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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 75

८२ / घट रामायण
१६. सुरति की निरति साहब (परमात्मा के २६. गुनी का गुन षटदल कमल में है।
शब्द) में है। २७. राग का रस पुरुष के शब्द में है।
१७. सुमेर की जड़ नाग के कलेजे में है। २८. सुर का आकार शून्य में है।
१८. तिल भर हाड़ पाँच इन्द्रियों में है। २९. आकार का आदि अनाहत नाद में है।
१९. गगन का कलेजा राग के आकार में है। ३०. अन्त की समाधि ब्रह्मलोक (साहब के
२०. मन का मुख षट्दल कमल में है। लोक) में है।
२१. काम की आदि शिव (शंकर) की सुरति ३१. माया की ध्वनि चतुर्दल कमल में है।
में है। ३२. ध्वनि की शून्य वे ज्ञान के मूल में है।
२२. देही का नूर हरि के पास है। ३३. शून्य का शब्द निरन्तर में है।
२३. बदन का पिंजर पृथ्वी के भीतर है। ३४. ज्ञान का मूल नाम में है।
२४. शिव का ध्यान हरि के शब्द कमल में है।
२५. वेद का भेद चार दल कमल में है।
॥ सोरठा ॥
इतना देहु बताइ, जीव कहों समझाइ कै।
अगम निगम घर पाइ, तब तुलसी सब बिधि लखै॥
अर्थ-मैं जीवों को समझा कर कहता हूँ कि तुम इतने प्रश्नों का उत्तर दे दो। इस अगम्य एवं अज्ञेय
का घट पाकर तुम इसे भलीभाँति देखते, तुलसीदास कहते हैं कि (इस शरीर को) इन प्रश्नों के प्रकाश
में इसे भलीभाँति क्यों नहीं देखते?
॥ जवाब चौपाई ॥
आगे उलटा भेद बताऊँ। अगम निगम घट भेद सुनाऊँ॥
अब या का अरथंत सुनाऊँ। घट में टीका ठौर बताऊँ॥
जो कोई साध सैल घट कीन्हा। सुन करि अर्थ होइ लौ लीना॥
अर्थ-आगे अब मैं इसका उल्टा भेद बता रहा हूँ। इससे सम्बद्ध इसे अगम्य एवं अज्ञेय तत्त्व का मैं
भेद बताऊँगा। अब मैं इसका अर्थान्तर (प्रश्नों का अर्थ) सुनाता हूँ। इसी घट में इनका उचित निवास
तथा पहचान (टीका ठौर) बताता हूँ। जिस साधु ने इस पिंड (घट) में शैल (विश्रान्ति स्थली) कर ली
है-इसके अर्थ को सुनकर वही उसकी समाधि में लीन हो उठेगा॥
॥ दोहा ॥
ये अस्थान बताइया, साधू सुनौ बखान।
कहै तुलसी घट भीतरे, सूरति से पहिचान॥
अर्थ-मैंने वर्णन करके इन स्थानों के विषय में बतला दिया, हे साधु जन! इस वर्णन को सुनें।
तुलसी साहब कहते हैं कि इस शरीर के भीतर सुरति ज्ञान द्वारा इनकी पहचान करो।
॥ सोरठा ॥
रामायण घट सार सुरति शब्द में लखि परै।
गगन कँज कर बास ऊपर चढ़ि जिन देखिया॥
अर्थ-यह मेरी रामायण पिंड का निचोड़ तत्त्व है और इसे सुरति समाधि से ही देखा जा सकता है।
सुरति में स्थित कमल दल पर निवास करते हुए उसके ऊपर चढ़कर जिन्होंने इसे देखा है (वही इसके
प्रमाण हैं।)॥