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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 70

घट रामायण / ७७
अर्थ—इस परमात्मा को संसार इस प्रकार भूलकर यम के द्वारा दिये हुए कष्टों को सहता रहता है।
धर्मराज (यम) उसे नाना प्रकार के संकट देते रहते हैं॥
वह अपना नाम भी नहीं जानता और बराबर पछताता रहता है और वह प्रतिदिन काल की मार सहता रहता है।
हे मनुष्यों! इससे तो अब होश में आओ (अज्ञान को छोड़ो), मानव शरीर की यह दुर्गति होती है,
जबकि वही जाति है (जो ऋषि आदि की है)। तुलसी साहब सत्य कहते हैं। यम की यातना से कोई
नहीं बच पाता। अतः समझो कि बिना सत्संगति के इस भवसागर से उद्धार सम्भव नहीं है॥
॥ सोरठा ॥
काया रचन विचार, जाही से ये जग भया।
सो विधि कहौं सँवार, बूझै जो जिन घट लखा॥
अर्थ—इस शरीर रचना पर तो जरा विचार करो, इसी से यह संसार उत्पन्न हुआ है, मैं अत्यन्त
सँवार-सजाकर विधिपूर्वक उसका वर्णन करूँगा जिससे कि वह जिसने पिंड के भीतर परमात्मा का
अनुभव किया है, वह भलीभाँति उसे समझे॥
॥ चौपाई ॥
निःनामी निःअच्छर भाखों। अब निज सुरति नाम से राखौं॥
ता से जीव होइ निरवारा। भवसागर से उतरै पारा॥
संत कृपा सत संगति होई। सतगुरु मिलि होइ नाम सनेही॥
अब मैं कहों आदि गति न्यारी। घट देखै सो लेइ बिचारी॥
सब गति भिन्न-भिन्न कहों भाखा। जानै जीव मिटै अभिलाखा॥
पिंड माहिं ब्रह्मांड बताऊँ। भिन्न भिन्न ता को दरसाऊँ॥
जो बाहिर सोइ पिंड दिखाई। देखा जाइ पिंड के माहीं॥
तुलसी ताहि पाइ धसि देखा। घट भीतर भिनि भिन्न बिबेका॥
जस जस संत कहा घट लेखा। तस तस तुलसी नैनन देखा॥
अब मैं या की कहों लखाई। जो घट भीतर दीन्ह दिखाई॥
तुलसि निकाम संत कर बंदा। जित जित जोओं जग सब अंधा॥
कोइ न मानै बात सत मेरी। फिरि फिरि कर्म बँधै भौ बेरी॥
भिन्न भिन्न संतन गोहरावा। काहू हिरदे चेत न आवा॥
घट में सुरति सैल जस कीन्हा। कागभसुण्ड भाखि तस दीन्हा॥
कागभसुण्ड कितहुँ नहिं भयेऊ। तुलसी सुरति सैल तन कहेऊ॥
कागभसुण्ड काया के माहीं। राम रमा मुख पैठा जाई॥
तुलसी ता की गति मति जानी। रामायन में कीन्ह बखानी॥
यह सब घट में भाखि सुनाई। अंधे जिव अंतै लै जाई॥
भरत छत्रगुन लछिमन भाई। यह घट माहिं कहेउ समझाई॥
सुमिंतरा केकई कौसिल्या। ये तन भीतर घट में मिलिया॥