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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

पृष्ठ 67, कुल 150 में से

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पृष्ठ 67

७४ / घट रामायण
ऋषि, मुनि, योगेश्वर एवं ज्ञानी, सबने मिलकर कर्त्तारूप मन को स्वीकार किया है, तीर्थ, व्रत,
देव व्यवहार-इन सबका जाल मन ने फैला दिया और उसी में संसार भूल गया ॥
जिससे नाम भेद समझ में न आए, और मन निरन्तर राम का बखान ही करता रहे-यही नाम उस
अगम-अपार ब्रह्म की गति है और ब्रह्म तथा राम दोनों उसको पाने में असमर्थ हैं ॥
निर्गुण ब्रह्म के मन राम हैं, और वह नाम अगम्य एवं गत एवं अगत (ज्ञात तथा अज्ञात) एवं
सम्पूर्ण (अघौड़) है। उस ब्रह्म के समानान्तर इस ब्रह्म को लाने की चेष्टा में लोग रत हैं। अतः वे इसके
कारण नाम का रहस्य नहीं समझ पाते ॥
॥ दोहा ॥
यहिं विधि आदि अनादि, लखा भेद भिनि भिनि कहयौ।
सुत निःनाम अधार, जाना जिन अन्दर कहयौ ॥
अर्थ-इस प्रकार, वह आदि एवं अनादि ब्रह्म है, मैंने उसके भेदों को देखकर भिन्न-भिन्न रूपों में
बताया है। वह केवल शब्दों से सुना जाता है, निष्काम है तथा सृष्टि का आधार है। उसको वही जानता
है, जिन्होंने अन्तरात्मा को बताया है, या समझा है ॥
॥ छन्द ॥
है निःनामी अकथ अनामी। दस दिसि लसि सर सैल कही।
भाखा सतनामा ब्रह्म अकामा। माया मिलि मन जार लई ॥ १॥
काया अस्थूला मन सहै सूला। इंद्री बस भौं खानि मई।
काया गति धारी कर्म बिचारी। भूल भटक भौ भार सही ॥ २ ॥
अर्थ-वह निष्काम है, अकथ है, अनाम है, दसों दिशाओं में सरोवर तथा पर्वत आदि पर उसे
शोभित बताया जाता है। मैंने उस निष्काम ब्रह्म को 'सत्यनाम' के रूप में बताया है, माया में मिलकर
वह मन रूपी जाल को भ्रमित कर देता है ॥ १ ॥
स्थूल शरीर में मन नाना प्रकार के कष्टों को सहता है, और वह भव की खानि इन्द्रिय के वश में
होकर शरीर से संचालित कर्म जगत के साथ निर्वाह करने लगता है और इस प्रकार यह (मन) भूलता
भटकता हुआ भवसागर का भार सहता रहता है ॥ २ ॥
॥ सोरठा ॥
काया रचन बिचार, जाही से ये जग भया।
सो बिधि कहौं सँवार, बूझै जो जिन घट लखा ॥
अर्थ-शरीर की रचना का सत्य यही है कि इसी से यह सृष्टि हुई है। इसका वर्णन मैंने इस विधि से
सँवार कर कहा है-इसे वही बूझेगा, जिसने इस घट का मर्म समझा है।
॥ चौपाई ॥
उतपति जोनि खानि मन दीन्हा। गर्भ भीतर बालक को चीन्हा ॥
उतपति कारज बीरज डौठा। यह मन बात लागि मद मीठा ॥
यह कर लेखा कहों बनाई। तब जग हिरदे सत्त समाई ॥
सुनौ गर्भ की बात बिचारा। मात पिता रज बीर्ज सँवारा ॥
उलटा उरधमुखी दुख पावै। तन भीतर काको गोहराबै ॥