घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंघट रामायण / ७२
मैंने उन्हें अपने नेत्रों से देखा है। अब मैं इसकी दृश्य रचना ( लखाई ) के बारे में कहता हूँ, जो घट के
भीतर मुझे दिखाई पड़ा है ॥
मैं तो निष्काम ब्रह्म ( गुरु ) का शिष्य हूँ। जिधर-जिधर विचार करके देखता हूँ, यह संसार अंधा ही
दिखाई पड़ता है। मेरी सच्ची बात कोई नहीं मानता है और वह पुनः पुनः भवसागर में कर्मबन्धन की
बेड़ी में फँसता जाता है ॥
भिन्न-भिन्न सम्प्रदाय के सन्तों को मैंने बुलाया, और उन्हें समझाया ) किन्तु किसी के हृदय में ज्ञान
नहीं आया। स्वयं कागभुशुण्डि ने ऐसा बताया है कि पिंड में ही सुरति ने ज्ञान का सैल ( आश्रय ) बना
रखा है॥
कागभुशुंडि कोई नहीं हुआ था। स्वयं तुलसी ने इस शरीर को सुरति ज्ञान का विश्राम गृह बताया है।
कागभुशुण्डि श्रीराम की काया के मध्य गया और वह श्रीराम के मुख द्वारा प्रविष्ट हुआ था ॥
उसके ज्ञान और उसकी बुद्धि को तुलसी ने समझा था और उसका वर्णन रामायण में किया है। इस
माया संसक्त जीव को अन्त में ले जाकर यह सब ( पिंड में ब्रह्मांड रहस्य ) घट के भीतर ही कहकर
बताया है॥
सुमित्रा, कैकेई एवं कौसल्या ये सभी इस पिंड के भीतर मिली हैं। जो सीता, दशरथ तथा राम कहे
गए हैं, ये सभी घट के भीतर दिखाए गए हैं ॥
सरयू नदी और सुरति रूपी अयोध्या के दसों दरवाजे, मैंने सभी को घट के भीतर निहार कर देख
लिया है। कुंभकर्ण एवं लंका के स्वामी रावण ब्रह्म के पास त्रिकुटी में निवास करते हैं॥
हमने जिसे रावण कहा है वह त्रिकुटी रूपी लंका में स्थित ब्रह्म है। मंदोदरी तथा रावण का भाई
विभीषण, पुत्र मेघनाद सभी इसी त्रिकुटी में हैं ॥
मैं यह सब संवाद घट के बीच का कहता हूँ। रामायण तो घट के मध्य की कथा की ही बनी है।
यदि कोई व्यक्ति अंधा है तो वह इसे न स्वीकार करे और न स्वीकार करने के कारण पुनः नरक में
पड़ेगा ॥
सन्तों की गति कोई नहीं जानता। वे इसी पिंड में ही ब्रह्मांड बखानते हैं। उनके ज्ञान और उनकी
बुद्धि को कोई नहीं जानता क्योंकि बिना सत्संग के यह नहीं पहचाना जा सकता ॥
जब प्रभु की कृपा होती है तभी अदृष्ट ( अंधे ) को सब कुछ दिखाई पड़ने लगता है। तभी कोई
साधक इस पिंड में ब्रह्मांड एवं सुरति शैल पा लेता है क्योंकि तभी ( पाने के क्षण ही ) सत्गुरु की कृपा
होती है ॥
अब मैं ब्रह्मांड के दृश्य का वर्णन करता हूँ जो किसी-किसी विरले संत को दिखाई पड़ता है। ये
सन्त अन्तरात्मा में लीन हो जाते हैं, इन्हीं सन्तों पर विश्वास होता है॥
जिन्होंने घट की सुरति शैल पर विश्रामालय बना लिया है, उनके ज्ञान तथा उनकी मति की पहचान
बिरले ही करते हैं। अब मैं घट में सुरति के शैल को दिखाकर अपनी चिन्तनगत दृढ़ता को स्पष्ट करता हूँ।
राम और रावण घट के भीतर सभी परिवार के रूप में हैं और उन्होंने इस घट के भीतर ही उनको
चुन-चुन कर मारा है और रावण की भांति इसी घट में ही अनेक उत्पाती राक्षस हुए हैं (और वे भी मारे
गए हैं) ॥
हमारे इस सत्य मत को जिसने सत्य माना है, उनका इस लोक में आवागमन समाप्त हो उठा है। इस
तथ्य में जो व्यक्ति भ्रम उत्पन्न करता है, वह बार-बार नरक की चारों योनियों में पड़ता है॥
मैंने उसे इस प्रकार स्वयं देखा है, और उन्हें मैंने सन्तों की कृपा से जाना भी है। अब इस पिंड तथा
ब्रह्मांड का वर्णन वही-वही करता है-जिसको अपने नेत्रों से देख लिया है॥
॥ दोहा ॥
पिंड सैल ब्रह्माण्ड की, जस जस गति मति मोर।
जो सत मत संतन कही, देखा घट गढ़ तोर॥