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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 64

घट रामायण / ७१
संतन सोइ जाने सुरति समाने। जिन वा घर की राह लई।
मैं उनका चेरा किया निबेरा। सुरति सैल अज अधर गई ॥ २ ॥
मन की गति पाई सुरति छुड़ाई। रामायन घट माहिं कही।
ले लेख अलेखा सब बिधि देखा। संत चरन सत सार सही ॥ ३ ॥
चीन्हा वह द्वारा सुरति सम्हारा। नैन निहारा पार गई।
तुलसी बिधि गाई सबै सुनाई। संत सहाई राह दई ॥ ४ ॥
कुंजी अरु तारा खोल किवारा। निरखि निहारा सूर भई।
जाना सत नामा अगम ठिकाना। लखि असमाना तिमर गई ॥ ५ ॥
तुलसी रस ज्ञाना माहिं बखाना। धसि असमाना अगम लई।
अर्थ—इस मन की मति, तुलसी साहब कहते हैं, कि बड़ी विलक्षण है और मैं इसे विचारपूर्वक
कहता हूँ कि सम्पूर्ण संसार भिखारी की जाल बन गया है। देवता, मुनि, मनुष्य इस मन के वश में होकर
नृत्य करते रहते हैं, इससे कोई बचा नहीं है और इसी मन के वशीभूत होने से मनुष्य का आदि अन्त सब
जलकर राख जैसा हो उठा है ॥ १ ॥
संत जन इस रहस्य को समझकर अपने मन को सुरति ध्यान (ज्ञान) में समाविष्ट कर लेते हैं और
वे उस घर (परमात्मा) की राह पकड़ लेते हैं। मैं तो उन सबका चेला हूँ। इन सबका निपटारा किया
है—और मेरा मन तो सुरति पर्वत पर स्थित अन्तरात्मा में समा गया है ॥ २ ॥
मैंने तो मन का ज्ञान प्राप्त कर लिया है और उसे सुरति ज्ञान की मायाशक्ति से छुड़ा लिया घट में
स्थित रामायण का गान किया है। उस अलेख लेख को लेकर उसे प्रत्येक प्रकार से देखा और यही
निष्कर्ष निकाला कि सन्तों का चरण ही सबका सार तत्त्व है ॥ ३ ॥
मैं सुरति सम्हालकर, वह द्वार पहचाना और अन्तर्नेत्रों से देखकर उस पार चला गया। तुलसी साहब
सभी को सुनाकर उसे विधिपूर्वक गाकर कहते हैं कि सन्तों ने ही रक्षक (सहाई) होकर मार्ग
दिया ॥ ४ ॥
कुंजी द्वारा ताला खोला, किवाड़ खोले, उस तत्त्व को निरखकर देखा और सिद्ध (सूर) हो उठा।
उस 'सत्यनाम' को समझा, उसके अगम्य ठिकाने को जाना, शून्याकाश को देखा और समस्त अंधकार
दूर हो गया ॥ ५ ॥
तुलसी साहब कहते हैं कि उस रस का अनुभव मैंने ज्ञान के बीच किया है और शून्याकाश में
प्रविष्ट होकर मैंने अगम्य (ब्रह्म) प्राप्त कर लिया ॥ ६ ॥
॥ सोरठा ॥
यह बिधि निरमल ज्ञान, सत मत सुरति लखाइया।
जब पाया वह ठाम, आदि अंत सोइ सुधि भई॥
कीन्हा ग्रंथ बनाइ, पाइ गाइ गति अस कही।
भई गुरन पद पार, सार पदम पद लखि रही॥
अर्थ—इस प्रकार सत्य मत के अन्तर्गत सुरति द्वारा निर्मल ज्ञान दिखाया और मुझे जब वह स्थान
प्राप्त हो उठा तो मेरे आदि और अन्त की सुधि उस परमात्मा ने ली ॥
मैंने ग्रन्थ रचकर उस गति को पाकर और उसे गाकर इस प्रकार कहा है। गुरु की कृपा से उस पद
को पार कर लिया। उस पद कमल के सार तत्त्व को देखकर मैंने इसे प्रकार बताया है ॥