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घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 76

घट रामायण / ८३
॥ चौपाई ॥
अब सुनियौ ब्रह्मंडी लेखा। कोटिन परलै घट बिच देखा॥
भीतर गुफा एक जो कीन्हा। कोटि प्रलै उबार जिव लीन्हा१॥
सब्द निरंतर सत है भाई। गहै जीव पहुँचे जब जाई॥
घट का मथन सुरति से१ साधै। बा को काल कभी नहिं बाँधै॥
कोटिन सूर ब्रह्मांड के माहीं। कोटिन कोटि देखि सब ठाहीं॥
घट बिचार घट ही के माहीं। ता में ब्रह्मा बिस्नु रहाई॥
सिव संकर सब घट में फंदा। घट में नदी अठारा गंडा॥
घट में देखे सात समुन्दर। जिन से जल पहुँचे नभ अंदर॥
घट में तीरथ बरत मँझारी। घट में देखा कृष्न मुरारी॥
घट में जोधा सामन्त होई। घट में राजा परजा सोई॥
घट में हिंदू तुर्क दोइ जाती। घट में कुला कर्म की पाती॥
घट में नेम दया अरु धर्मा। घट में पाप पुन्य बहु कर्मा॥
घट में डंड बंध दोउ भाई। जो कछु बाहिर सो घट माई॥
घट में बास बसन जग लागा। घट में कामिनि खेलै फागा॥
घट में षट पलास सोइ फूला। घट में लोग प्रजा झकझूला॥
घट में स्वर्ग नर्क हैं दोई। घट में जनम मरन पुनि होई॥
घट में कथा पुरान सुनावै। घट में माया करम करावै॥
घट में चोरी चोर अपारा। घट में करता सिरजनहारा॥
घट में राजा राज कराई। घट में चौकी पहरा भाई॥
घट ही में सब न्याव चुकावै। घट में रागी तान सुनावै॥
घट में नाच कूद रे भाई। घट में राग अलाप सुनाई॥
घट में साह महाजन होई। घट में सब्द सुन्न है सोई॥
घट में राजा है बलि बावन। घट में सीता रघुपति रावन॥
घट में लंका सा गढ़ भाई। घट में छानवे मेघा छाई॥
घट में बैठे पाँचौ नादा। घट में लागी सहज समाधा॥
ऊँच नीच परबत झक झाई। निस दिन झरना बहत रहाई॥
मगरमच्छ घट माहिं मँझारा। घट में बस्ती और उजारा॥
घट में सुकदेव ब्यास अरु नारद। घट में ऋषी मुनी अरु सारद॥
घट में राजा बरन कुबेरू। घट में माँडे आठ समेरू॥
१. मुं० दे० प्र० की पुस्तक में दूसरी चौपाई इस तरह है—''भीतर गुफा एक है भाई। उबरे जीव पार जब
जाई''; और चौथी चौपाई में 'सुरति से' की जगह 'जीव कोइ' है।