घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७० / घट रामायण
निरंकाल काल अस फाँदा, जीव जोति जग बाँधा हो।
आदि अनादि पंथ नहिं जानी, करि कुपंथ ठग ठानी हो॥३॥
तीरथ बरत नेम बिधि पाला, आस खानि फल डाला हो।
नर तन भटक भटक भटभेरा, बाँधा न भौजल बेड़ा हो॥४॥
तन सराय छूटत छिन माहीं, सेमरि सुवा पछिताई हो।
तुलसीदास चेत नर अंधा, परखि लखौ दुखदंदा हो॥५॥
अर्थ-जहाँ अग्नि तथा आकाश जल रहे हैं, उसके बीच एक कमल खिला हुआ है। दण्डी के ऊपर
कमल है, कमल पुष्प आकाश की नाड़ी है और उस पर 'रज' का विस्तार ब्रह्मा ने किया है॥१॥
उसी नाल ने शंकर का उद्धार किया है, संसार में विष्णु की विपत्ति को दूर किया है। तीनों ब्रह्मा,
विष्णु, महेश इन तीनों में मिलकर भी उस मर्म को नहीं समझा और वेद-पुराणों की रचना करते
रहे॥२॥
काल का पाश निरंकाल है (जिसका अनुमान सम्भव नहीं है) और यह जीव परमात्मा की ज्योति
में बँधा है। इन्होंने आदि-अनादि के ज्ञान मार्ग को नहीं जाना और कुपंथ तैयार करके जन समुदाय को
ठगने का निश्चय किया है॥३॥
तीर्थ, व्रत, नियम आदि विधियों को निर्दिष्ट किया तथा आशा की खानि का फल सबके सामने
डाल दिया। इन्होंने इस संसार के भौजल से मुक्ति की नौका न तैयार करके मनुष्य जाति के भटकने
का भटभेरा (सूखी लकड़ियों की बाँधकर अस्थिर नावें) बना दी॥४॥
तन रूपी यह विश्रामालय (सराय) क्षण में ही छूट जाता है, और सेमर फूल पर क्षुधित होते के
प्रहार से शुकगण जैसे निरन्तर पछताते रहते हैं। तुलसी साहब कहते हैं कि हे अंधे मनुष्य समझो-संसार
के दुःख द्वन्द्वों को परखकर मानव समाज के लिए मार्ग निर्धारित करो॥५॥
॥ चौपाई ॥
ये सब मन का भेद बताया। मन रचि कीन्हा खेल बनाया॥
धरती गगन चंद और सूरा। निरंकाल रच मन मत मूरा॥
सोइ मन अस बस विष रस माईं। भूला भरम खानि गति जाई॥
अर्थ-मैंने ये सारे मन के भेद बताए और मन ही का सारा रचा तथा बनाया हुआ खेल है। पृथ्वी,
आकाश, चन्द्रमा एवं सूर्य यह कालरहित मन की ही मूल रचना हैं। हे सखी! यही मन इस वासना रूप
विषय रस में बस जाता है। यह भ्रमवश अपनी मूलगति को भूल जाता है।
॥ सोरठा ॥
तुलसी तरक बिचार, सार पार गति ना लखै।
यह मन बिषम बिकार, ता की गति मति सब कही॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि अनेक तर्क तथा विचारों से सिद्ध है कि इस मन की गति का पार
नहीं दिखाई पड़ता, यह मन ही समस्त विषम (कष्टदायी) विकारों का कारण है, उसके ज्ञान का
वर्णन मैंने अपनी मति के अनुसार पूरी तरह से किया है।
॥ छन्द ॥
तुलसी मति न्यारी कहत बिचारी। जगत भिखारी जाल मई।
सुर नर मुनि नाचे कोंइ न बाचे। आदि अंत सब छार छई॥१॥