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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 66

घट रामायण / ७३
पाँचौ इंद्री प्रकृति पचीसा। तीनि गुणन मिलि सरगुन ईसा॥
इन्द्री पिता भरत है भाई। गुन तन कुमति संग मन माहीं॥
इच्छ सँग रँग मन मति भूला। खस परा बंद भया अस्थूला॥
ता को सब जग राम बखाना। ईस कर्म मन भर्म भुलाना॥
निराकार मन भया अकारा। ज्योति मिली गुन तीनि पसारा॥
ब्रह्मा बिस्नु भये महादेवा। इनकी उतपति मन मत भेवा॥
सास्तर बेद संस्कृत बानी। ये सब मन मत गति उतपानी॥
दस औतार जगत जग माया। यह मन और अनेक उपाया॥
ऋषी मुनी जोगीसुर ज्ञानी। मन करता कर सब मिलि मानी॥
तीरथ बरत बेद ब्यौहारा। जग भूला मन जाल पसारा॥
जो से नाम भेद नहिं जानै। मनहिं राम को नाम बखानै॥
नाम गती है अगम अपारा। ब्रह्म राम दोउ पावैं न पारा॥
निरगुन ब्रह्म राम मन होई। नाम अगम गत अगत अघोई॥
ता का पटतर मन पर लावै। ता से नाम भेद नहिं पावै॥
अर्थ-अब मैं उस आदि अगाध एवं अनाम तत्त्व रूप ब्रह्म के ज्ञान का वर्णन संत मत के अनुसार
करता हूँ। जो कुछ सत्य है, वह उनका प्रभाव (सीत) है हमने भी उनका अलभ्य ज्ञान प्राप्त करके, उन्हें
देख करके (अनुभव करके) निराकरण (निबेरी) किया है।
तुलसी साहब कहते हैं कि जब जिसे जैसा वह समझ में आया उसने वैसा-वैसा वर्णन किया है-
आदि में उसे वृक्ष, पेड़, पत्ता, शाखाओं जैसा बताया है। वह प्रथम पुरुष (ब्रह्म) अनाम और अशरीर
है, जिसकी लहरों से सतमाया निर्मित हुई है॥
माया नाम से वह एक भावना में स्थित हुई और सत्यमत नाम भी एक डोरे में बँध गया।
सत्यलोक, स्वामी सत् साहब स्वामी सत से मिलने पर सतनाम से पुकारा जाने लगा॥
उसी को सन्तों ने चौथा पद (मुक्ति) के नाम से पुकारा है, वही सतनाम है, उसी की अभिलाषा
की जाती है। इस सतनाम से निर्गुण की उत्पत्ति हुई है-उसको वेद ने ब्रह्म बताया है॥
अब मैं उसका दृश्य वर्णन करता हूँ। त्रिकुटी रावण और ब्रह्म दोनों कही जाती है। यहाँ माया कुमति
है, ब्रह्म एक स्थान पर स्थित है-और यहीं राम रूपी मन का चारों दिशाओं में भ्रमण होता है॥
पाँच इन्द्रियाँ हैं, और उनकी पच्चीस प्रकृतियाँ हैं और उनमें तीन गुणों को मिलाकर सगुण ब्रह्म की
कल्पना की गई। इन्द्रियाँ पिता है, भरत भाई है। गुण और कुमति दोनों शरीर में साथ-साथ हैं॥
इच्छा की संगवासना से मन मति के साथ वास्तविकता को भूल गया। जैसे, खस के टटरे पर बूँद
फैलकर स्थूल हो उठती है। उसी को सभी 'राम' कहकर बखानते हैं। यह मन भ्रम वश ब्रह्म के धर्म
(कर्म) को भूल जाता है॥
सगुण के रूप में निराकर मन साकार हो उठता है-वह ज्योति तत्त्व (ब्रह्म) इन तीनों गुणों (रज,
सत्त्व, तम) में फैलकर मिल जाता है, तब उनसे ब्रह्म, विष्णु एवं शिव बनते हैं, उनकी उत्पत्ति के विषय
में विद्वानों के मन में मतभेद हैं॥
शास्त्र वेद तथा संस्कृत भाषा में सब मन एवं मतों की गतियों से उत्पन्न हैं। ब्रह्म के दसों अवतार
संसार एवं सृष्टि में मायावत् है यह मन पृथक् है और ये सभी इसके उपाय हैं॥