घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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॥ चौपाई ॥
अब उनके अस्थान बताऊँ। भिनि भिनि ग्रंथन में समझाऊँ ॥
अर्थ-अब उनका स्थान मैं बताता हूँ तथा यह भिन्न-भिन्न ग्रंथों से लेकर समझाता हूँ॥
॥ कोठों के नाम ॥
कोठा प्रथम उतेसुर नाईं। बैठे ब्रह्मा बेद पढ़ाई॥
दूसर धरम-गंध दरसाई। बैठे बिस्नू ज्ञान सुनाई॥
तीसर कोठा धुन-धर भाई। बैठे संकर जोग कराई॥
चौथा कोठा रक्तमनि गाई। बरुन बैठि जहँ राज कराई॥
हरि संग्रह पचम बतलाऊँ। आठ सुमेर बसैं तहि ठाऊँ॥
बिजै-धुंध षष्टम कहलाई। मन की कला फिरै तेहिं ठाईं॥
कोठा सतवाँ नगरा नाऊँ। अन्नदेव बैठे तेहि ठाऊँ॥
कोठा अठवाँ रुकमन ताला। जहाँ बैठे मदन गोपाला॥
नौवाँ कोठा गौड़ मन माली। दुरमति माया करै बिहाली॥
दसवाँ कोठा उघडू नावाँ। सहस कोटि ऊगैं तेहि ठावाँ ॥
करभौनी एकादस नाऊँ। तीनि लोक में जोति समाऊँ॥
द्वादस कोठा बिषमदे गावा। सुर नर मुनि जहँ ध्यान लगावा॥
कोठा त्रयोदस मलदू द्वारे। जोगिनि चौंसठ लाख निहारे॥
चौधा कोठा गगनधर नाऊँ। लच्छ अलच्छ बैठि तेहि ठाऊँ॥
हमसुन्दर पन्द्रा कर नावाँ। बास सुगंध बसै तेहि ठावाँ ॥
कोठा सोला अतिसुर नाऊँ। पाँच बजार बसै तेहि ठाऊँ॥
कोठा सत्रा सिषरचल नाऊँ। अठरा गंडा नदी तेहि ठाऊँ॥
अठरा कोठा कड़ेसुर नाऊँ। जीव को तेज बसै तेहि ठाऊँ॥
कोठा उनीस बंकचल नाऊँ। मुरली सुहावन बजै तेहि ठाऊँ॥
बिसवाँ कोठा कुलँग कहाई। सुकृत बाजा बजै सुहाई॥
इकइस कोठा भानसुर नाऊँ। अलख निरंजन है तेहि ठाऊँ॥
बाइस कोठा धुँधेसुर नाऊँ। मन को ध्यान बसै तेहि ठाऊँ॥
तेइस कोठा तरंगी ताला। बिछई जे जग में जमजाला॥
चौबिस कोठा कंठसुर नाऊँ। सुमति बिचार बसै तेहि ठाऊँ॥
पच्चिस कोठा प्रकृति१ नाऊँ। मल को पती बसै तेहि ठाऊँ॥
छब्बिस कोठा मुदापल नाऊँ। पवन प्रधान बसै तेहि ठाऊँ॥
१. मुं० दे० प्र० के पाठ में 'परकुटी' है।