सरसठ कोठा अनन्दी भाई। जहँवाँ काल बसन नहिं पाई ॥
अरसठ कोठा चितादे नाऊँ। चित का चक्र फिरै तेहि ठाऊँ ॥
उन्हत्तर कोठा सनीता नाऊँ। ज्ञानी बुद्ध बसै तेहि ठाऊँ ॥
सत्तर कोठा सलीका नाऊँ। सुन्न की धुन उठै तेहि ठाऊँ ॥
इखत्तर कोठा उदाधर नाईं। जहँ जग पालक बैठि रहाई ॥
बहत्तर कोठा गंजधर नाऊँ। करनी मूल बसै तेहि ठाऊँ ॥
कोठा बहत्तर कहेउ बखानी। ले लख भीतर जो पहिचानी ॥
यह घट देखि देखि सोइ भाखा। बूझि बूझि साधू मन राखा॥
रामायन घट कहि समझाई। काया भीतर कथि दरसाई ॥
काया खोज मुक्ति जब होई। बिन खोजे सब गये बिगोई ॥
काया भीतर सब की पूजा। सिव सनकादि आदि नहिं सूझा ॥
बाहिर कथि कथि रहे भुलाई। काया भीतर वस्तु न पाई ॥
कोठा बहत्तरि हम कहि दीन्हा। कोऊ न काया भीतर चीन्हा ॥
सास्तर संसकिरत में फूले। ऋषी मुनी जोगेसुर भूले ॥
या से राह घाट नहिं पाई। बहे कर्म भौजल के माई ॥
अर्थ-प्रथम कोठा उतेसुर के नाम का है-जहाँ ब्रह्मा बैठकर वेद पढ़ाते हैं। दूसरा कोठा धर्म गंध
है, जहाँ विष्णु बैठकर ज्ञानचर्चा सुनाते रहते हैं॥
तीसरा कोठा धनुधर है, जहाँ शंकर बैठ कर योग कराते रहते हैं। चौथा कोठा रक्तमणि कहा
गया है-जहाँ वरुण बैठकर राज्य करते रहते हैं ॥
पाँचवाँ कोठा 'हरिसंग्रह' है-उस स्थान पर आक सुमेर पर्वत हैं। 'विजय धुंध' छठाँ कोठा कहा
जाता है, मन की सम्पूर्ण कलाएँ उस स्थान की परिक्रमा करती रहती हैं॥