घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२ / घट रामायण
॥ चौपाई ॥
आगे अगम लोक गति गाऊँ। सत्त नाम सत धाम लखाऊँ॥
जब नहिं निराकार और जोती। आदि अंत कछहू नहिं होती ॥
जब दयाल सत साहिब दाता। जब की सुनौ सकल बिख्याता ॥
मैं अजान कछु मरम न जानों। संत कृपा सत साखि बखानों॥
सतगुरु संध संत दरसाई। उन रज कही महूँ पुनि गाई ॥
मैं बुधिहीन अचीन्ह अनारी। कीन्ही कृपा सुरति मतवारी ॥
अर्थ—आगे मैं अगम्य लोक में चल रहा हूँ और 'सत्यनाम' से ढंका सत्यधाम को दिखाऊँगा
(वर्णन करूँगा)। जब न निरंकार ब्रह्म था, न ज्योति थी, और कहीं भी 'आदि-अन्त' का क्रम नहीं
व्यवस्थित हुआ था॥
तब दयालु, स्वामी एवं सबका दाता ब्रह्म ही था और उस समय की सारी प्रसिद्ध बातें सुनो। मैं
अज्ञानी कोई रहस्य नहीं जानता था—संत की कृपा है, यह मैं सत्य की साक्षी देकर कहता हूँ।
सतगुरु के समुद्र को सन्तों ने ही दिखाया, उनके चरणरजों ने बताया और उसी की कृपा से मैंने भी
कुछ गाया मैं बुद्धिहीन, अपरिचित तथा अनाड़ी मुझपर गुरुओं ने ही मतवाली सुरति भरी कृपा की है॥
॥ सोरठा ॥
तुलसी मनहिं बिचारि, संत अंत गति लखि परी।
भाख्यों सरनि सिहार, सार पार जस जस भई॥
सत्त लोक सत नाम, और अनाम आगे कही।
सबहि संत ब्रत मान, मैं निकाम सरनै लई॥
अर्थ—तुलसी साहब कहते हैं कि मन में विचार करके देखो, सन्त की भी अन्तगति दिखाई पड़ी है—
उस परम तत्त्व के पार जैसे-जैसे होने लगा—मैंने उस परमात्मा की शरण में समर्पित होकर वर्णन किया॥
सत्य लोक का सत्य नाम है और जो कुछ भी अनाम है, उसे अब आगे कह रहा हूँ, सभी सन्तों के
व्रत को स्वीकार करता हुआ, मैं निष्काम उसकी शरण में समर्पित हुआ॥
॥ चौपाई ॥
अब कहूँ आदि अगाध अनामी। ताकी गति मति संत बखानी॥
जो कुछ सत्त सीत उन केरी। महूँ पाइ मति निरखि निबेरी॥
तुलसी जब जोड़ जस जस भाखा। आदौ बिरछ पेड़ पर साखा॥
पिरथम पुरुष अनाम अकाया। जास हिलोर भई सत माया॥
माया नाम भया इक ठौरा। सत मत नाम बँधा इक डोरा ॥
सत्त लोक सत साहिब साँई। सत्त मिले सत नाम कहाई॥
चौथा पद संतन सोइ भाखा। सो सत नाम कीन्ह अभिलाखा ॥
सत्तनाम से निरगुन आया। ता को बेद ब्रह्म बतलाया ॥
ता की अब मैं कहों लखाई। त्रिकुटी रावन ब्रह्म कहाई ॥
माया कुमति ब्रह्म इक ठौरा। भया राम मन चहुँ दिखि दौरा ॥