घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६ / घट रामायण
यह जग झूठॅं सराय बसेरा। भोर गये उठि सूना डेरा॥
ऐसे या जग का ब्योहारा। जनम जुवा जस बाजी हारा॥
नेक न साहिब से मन लाया। बिरध भया तब अति दुख पाया॥
ऐसे सकल जनम गयो बीती। नेक न जानी साहिब रीती॥
अंत समय जम आनि सतावा। मुसकिल कष्ट महा दुख पावा॥
मार परै जब कौन बचावै। कठिन काल बिकराल सतावै॥
अर्थ-अब उसे बाहर का प्रभाव लगा और वह पिता के साथ मोह में पागल (माता) रो उठा।
बाल्यावस्था में वह लटपटाता हुआ संसार में खेला तथा अपनी तोतली बातों में माता से बोलता रहा।
भाई, बंधु एवं समस्त परिवार के बीच वह ठुमक-ठुमक चला तथा सभी ने उसे प्यार किया।
बाल्यावस्था को उसने इस प्रकार नष्ट कर दिया। और युवक होने पर तरुणियों के साथ मुग्ध हो उठा।
इस युवावस्था में मन की मौज में आनन्द की गंगा में बहता रहा, आत्मबोध नष्ट हो उठा और चित्त
माया में लिप्त होने के कारण भूल ज्ञान से टूट गया। वह अब परमात्मा का याद भूल गया तथा माया
के मोह में बँध कर संसारी हो उठा।
वह अपने अहम् भाव में मस्त था तथा उसे कुछ सुझाई नहीं पड़ता था। साधुओं तथा सन्तों को वह
कुछ नहीं समझता था। रात-दिन वह खान पान के मद में मस्त रहता था और कामिनियों के साथ नाना
प्रकार की विलास क्रीड़ाओं में मस्त रहता था।
जिसने इस शरीर की रचना करके सुन्दर स्वरूप प्रदान किया है तुम्हें भूलकर वह सांसारिक प्रपंचों
में मन लगा लिया। वह संसार असत्य है सराय के बसेरे की तरह (आज है, कल नहीं), सबेरा होने पर
समस्त डेरा सूना हो उठता है।
इस संसार का मिथ्यात्मक व्यवहार ऐसा ही है, जन्म रूपी जुआ में बाजी हारने जैसा, यहाँ का सारा
कार्य है। अपने स्वामी ईश्वर से नेक काम भी मन नहीं लगाया और जब वृद्ध हुआ तो अत्यधिक दुःख
प्राप्त हुआ।
अन्तिम समय में जम यातनाएँ मिलने लगेंगी तो कौन बचा सकता है और उस समय तो विकराल
(भयंकर) कष्ट के कारण अत्यन्त दुःख प्राप्त किया॥
जब मनुष्य के ऊपर समय की मार पड़ने लगती है तो उसे कौन बचा सकता है। उस समय भयंकर
काल विकराल रूप में कष्ट देता है।
॥ दोहा ॥
ऐसा नर तन पाइ के बादइ जनम गँवाई।
सो अस अंधा जग भया परै नरक में जाइ॥
अर्थ-इस प्रकार का श्रेष्ठ मनुष्य शरीर प्राप्त करके व्यक्ति व्यर्थ ही अपना जीवन नष्ट करता है।
इसी के फलस्वरूप यह संसार अंधा हो उठा फलस्वरूप बाद में जाकर नरक में जा पड़ता है॥
॥ छन्द ॥
ऐसा जग भूला सहै जम सूला। धर्मराय तन त्रास दई॥
निज नाम न जाना बहु पछिताना। जिन नित काल को मार सही॥
ता से नर चेतौ छांड़ि अचेतौ। नर तन गति ये जाति बही॥
तुलसी कही साची कोउ न बाची। बिन सतसंगति पार नहीं॥