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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 73

८० / घट रामायण
अर्थ-पिंड ही ब्रह्मांड का पर्वत शिखर है, जैसी कि मेरी समझ है, सत्य के मत का जो वर्णन सन्तों
: किया है, उसे इस घट के अन्दर मैंने देखा है॥
॥ छन्द ॥
गाया घट लेखा अगम अलेखा। जिन जिन देखा सार सही॥
महुँ पुनि भाखी देखा आँखी। सूरति धसि दस द्वार गई॥ १॥
संतन जोइ गाई महुँ पुनि पाई। आदि अंत गति कहनि कही॥
जो जो घट माहीं सब दरसाई। जो रचना ब्रह्मांड मई॥ २॥
जिन जिन निज जानी देख बखानी। जिन नहिं मानी भर्म सही॥
पंडित गति ज्ञानी भर्म भुलानी। भेष भेद भौ माहिं कही॥ ३॥
छत्री और ब्राह्मन बैस अपावन। सूद्र मती छर छार भई॥
का को गोहराई आदि न पाई। तुलसी सब देखा भर्म मई॥ ४॥
अर्थ-मैंने यहाँ अगम तथा न दिखाई पड़ने वाले अलक्ष्य घट के प्रकरण (लेखा) का वर्णन किया।
जिन-जिन महात्माओं ने उसे देखा है (अनुभव किया है) वही उसका सही निचोड़ है। मैंने उसका पुनः
आँखों से देखकर वर्णन किया है, और मेरी सुरति (ज्ञान) दसों द्वारों में प्रविष्ट होकर वहाँ पहुंची
हैं॥ १॥
जिसे सन्तों ने गाया है (बताया है, वर्णन किया है) मैंने भी उसी को प्राप्त किया है और उसकी
आदि अन्त का उस रूप में वर्णन किया है। जो-जो घट के अन्तर्गत है, मैंने सबके विषय में बताया है,
यह सारी रचना ब्रह्मांडमयी है॥ २॥
जिन-जिन ने इसे जाना है, उसको देखकर वर्णित किया है-जिन्होंने नहीं माना है, वह पूरी तरह से
भ्रम में हैं। पंडित तथा ज्ञानी (ज्ञान एवं पांडित्य के गर्वभ्रम में) अपने भ्रम में भुलाए रहे और ईश्वर के
वेष तथा भेद को संसार (सृष्टि) के अन्तर्गत बताया (ब्रह्मांड के अन्तर्गत नहीं) ॥ ३॥
क्षत्रिय तथा ब्राह्मण, वैश्य एवं शूद्र सभी की मति (ज्ञान) जलकर राख हो गई। इस मनुष्य समाज
में किसको बुलावें किन्तु वे इसके मूल रहस्य का ज्ञान नहीं प्राप्त कर रखा है, तुलसी साहब कहते हैं
कि सभी को मैंने भ्रम में पड़ा हुआ देखा है॥
॥ सोरठा ॥
ब्राह्मन अरु पुनि सूद्र, ये बूड़े सब उद्र को।
बैस्य बसा भौ बास, कस अकास डोरी गहै॥
अर्थ-ब्राह्मण तथा दलित ये सभी अपने पेट भरने में ही डूब गए। वैश्य का निकृष्ट स्थान पर
निवास हो उठा और शून्याकाश की डोर को ये तीनों किस प्रकार पकड़ सकते हैं सम्भव नहीं हैं॥
॥ चौपाई ॥
सब ये घट की सैल बखाना। पिंड माहिं ब्रह्मांड दिखाना॥
आगे घट का भेद बताई। अब जो सुनो कहों समझाई॥ १॥
तिल परमाने लगे कपाटा। मकर तार जहाँ जिव की बाटा॥
इतना भेद जानि जिन कोई। तुलसीदास साध है सोई॥ २॥
आगे अदबुद ज्ञान अपारा। पिरथम घट का कहों बिचारा॥