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घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

घट रामायण / १२७
ऐसी किस वस्तु को बताऊँ (समझ में नहीं आती)। सन्तों के व्यवहार का मैं कैसे-कैसे वर्णन करूँ
ऐसी वस्तु किसी स्थान पर कहीं भी नहीं दिखाई पड़ती॥
॥ छन्द ॥
मोरी मति नीची माहुर सींची। संत चरन के लार भई॥
करमन कर मैली बिष रस पेली। संत चरन चित जाइ बसी॥ १॥
मति महा अति रंका मन निः संका। बिष रस कस की धार मई॥
कहँ लग गोहराऊँ अंत न पाऊँ। संत चरन की लार लसी॥ २॥
दरसन पाये करम नसाये। पाप पुन्य सब छार भई॥
मोहिं निरमल कीन्हा दयानिधि चीन्हा। ऐसे सिंध दरियाव मई॥ ३॥
तिनकी रज पावन तुलसी अपावन। मो से अधम को धाम दई॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि मेरी बुद्धि निकृष्ट है और वह विष से सींची हुई है और वह सन्तों
के चरणों में संसक्त (लार) हो उठी है। कर्मवासनाओं से मैली तथा विषय वासनाओं से रौंदी हुई संतों
के चरणों में अत्यन्त प्रेमपूर्वक जाकर बसगई है॥ १॥
मेरा यह निःशंकित मन अत्यन्त रंक है और विषय वासनाओं के रस में फँसी हुई धारामयी है। कहाँ
तक उसको बुलाऊँ (बुलाकर सुधारूँ) इसका अन्त नहीं मिलता-मेरी संसक्ति तो संतचरणों में लग
चुकी है॥ २॥
संतों का मुझे दर्शन मिला, कर्म जाल नष्ट हो चला और पाप-पुण्य सब जलकर राखमय हो उठे॥
दयानिधि सन्त ने मुझे पहचाना और मुझे निर्मल बना दिया जैसे कोई समुद्र (संत) स्वयं नदीमय (मै
साधक) हो उठे, मेरी स्थिति जैसी हो रही॥ ३॥
तुलसी साहब कहते हैं कि सन्तों की पावन चरणरज ने मुझ जैसे अपवित्र को मुक्तिलोक प्रदान
किया॥
॥ सोरठा ॥
तुलसी नीच निहार, संत सरन न्यारा किया।
महुँ पुनि उतरौं पार, संत चरन रज धूरि धर॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि इस पापी को देखकर संतों की शरणागति ने इसे विलक्षण बना
दिया। (उनकी कृपा से) मैं पुनः उनकी चरण रज को सिर पर रखकर मैं इस भवसागर के उस पार
उतरा॥
॥ दोहा॥
तुलसी मन निरमल भयौ, सूरति सार सुधार॥
संत चरन किरपा भई, उतरौ भौजल पार॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि सुरति तत्त्व को सुधार कर मेरा मन निर्मल हो उठा है। सन्त के
चरणों की यह कृपा है मैं अब भवसागर से पार उतर गया हूँ॥
॥ सोरठा॥
घट रामायन सार, ये अगार गति यों कही।
बूझै बूझनहार, बिन सतगुरु पावै नहीं॥

१२८ / घट रामायण
अर्थ-घट रामायण के सार तत्त्व के रूप में उस अगली गति का वर्णन इस प्रकार किया है। कोई
बूझने वाला ही इसे बूझ सकता है, किन्तु वह भी बिना सतगुरु के नहीं समझ सकता॥
॥ दोहा ॥
सतगुरु चरन निवास, निस दिन सूरति बसि रही।
संत चरन अभिलाष, पल छिन छिन छूटै नहीं॥ १॥
घट रामायन माहिं, अर्थ भेद अंदर सही।
रावन लंका राम, यह अकाम गति ना कही॥ २॥
अर्थ-सतगुरु के चरणों में निवास करते हुए प्रतिदिन सुरति ध्यान में चित्त बस रहा है और इस
प्रकार, सन्तों के चरणों की अभिलाषा एक दल और एक क्षण के लिए भी नहीं छूट पाती ॥ १ ॥
घट रामायण के अन्तर्गत सम्पूर्ण अर्थ तथा उसका रहस्य घट के अन्तर्गत हैं और वही ठीक भी है।
रावण, लंका एवं राम सभी उसके अन्दर ही हैं-यह समझ कामना रहित है और उसकी गति का वर्णन
नहीं किया जा सकता ॥ २ ॥
॥ सोरठा।
दसरथ सीता नाहिं, भरत सत्रगुन ना कह्यौ।
ये निरखौ घट माहिं, बाहिर गति मति भरम है॥ १॥
घट रामायन माहिं, घट बिधि गति मति सब कही।
परखै परम निवास, यह अकास अंदर मई॥ २॥
अर्थ-सीता तथा दशरथ बाहर नहीं है, भरत शत्रुघ्न भी बाहर नहीं कहे गए हैं। इन सबको घट में ही
देखो, इनके पिंड के बाहर होने की गति बुद्धि का भ्रम है॥ १॥
घट रामायण के अन्तर्गत मैंने पिंड (घट) की विधि, ज्ञान तथा समझ सबके विषय में बताया है
ताकि साधक इस घटाकाश में स्थित उनके रमणीक निवास को समझ सके ॥ २ ॥
॥ चौपाई ॥
रावन राम भेद समझाई। रामायन सब घट बिधि गाई॥
संत की गति अगति अगोई। अगम निगम घर सुरति समोई॥
संत गती गति बेद न जाना। सिम्रित सास्तर और पुराना॥
पंडित भेष भक्त और ज्ञानी। जोगी परमहंस नहिं जानी॥
स्रावग तुरक तोल नहिं पाया। भरमे सबहि काल गोहराया॥
अर्थ-रामायण में घट विधि के रूप में गाकर मैंने रावण तथा राम का भेद समझाया है। संतों की
गति अगम एवं स्पष्ट (अगोई) हैं। उनका अगम-निगममय घर सुरति ज्ञान में ही समाया हुआ है॥
सिद्ध (गती) सन्त का भेद वेद नहीं जानता-स्मृति (सम्रित) शास्त्र और पुराण भी नहीं समझते,
नाना प्रकार के वेष धारण करने वाले पंडित, भक्त और ज्ञानी योगी, परमहंस भी नहीं जानते-जैन
श्रावक, तुर्क भी उसे तौल नहीं पाते (मूल्यांकन नहीं कर पाते) वे सभी भ्रम में भ्रमण करते रहते हैं
और अन्त में काल (मृत्यु) उन्हें बुला लेती है।

घट रामायण / १२९
॥ दोहा ॥
पंडित ज्ञानी भेष, यह अदेश गति ना लखी।
स्रावग तूरक न देख, सत सार अंदर चखी ॥
अर्थ-पंडित, ज्ञानी, आडम्बर वेषधारी आदि इस अदेख (घट रामायण) की गति के अर्थ को नहीं
जानते। इस घट के भीतर चलने वाली प्रक्रिया और मूलतत्त्व को स्रावक (जैन) एवं तुर्क भी नहीं देख
पाते॥
॥ चौपाई ॥
ये सब भूल भाव गति गाई। तन भीतर काहू नहिं पाई ॥
ये तन भीतर संतन देखा। यह अदेख गति कहौं अलेखा ॥
गंगा जमुना और त्रिबेनी। तन भीतर ब्रह्माण्ड की सैनी॥
पृथ्बी पवन गगन अकासा। यह सब देखे घटहि निवासा॥
पाँच तत्त जल अगिनि समाना। पिंड माहिं ब्रह्मांड बखाना॥
रबि चंदा तारागन होई। और अनेक बिधान समोई॥
बाहिर भर्म भेद गति गावैं। पाहन पानी से लौ लावैं॥
तीरथ बरत जो चारौ धामा। यह सब पाप पुन्य निज कामा॥
पूरब पच्छिम फिर फिरि धावैं। सत्त पुरुष की राह न पावैं ॥
सत्त पुरुष सत नाम कहाई। वह अनाम गति संतन पाई॥
सत्त नाम से निर्गुन आया। यह सब भेद संत बतलाया॥
पाँच नाम निरगुन के जाना। निरगुन निराकार निरबाना॥
और निरंजन है धर्मराई। ऐसे पाँच नाम गति गाई॥
सोई ब्रह्म परचंड कहाई। ता को जपै जगत मन लाई॥
दस औतार ब्रह्म कर होई। ता को कहिये निरगुन सोई॥
तिन पुनि रचा पिंड ब्रह्मांडा। सात दीप पृथ्बी नौ खंडा॥
सब जग ब्रह्म ब्रह्म करि गाई। आदि अन्त की राह न पाई॥
यह गति मति बिधि मैं पुनि भाखा। कोई जगत न सूझी आँखा ॥
यह विधि सत मति भेद बताई। काहू के परतीत न आई॥
कासी पंडित और अचारी। जोगी परमहंस ब्रह्मचारी॥
कहै तुलसी कोइ भेद न पाया। यह सब भाव भेद भरमाया॥
अर्थ-मैंने इन सब मूल भावों की गति का गान किया-जिसे मन के भीतर (इन) किसी ने भी नहीं
प्राप्त किया है। इस शरीर के भीतर इसे सन्तों ने देखा है। इस अदेख की अलक्ष्य गति का मैं वर्णन
करता हूँ॥
गंगा, यमुना और त्रिवेणी-इस शरीर के भीतर (इड़ा, पिंगला, सुषम्ना के रूप में) इस शरीर के
भीतर ब्रह्मांड की सरणि में हैं। पृथ्वी, पवन, गगन और आकाश इनका निवास मैंने घट के अन्दर ही
देखा है॥

१३० / घट रामायण
पाँचों तत्त्व जल और अग्नि की ही भाँति पिंड के ही भीतर वैसे ही हैं, जैसे ब्रह्मांड में। यहीं सृष्टि
की ही भाँति सूर्य, चन्द्रमा एवं तारागण हैं-तथा अन्य सृष्टि विधान भी यहाँ समाए हुए हैं॥
बाह्य संसार के भ्रम तथा भेद की गति सभी गाते हैं और वहाँ साधुजन पत्थर (मूर्तिपूजा) एवं जल
(स्नान, तर्पणादि) में अपनी धार्मिक निष्ठा लगाते हैं॥ तीर्थ, व्रत और चारों धाम में सब पाप-पुण्य की
अपनी कल्पना है॥
पूरब, पश्चिम में परिक्रमाएँ करके पुनः पुनः जाते हैं-किन्तु ये सब सत्य पुरुष का मार्ग नहीं पाते हैं।
सत्य पुरुष-सत्य नाम से जाना जाता है (कहा जाता है) और उसका कोई नाम नहीं होता (अनाम)
ऐसी अवस्था इन सन्तों ने प्राप्त कर ली है॥
इन सारे भेदों को सन्तों ने बताया है-सत्य नाम से ही निर्गुण का प्राकट्य होता है। इस निर्गुण के
पाँच नाम हैं-निर्गुण, निराकार, निर्वाण, निरंजन और धर्मराज-इस प्रकार से उसके पाँच नाम हैं॥
वही व्यापक (प्रचंड) ब्रह्म है, जिसमें संसार अपना मन लगाकर गान करता है। इस ब्रह्म के दस
अवतार होते हैं-उसी को निर्गुण ब्रह्म कहा जाता है॥
उसी ने इस पिंड और ब्रह्मांड तथा सात द्वीप, पृथ्वी एवं नौ खण्डों की रचना की है। उसी को सारा
संसार ब्रह्म है, ब्रह्म है कहकर गान करता है, किन्तु उसके आदि अन्त का मार्ग कोई नहीं जानता॥
अपने ज्ञान और अपनी बुद्धि तथा विधि द्वारा मैंने उसका वर्णन किया है-सम्भव है, यह किसी के
विश्वास का विषय न बने। काशी के विद्वान् पंडित और धर्माचरण से सम्बद्ध विद्वान योगी, परमहंस
तथा ब्रह्मचारी आदि ने उसका रहस्य नहीं प्राप्त किया है। तुलसी साहब कहते हैं कि इन सबने तो उस
ब्रह्म के स्वरूप तथा भेद के विषय में निरन्तर लोगों को भरमाया है॥
हाल काशी का
॥दोहा॥
तुलसी ग्रन्थ पसार, कासी नगर सगरे भई।
पंडित ज्ञानी भेष, जैन तुरक सब मिलि कही॥१॥
तुलसी बाम्हन साध, गंगाजी पार रहतु है।
निंदत सिम्रित बेद, यह अभेद गति कहतु है॥२॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि हमारे ग्रन्थ का प्रचार (प्रसार) काशी नगरी में चारों तरफ हुआ
और पंडित, ज्ञानी, भेष, जैन, तुर्क इन सभी ने मिलकर कहा॥१॥
एक तुलसी नाम का साधु ब्राह्मण है, गंगा नदी के उस पार रहता है-वेद स्मृतियों की निन्दा करता
रहता है और (ब्रह्म की) रहस्यमयी गति का वर्णन करता है॥२॥
॥चौपाई॥
सब पंडित मिलि मता उठाई। या को करिये कौन उपाई॥
नैनू नाम इक पंडित भारी। तेहि पंडित मिलि सोच बिचारी॥
तुलसी नाम इक साध कहाये। जिन सब नेम अचार उठाये॥
ग्रंथ बनाइ कीन्ह एक भाषा। तीरथ बरत एक नहिं राखा॥
वा कौ भेद भाव सब लीजै। केहि बिधि ज्ञान समझ तेहि कीजै॥
स्यामा समझ एक बतलाई। रहन पास कोइ ताहि बुलाई॥
पंडित एक कही समझाई। रहन अहीर सोइ भाखि सुनाई॥

घट रामायण / १३१
नाम जानि इक ह्रिदे अहीरा। निसि दिन आबै हमरे तीरा॥
सुनै कथा पुनि सेवा कटई। गत दिवस बस पासै परई॥
नैनू मिलि सब बाम्हन भाई। तिनि पुनि ह्रिदे अहीर बुलाई॥
सब पंडित अस पूछन लाई। कौन ज्ञान यह कहत गुसाँई॥
वेद भेद मरजाद उठावै। सिम्रित सास्तर ना ठहरावै॥
गंगा जमुना अन्तर मानै। है परतच्छ ताहि नहिं जानै॥
पूजा पत्री और अचारा। तीरथ बरत कहै झूठ पसारा॥
राम रहीम एक नहिं, मानै। यह कछु ठौर और कछु ठानै॥
अर्थ-सभी पंडितों ने मिल कर यह तय किया कि इसके लिए क्या उपाय किया जाए। नैनू नाम के एक बड़े पंडित थे-उन्होंने उन पंडितों के साथ मिलकर सोच विचार किया॥
तुलसी नाम के एक साधु कहे जाते हैं जिन्होंने सारे नियमों तथा आचरणों को समाप्त सा कर दिया है (उठाये)। यह सब एक ग्रन्थ बनाकर किया है और उन्होंने तीर्थों एवं व्रतादि एक भी तत्त्व की रक्षा नहीं की है॥
उनके इस प्रकरण में सारे रहस्य (भेदभाव) लें और उनका ज्ञान किस प्रकार का है, उसे समझकर उसके लिए निर्णय लीजिए॥ हे श्यामा! मैं एक समझदारी की बात कहता हूँ-उसे समझो, उनके पास जो कोई रहता हो, उसे बुलवा लीजिए॥
एक पंडित ने समझाकर कहा कि-एक अहीर उनके पास रहता है, उसी को आने के लिए कहकर बुलाओ। हृदय अहीर का नाम जानकर-जो रात-दिन पास आता था। वह मुझसे कथाएँ सुनता था और फिर वह सेवा में तत्पर रहता था और रातदिन हमारे पास ही पड़ा रहता था।
नैनू और समस्त ब्राह्मण बन्धु मिलकर उन्होंने फिर उस हृदय अहीर को बुलवाया। समस्त पंडित इस प्रकार पूछने लगे कि यह (तुलसीदास गोस्वामी) किस ज्ञान की बात करता है।
उनकी बातें सुनकर हृदय ने उत्तर दिया यह गोस्वामी वेदों के भेद की मर्यादा को समाप्त करके (उठावें) स्मृति एवं शास्त्र ज्ञान को नकारते हैं। वे गंगा और यमुना के अन्तर को मानते हैं और जो लोकधर्म प्रत्यक्षतः दिखाई पड़ता है (मूर्तिपूजा, तर्पण आदि) उनको महत्त्व नहीं देते॥
पूजा-पत्री तथा अन्य आचरण एवं तीर्थ-व्रतादि को मिथ्या प्रसार कहते हैं। राम तथा रहीम दोनों में से किसी को भी नहीं मानते हैं और वे कुछ देर तक परम्परा से हटकर कुछ अन्य बातें कहते हैं।
॥ दोहा ॥
दीन्हा ह्रिदे जवाब, साफ बात बिधि यों कही।
गति सत संत अपार, पंडित बिधि जानै नहीं॥
अर्थ-हृदय ने इस प्रकार का उत्तर दिया और सारी बातें साफ-साफ इस प्रकार कह दी। उन संत का ज्ञान अनन्त है, पंडित जन तो किसी विधि से उसे नहीं जान सकते॥
॥ चौपाई ॥
ह्रिदे अहीर ज्वाब अस दीन्हा। संत गती कोइ बिरले चीन्हा॥
मैं तौ अपढ़ जाति अज्ञाना। तुम पंडित पढ़े बेद पुराना॥
संतन की गति कहौं बुझाई। तुमहुँ ने बेद भेद नहिं पाई॥
पढ़ि पढ़ि पंडित पचि पचि हारी। बेद न भेद संत गति न्यारी॥

१३२ / घट रामायण
अर्थ-हृदय अहीर ने उत्तर दिया कि सन्तों की गति कोई विरला ही पहचानता है-मैं तो अपढ़ एवं
अज्ञानी जाति का हूँ और आप लोग पंडित (ज्ञानी) हैं और वेद-पुराण पढ़ते रहते हैं॥
यदि आप लोग कहें तो मैं सन्तों की दशा का वर्णन करूँ, आप लोग उनकी गति की जानकारी
वेदों द्वारा नहीं प्राप्त कर सकते। पंडित जन पढ़-पढ़कर और कर्म-कर करके हार गए किन्तु सन्तों की
न्यारी गति का भेद वेदों ने नहीं दिया॥
॥ सोरठा ॥
नैनू कहै बिचार, यह निकाम कस भाखेऊ।
यह जड़ जाति गँवार, बेदन सों न्यारी कहै॥
अर्थ-नैनू पण्डित उस पर विचार करते हुए कहते हैं कि यह जड़ जाति का गँवार निष्काम तत्त्व को
कैसे बता सकेगा, (यह तो इसकी मूर्खता है कि) कि इसे वह वेदों से विलक्षण कह रहा है॥
॥ चौपाई ॥
नैनू सुनि पुनि मारनि धाये। पंडित और अनेक बुलाये॥
सब से कहै सुनौ तुम ज्ञाना। यह अहीर कस करत बखाना॥
सब पंडित मिलि यह बिधि ठानी। या की करौ प्रान की हानी॥
यह सब मिलि कर मता उठाई। हिरदे ऊपर लात चलाई॥
अर्थ-नैनू पण्डित यह सुनकर उसे मारने दौड़े और अनेक पंडितों को बुला लिया। उन्होंने सभी से
कहा कि तुम इसके ज्ञान को सुनो-यह अहीर उसका कैसे वर्णन कर रहा है। सब पंडितों ने इसे
सुनकर, ऐसा निश्चय किया कि इसके प्राण की हानि करो (मार डालो)। यह सुनकर ऐसा करने का
सभी ने निश्चय किया और हृदय अहीर के ऊपर लात चला दिए॥
॥ सोरठा ॥
तुरक तकी इक स्वार, जात हते दरबार को।
घोड़ा फेरि निहार, यह बिबाद कैसे भई॥
अर्थ-एक तुर्क मीर तकी नामक घुड़सवार (स्वार) दरबार के लिए जा रहे थे। उन्होंने घोड़े को
फेरकर देखा कि यह विवाद क्यों घटित हुआ॥
॥ चौपाई ॥
सेख तकी इक तुरुक सवारा। ते पुनि जात हते दरबारा॥
सुन करि बात बाग उन मोड़ा। फेरि लगाम कीन्ह उन घोड़ा॥
सेख तकी पूछी पुनि बाता। तैं कहु कौन कौन सी जाता॥
केहि कारन यह झगरा होई। सो सब भेद कहौ बिधि सोई॥
अर्थ-शेख तकी नामक एक सवार तुर्क जो वे उस समय राज दरबार में जा रहे थे, उन्होंने यह बात
सुनकर घोड़े की लगाम रोकी और लगाम को फिराकर घोड़ा उनकी ओर मोड़ दिया॥
तब शेख तकी ने उनसे यह बात पूछी-तुम बताओ, किस-किस जाति के हो। किस कारणवश यह
झगड़ा हो रहा है-यह सारा रहस्य मुझे बताओ॥

घट रामायण / १३३
॥ सोरठा ॥
नैनू निरखि पुकार, सेख तकी को देखि कर।
ये का कहत गँवार, बिधि कुरान मानै नहीं॥
अर्थ-शेख तकी को देखकर नैनू ने पुकार कर कहा, यह गँवार क्या कह रहा है, यह कुरान शरीफ़
की व्यवस्था नहीं स्वीकार करता॥
॥ चौपाई ॥
नैनू कहै सुनौ मेहरबाना। बेद कितेब न मानै पुराना॥
राम रहीम एक नहिं मानै। पंडित काजी झूठ बखानै॥
अर्थ-नैनू पंडित ने कहा, हे मेहरबान? सुनें, यह वेद, शास्त्र एवं पुराणों को नहीं मानता। यह राम
तथा रहीम दोनों में से एक को भी नहीं मानता तथा पंडित एवं काजी दोनों को झूठ कहता है॥
॥ सोरठा ॥
हिरदे कही बिचारि, सेख तकी जो तुरक से।
तुम बूझौ दिल माहिं, खुदा एक सब में कहौ॥
अर्थ-हृदय अहीर ने अत्यन्त विचारपूर्वक उन शेख तकी तुर्क से कहा कि आप दिल से समझकर
बताइए-सभी ने खुदा को एक ही कहा है॥
॥ चौपाई ॥
हिरदै कहै तकी सुनु सेखा। सब में कहौ खुदा है एका॥
गाय मार बकरी तुम खइया। येहि किताब में कह्या गुसँइयाँ॥
सब में नूर मुहम्मद केरा। काटि गला पुनि पैहौ बैरा॥
येही कितेब कुरान बखाना। जिन्दा को मुरदा करि जाना॥
सोई मुसलमान है भाई। नवी नाम हर दम लौ लाई॥
रोजा कर कर खून बिचारा। ये गुनाह नहिं बक्सनहारा॥
झूठा रोजा झूठ निवाजा। झूठा अल्ला करै अवाजा॥
वा साहिब की राह न पाई। सब जहान में रहा समाई॥
अर्थ-हृदय अहीर ने कहा कि हे शेख तकी सुनें, कहते हैं, सभी में खुदा एक हैं। तुम गाय और
बकरी मारकर खाते हो, किस पुस्तक में ईश्वर द्वारा यह कहा गया है। सभी जीवों में मुहम्मद साहब
पैगम्बर का नूर (प्रकाश) है-उनका गला काटकर, उनका क्रोध ही प्राप्त करोगे।
क्या यही शास्त्र और कुरान में कहा गया है कि जीवित को मुर्दा मानकर समझो। मुसलमान वही
है-जो निरन्तर नबी के नाम की लौ लगाए रहता है। रोजा रख रखकर रक्तपात पर कभी विचार लिया
है, इस गुनाह (अपराध) को कोई क्षमा करने वाला नहीं है॥ रोजा भी झूठा है- नमाज भी झूठा है और
'अल्ला हो-अल्ला हो' की लगाई वाली आवाज भी झूठी है। उस साहब (स्वामी - ईश्वर) की कोई
राह नहीं पाया है-वह सारे संसार में समाया हुआ है॥

१३४ / घट रामायण
॥ सोरठा ॥
सेख तकी सुन बात, ज्वाब सवाल बोले नहीं।
धर्मा जैनी जाति, संग बात कीन्ही सही॥
अर्थ-शेख तकी उस बात को सुनकर उसके जबाब एवं सवाल (उत्तर तथा प्रश्न) के संदर्भ में
कुछ नहीं बोले—साथ में धर्मा नाम के जैनी पंडित थे, उन्होंने बातें कहीं॥
॥ चौपाई ॥
धर्मा नाम जाति इक जैनी। उन सब सुनी हमारी कहनी॥
धर्मा स्रावग कहै बिचारी। जैन मता है सब से भारी॥
ये मति आदि साध नहिं जानै। तैं मत झूठा बाद बखानै॥
चौबीसों तीर्थंकर जानी। आदि नाथ हैं हमरे स्वामी॥
तिनकी आदि कहा तुम जानौ। नाहक बेगुन बादि बखानौ॥
अर्थ-धर्मा नाम का एक जैन धर्ममतावलम्बी थे। उसने हमारी बातचीत सुनी। श्रावक धर्मी
विचारपूर्वक बोले, कि जैन मत सर्वश्रेष्ठ है। जो धार्मिक मत साधुओं का आदि रूप नहीं जानता, वह
मत झूठे सिद्धान्तों का वर्णन करता है। चौबीसों तीर्थंकरों को समझो और हमारे स्वामी तो आदि नाथ हैं।
उनके आदि उपदेश (कहा) तुम समझो निरर्थक बिना तत्त्व के सिद्धान्तों को बता रहे हो॥
॥ सोरठा ॥
हृिदै कहै सुनु बात, जैन मता पुनि सब कहौं।
सुनौ भेद बिख्यात, आदि अंत सब समझि कै॥
अर्थ-हृदय अहीरने कहा मेरी बातें सुनो, जैन धर्म के विषय में मैं पुनः सच कहता हूँ, इसके विज्ञान
भेद को, इसके आदि अन्त को समझकर सुनो॥
॥ चौपाई ॥
हिरदै कहै सुनौ हो भाई। आदि नाथ की आदि सुनाई॥
जो तुम सुनौ कहौं बिधि नाना। हम सब कहैं सुनौ दै काना॥
प्रथम जुगल्या धर्म बिचारी। आई छींक भये सुत नारी॥
होते छींक प्रान तेहि जाई। कन्या पुत्र भये तेहि ठाईं॥
ता पीछे कुलंकर की बाता। चित दे सुनौ कहौं बिख्याता॥
चौथा कुलंकर भेद बखाना। ता में नभ राजा इक जाना॥
मुरा देबि देहिं भाखौं भेवा। जाकर ऋषभराय भये देवा॥
भागवत कहै ताहि अवतारा। तिन का सुनौ आदि निरबारा॥
ता ने तप कीन्हौ निरबाना। मुक्ति पाइ पुनि काल समाना॥
ऐसे भये और चौबीसा। पुनि पुनि आये मुक्ति पद ईसा॥
ता में प्रथम ऋषभदेव होई। भाखा तिन जग थापा सोई॥
आगे भेद न उनहूँ जाना। यह सुन सार भेद निरबाना॥

घट रामायण / १३५
जग थापा पुनि धर्म चलाई। आदि पुरान में देखौ भाई॥
कह नौकार जाए बतलाई। जाकी विधी कहाँ समझाई॥
जाप भेद मैं कहौं पुकारी। दिल अपने में लेउ बिचारी॥
अरिहँत सिद्ध भाखि बिधि नामा। अरियानं उज्झान जाना॥
लोये सर्व साध को कीन्हा। ये नौकार मन्त्र उन लीन्हा॥
सुनि धर्मा तब चकृत भयऊ। सब बरतंत जैन कौ कहेऊ॥
अर्थ-हृदय ने कहा, हे भाई? सुनो, आदि नाथ की आदिकथा मैं सुनाता हूँ। यदि तुम उसे सुनना
चाहते हो तो मैं उसे नाना विधियों से कहता हूँ। (इस कथा को) हम सब कहते हैं, हृदय से ध्यान
लगाकर सुनो ॥
प्रथम 'जुगल्या' धर्म पर विचार करता हूँ। छींक आई और उससे चार बच्चे पैदा हुए। छींक आते ही
उसके प्राण विनष्ट हो उठे और उस स्थल पर कन्या तथा पुत्र हुए। उसके पीछे कुलंकर की बातें कहता
हूँ। लोक में प्रसिद्ध कथा को चित्त लगाकर सुनो।।
मैं चौथे कुलंकर की बात कहता हूँ-उसमें नभ नामक एक राजा था। उसको मुरा देवी ने सारा ज्ञान
रहस्य बताया-जिसके ऋषभ राय हुए। भागवत में ऋषभराय अवतार बताए गए हैं-उनके विषय में मूल
निराकरण सुनें। उन्होंने तपस्या करके निर्वाण प्राप्त किया और मुक्ति पाकर वह काल में समाहित हो
उठे। इसी प्रकार अन्य चौबीस तीर्थंकर हुए और वे मुक्त होकर बार-बार ईश्वर में विलीन हुए ॥
इन समस्त तीर्थंकरों में सर्वप्रथम ऋषभदेव हुए-उन्होंने जिस मत का उपदेश दिया, वही संसार में
स्थापित हुआ। उसके आगे उन्होंने भी भेद नहीं समझा-तुम उस निर्वाण भेद के सार तत्त्वों को सुनो।
उन्होंने जैन धर्म चलाकर संसार में उसकी स्थापना की। हे भाई! इसे जाकर आदि पुराण में पढ़ो।
उन्होंने नौ प्रकार के जापों की चर्चा की है-उनकी विधियाँ मैं समझाकर कहता हूँ। मैं जापभेदों के
विषय में पुकार कर कहता हूँ, आप इसे अपने दिल में विचार लें।
अरिहंत, सिद्ध तथा विधिपूर्वक नामों का कथन करके अरियान, उज्झान लुप्त (लोए) एवं सर्व
साध-आदि नौकार मंत्र उन्होंने बतलाया था?
इसे सुनकर धर्मा जैनी चकित हो उठा कि इसने तो जैन मत का सारा वृत्तान्त बता दिया।
॥ दोहा ॥
सुनिधर्मा यह भेद ये अभेद कछु दीन कहैं।
जैन मत समझाइ ये अकाय कछु अगम हैं॥
अर्थ-धर्मा ने इस भेदों को सुनकर कहा ये भेद अभेद्य हैं-जैनमत के अन्तर्गत ये वैचारिक
(अकाय) तथा अगम्य मत हैं (इस हृदय अहीर को कैसे ज्ञात हुआ)।
॥ चौपाई ॥
सेख तकी पंडित भये एका। धर्मा धर्म कि बाँधी टेका॥
ये तीनों तुलसी पै आये। हिरदे ऊपर बाँह चढ़ाये॥
और अनेक मूरख बहुतेरे। कोइ सूधे कोइ चलैं अनेरे॥
हिरदे अहीर चले सब झारी। जहाँ तुलसी ने कुटी सँवारी॥
हिरदे अहीर साथ झख भारी। तब तुलसी ने मता बिचारी॥

१३६ / घट रामायण
सब चलि आये कुटी के पासा। जब तुलसी मन कियौ हुलासा ॥
उठि के चरन गहे सब केरे। कीन्ही दया दीन तन हेरे ॥
बाम्हन पंडित धर्मा जैनी। सेख तकी से कीन्ही सैनी ॥
नैनू पंडित सैन सँवारा। धर्मा हिये उठै जस झारा ॥
यह दोनों मिलि मता बिचारी। सेख तकी को आगे डारी ॥
नैनू नोक टोक इक झारा। यह इनके हैं गुरू बिचारा ॥
पूछे भेद कहैं निरवारा। इन कस भाखा झूठ पसारा ॥
अर्थ-शेख तकी और पंडित एक हो गए और धर्मा ने धर्म की टेक बाँध ली। ये तीनों तुलसी
साहब के पास गए इनके हृदय उद्विग्न थे और बाहें चढ़ी हुई थीं।। उनके साथ और अनेक मूर्ख जन थे-
कोई सीधे चलता था को कोई टेढ़े चलता था। हृदय अहीर के साथ सब एक हो चले और वहाँ आए,
जहाँ तुलसी ने अपनी कुटी सँवार रखी थी॥
हृदय अहीर के साथ बड़ी भीड़ थी, तब तुलसी साहब ने मन-ही-मन विचार किया। सब उनकी
कुटी के पास चलकर आए तब तुलसी ने मन में आनन्द प्रगट किया।। उन्होंने उठकर सबके चरणों में
प्रणाम किया (स्पर्श किया) और कहा कि आप सब इस दीन की ओर देखकर दया करें॥
ब्राह्मण, पंडित, जैनी धर्मा और शेख तकी की ओर देखा। नैनू पंडित ने नेत्रों से इशारा किया और
धर्मा जैनी के हृदय में आग की लपट जैसी उठ पड़ीं॥ उन दोनों ने मन में विचार करके शेख तकी को
आगे कर दिया।
नैनू पंडित ने पहले नोक झोंक शुरू कर दी-ये बेचार के इनके (हृदय अहीर के) गुरु हैं। इनसे
ज्ञान के भेदों की बात आप पूछिये ये इसका निराकरण करेंगे और आप इनसे पूछे कि इन्होंने इस प्रकार
असत्य का प्रसार क्यों किया है।
॥ सोरठा ॥
हिरदै कहै निहोर, स्वामी तुलसी विधि सुनौ।
मैं कछु कही न और, ये अबूझ बूझी नहीं ॥
अर्थ-हृदय अहीर ने सम्बोधित करके कहा कि हे स्वामी तुलसी साहब? इसे विधिपूर्वक सुनें-मैंने
अपनी तरफ से कोई नई बात नहीं कही (आपकी ही बातें बताई) किन्तु उस अबूझ वाणी को ये सब
समझ नहीं पाए॥
॥ चौपाई ॥
हिरदे कहै सुनौ हो स्वामी। मैं कछु कही रीति गति ज्ञानी ॥
नैनू पंडित कहै बिचारी। इन सब ज्ञान कही गति न्यारी ॥
इन सब धर्म कर्म जग पेला। अस कस ज्ञान कहै यह चेला ॥
इन सब बेद कितेब उठावा। जौगी जैन नहीं ठहरावा ॥
और अनेक बात नहिं मानै। अस कह मन्त्र सुनायौ कानै ॥
तब तुलसी सुनि आदर कीन्हा। प्रीति भाव उठि आसन दीन्हा ॥
दीन बिधी सब अपनी गाई। चरन परसि कै सीस चढ़ाई ॥
मैं अनाथ हौँ तुम्हरौ बारा। छिमा करौ मैं दास तुम्हारा ॥

घट रामायण / १३७
मैं औगुन की खानि अपारा। तुम गुन सीतल अपरम्पारा॥
तुम पंडित मैं अपढ़ अयाना। करौ दया तुम कृपानिधाना॥
ये हिरदे कछु ज्ञान न पावा। औगुन ज्ञान जो तुम्हें सुनावा॥
सीतल भये धीर तब आई। सुनि अस बचन बैठि भुँइ माई॥
अर्थ-हृदय अहीर ने कहा, हे स्वामी सुनें, मैंने ज्ञानियों की रीति के अनुसार ही कुछ बातें कही हैं।
नैनू पंडित ने विचार कर कहा कि इन सबने ज्ञान की विलक्षण गति कही है। इस व्यक्ति ने तो धर्म, कर्म
को संसार से नष्ट कर दिया- यह कैसा ज्ञान है, जिसे आपका यह शिष्य (हृदय अहीर) कहता है। इसने
सम्पूर्ण वेदों, पुराणों आदि को निरर्थक बताया है तथा योगी एवं जैनियों का अस्तित्व ही नकार दिया
है॥ यह धर्म की अनेक बातों को नहीं मानता ऐसा कहकर उन्हें (हृदय अहीर का) ज्ञानमंत्र सुनाया॥
यह सुनकर, तुलसी साहब ने नैनू पंडित का अत्यन्त आदर किया और प्रीतिभाव से उठकर उन्हें
बैठने के लिए आसन दिया। उन्होंने नैनू पंडित से अपनी दीनता का वर्णन किया और उनके चरणों का
स्पर्श करके उसे अपने सिर पर रख लिया।
मैं तो अनाथ हूँ-मुझे आपका ही आधार है-आप क्षमा करें मैं तो आपका दास हूँ॥ मैं अपार
अवगुणों का भंडार हूँ और अपरम्पार शीतल गुणों के (भंडार) हो। आप पंडित ज्ञानी हैं और मैं अपढ़
और अज्ञानी हूँ-आप कृपा निधान हैं तुम मुझपर दया करों। इस हृदय ने किसी भी प्रकार के ज्ञान को
नही प्राप्त किया है जो इसने आपको सुनाया है वह पूर्णतः दोष भरा (अवगुण) ज्ञान है॥
इसे सुनकर वे लोग शीतल (शान्त) हुए और उनमें धैर्य (सहजता) आया और इन बातों को
सुनकर वे सभी भूमि पर बैठ गए॥
॥ सोरठा ॥
तकी तुरक कह बात तुलसी सुनियो भेद अब।
सब हृदय विख्यात जो गुनाह इनने कियो॥
अर्थ-तुर्क तकी ने यह बात कही कि हे तुलसी साहब! सारा रहस्य अब सुनो, जो पाप इस हृदय
अहीर ने किया है, वह सबको ज्ञात है।
॥ चौपाई ॥
सेख तकी जब बचन सुनाई। तुलसी सुनियौ चित्त लगाई॥
हिरदे कुफर बात सब कीन्हा। रोजा निमाज मेटि सब दीन्हा॥
और कितेब कुरान उठाये। खुदा नबी कर खोज मिटाये॥
अर्थ-शेख तकी ने जब यह बात सुनाई तो तुलसी ने ध्यान देकर बात सुनी। हृदय अहीर ने कुफ्र की
बातें की तथा रोजा तथा नमाज़ आदि सबको झूठा कह दिया। उन्होंने धार्मिक पुस्तकों और कुरान को
उठा (समाप्त घोषित कर) दिया और खुदा एवं नबी (ईश्वर के दूत) का अस्तित्व मिटा डाला॥
॥ सोरठा ॥
तुलसी तकी विचार, सब सँवारि विधि मैं कहौं।
कहुँ कुरान निरधार, जो किताब भाखी सबै॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि मैंने सब को सँवार कर विधिपूर्वक बातें कही हैं। कहीं कुरान
निराधार थोड़े है-उसका किताब में वर्णन तो सभी ने किया है॥

१३८ / घट रामायण
॥ सम्बाद साथ तकी मियाँ के ॥
॥ चौपाई ॥
तुलसी कहै तकी सों बाता। या का तकी सुनौ बिख्याता ॥
चौधा तबक कुरान बताया। और चौबीस पीर पुनि गावाँ ॥
फजल मुहम्मद कीन्ह जहाना। आब तब पट अबर निदाना ॥
सुनौ तकी कहुँ खोज न पावै। कहा किताब ज्वाब नहिं आवै ॥
काजी मुल्ला पढ़े कुराना। खुदा खुदा कहे खोज न जाना ॥
कोलि कितेब देखिये भाई। खुदा आदि कहौ कहँ से आई ॥
खुद खुदाइ कर कहै कुराना। खुद खुदाई का मरम न जाना ॥
ये खुदाइ ना कहिये भाई। ये तौ खुद खुदाइ की छाँहीं ॥
जहँ खुदाइ रहता है साँईं। उस खुदाइ का अंत न पाई ॥
तकी खुदा तुम एक बतावो। खुद खुदाइ का खोज लगावो ॥
अर्थ—तुलसीदास शेख तकी से अपनी बात कहते हैं, हे शेख तकी! इस विख्यात तथ्य को आप सुनें।
कुरान ने चौदह तबक (आधार स्थल) बताया है और फिर चौबीस पीरों के विषय में गाया है।
मुहम्मद साहब की कृपा ने यह सृष्टि बनाई, सूर्य तथा आकाश उन्हीं के बनाए हैं। भिन्न-भिन्न
चौदह तबक (आधार स्थल) बतलाए गए हैं और उनके अलग-अलग पीर भी दिखाए गए हैं॥
किस तबक में किस नबी (ईश्वर के दूत) का निवास है। हे शेख तकी उस ईमान हक्क के विषय
में कहिये ॥
जहाँ वह स्वामी खुदा रहता है, उस खुदा का कोई अन्त नहीं पाता। हे तकी! तुम खुदा को एक बता
रहे हों और स्वयं उस खुदा की खोज लगाओ।
अल्लाह ने अपने मुख एवं जुबान से जो कुछ कहा उससे किताब कुरान (धर्मग्रन्थ) बना। भाई
पैगम्बर ने यह स्पष्ट किया कि सारा संसार उसकी खिलकत (सृष्टि) है। ॥
॥ सोरठा ॥
तुलसी तकी तलास, खुदा बास कहु कहँ हता।
नहिं जब जिमीं अकास, कोड़ किताब स्वाँसा नहीं ॥
अर्थ—तुलसी साहब कहते हैं कि हे तकी खोजो, कि खुदा की निवास स्थली कहाँ हैं। इस समय
वह कहाँ था, जब कोई धर्म ग्रन्थ नहीं था, न पृथ्वी थी न आकाश था और न वायु थी।
॥ दोहा ॥
मंसूरमियाँ पश्तो कहै तकी बूझ दिल माहँ।
खुद खुदाइ की राह का खुदा खोज नहिं पाइ ॥
अर्थ—मंसूर मियाँ पश्तों में यह बात समझाते हैं तू इसे दिल से समझो। स्वयं खुदा भी खुदा की तरह
की खोज नहीं कर पाता ॥

घट रामायण / १३९
॥ तुलसी साहब बाच ॥
॥ दोहा ॥
तकी तोल जाना नहीं, कहौ कुरान की बात।
दिल दरियाप्त अपने करो, जो कुरान बिख्यात ॥ १ ॥
खुदा चून बेचून है, अस अस कहत कुरान।
बिन जुबान अल्ला मियाँ, कस कस किया बखान ॥ २ ॥
अल्ला अलिफ जुबान, बिना बदन जाहिर नहीं।
जुबाँ बदन के माहिं, तौ बेचूँ कहना नहीं ॥ ३ ॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं हे शेख तकी उस निर्णय को जानते नहीं और कुरान की बातें करते हो।
जो कुरान में विख्यात (सुप्रसिद्ध) है, उस तत्त्व की खोज अपने दिल में करो॥ १ ॥
ऐसा कुरान कैसे कह सकता है-अल्ला मियाँ ने बिना जुबान के ईश्वर (खुदा) स्वयं कुछ कह
सुन नहीं सकता।
कैसा-कैसा वर्णन कर दिया है, यह समझ में नहीं आता। कैसा ऐसा कैसा कर दिया है, समझ में
नहीं आता॥ २ ॥
अलिफ अल्ला की वाणी बिन मुख के कैसे प्रकाश में आई-अगर मुख में जुबान नहीं है तो कहने
का क्या आधार है॥ ३ ॥
॥ चौपाई ॥
तकी मियाँ हक बोल सुनावौ। अल्ला तौ बेचून बतावौ॥
उनके बदन जुवाँ नहिं भाई। कैसे कितेब कुरान बनाई॥
कागद स्याही कस लिख मारा। बिन जुबान कैसे बिस्तारा॥
अल्ला मियाँ कितेब बनाई। कहौ जुबाँ बिन कैसे गाई॥
ये तौ दिल बिच साँच न आवै। तुलसी तकी बोल नहिं भावै॥
बिन जुबान मुख कहा कुराना। अल्ला के नहिं बदन जुबाना॥
चूँ बेचून नमून न ज्वाबा। सुनौ तकी म्याँ कहै किताबा॥
वहि कितेब कह खुदा जुबाना। अल्ला मुख से भये कुराना॥
जो जुबान नहिं उनके भाई। तौ कस कहे कुरान बनाई॥
या की तकी तोल बतलावौ। दिल में समझ बूझ समझावौ॥
दिल और रूह राह बतलैयै। तब कुरान का गाना गैयै॥
रूह रकान असमान ठिकाना। केहि बिधि गई राह पहिचाना॥
सो घर का म्याँ भेद बतावौ। चौधा तबक तोल समझावौ॥
सुनकर तकी तका नहिं बोला। मुख भया बंद जुबाँ नहिं खोला॥
तुलसी कहै कहौ कस भाई। जा से दिल बिच होइ निसाई॥
सुनकर तकी ज्वाब अस दीन्हा। मुरसिद मियाँ मरम हम चीन्हा॥

१४० / घट रामायण
तुलसी तकी दीन जब देखा। तब भाखा बिधि भेद बिसेखा॥
साँची महजित तन को जाना। जा में चौधा तबक समाना॥
मक्का भिस्त हज्ज येहि माई। मुल्ला काजी राह न पाई॥
मुहम्मद नूर जानि सब केरा। दोजख भिस्त में किया बसेरा॥
नूर नबी ने सब का कीन्हा। तुम हलाल बकरी कस कीन्हा॥
गुनहगार दोजख की रीती। करौ खून ये बहुत अनीती॥
जो महजित उन आप बनाई। सो हलाल करि कै तुम खाई॥
मिट्टी महजित कबर बनाई। झूठा हक ईमान बताई॥
साँची महजित तन मन साईं। खिलकत खुदा खलक के माईं॥
नूर नबी सब माहिं बिराजा। जाकी हर दम उठै अवाजा॥
नूर नबी सब माहिं बिचारा। तब दोजख से होईहै न्यारा॥
नासुत मलकूत जबरुत भाई। लाहुत राह नबी की पाई॥
लामुकाम रब साहिब साँई। वाको खोज भिस्त तब पाई॥
सेख तकी तक थक रहे भाई। ज्वाब स्वाल मुख से नहिं आई॥
अर्थ-हे शेख मियाँ। हक के विषय में बोलकर बताओ। अल्ला मियाँ को बेचून कहते हो। उनके न
मुख है, न जुबान है-उन्होंने कितेब (धर्मग्रन्थ) और कुरान कैसे बनाया॥
उन्होंने कागज पर स्याही से कैसे लिख डाला, और बिना जुबान के उसका कैसे वर्णन करके
विस्तार किया। यदि अल्ला मियाँ ने कितेब (धर्मग्रन्थ) बनाया है तो बताओ कि बिन जुबान के कैसे
गाया॥
यह बात तो दिल में सच्ची तरह से उतरती नहीं-तुलसी साहब कहते हैं किमेरे इस प्रश्न पर तकी
मियाँ बोल नहीं पा रहे थे। यदि अल्ला मियाँ के न मुख है, न जुबान तो बिना जुबान के उन्होंने कुरान
कैसे कहा?
चून, बेचून और नमून का कोई जवाब नहीं है। हे तकी मियाँ, सुनो, यह किताबें बताती हैं। उसी
कितेब (धर्मग्रन्थ) को खुदा की जुबान कहा जाता है और यह भी कहा जाता है कि अल्ला मियाँ के
मुख से कुरान निकला था। हे भाई! यदि उनके पास जुबान नहीं है, तो उन्होंने कुरान कैसे कहा था। हे
तकी मियाँ! इसका रहस्य समझाइये।
दिल और आला की राह भी बतलाइये तब समझकर कुरान की आयतें गायें। आत्मा रकान
(नियंत्रक) आसमान पर रहती है। यह किस तरह अपने राह से आसमान तक गई क्या आपने इसे जाना
है? हे मियाँ! उस घर का आप भेद बताइये चौदह तबकों (पृथ्वी और सृष्टि) का तोल (मानदण्ड) भी
बतलाएँ॥
इसे सुनकर, तकी ने तुलसी साहब को देखा किन्तु बोल नहीं सके-मुँह बन्द हो उठा, जुबान नहीं
खुली। तुलसी साहब ने प्रश्न किया कि हे भाई! कुछ कहो न, जिससे दिल को कुछ शान्ति मिल जाएँ।
उसे सुनकर तकी ने इस प्रकार जबाब दिया। हे मियाँ इस मुरशीद (पथ प्रदर्शक) ने आपके रहस्य को
पहचान किया है-तुलसी साहब ने जब तकी मियाँ को असहाय की तरह देखा तब उन्होंने विशेष रूप
की विधियों का वर्णन किया।
हे मियाँ! इस शरीर को ही सच्ची मस्जिद समझो, इसी में उसके चौदह तबके समाए हुए हैं।
मक्का, हज, स्वर्ग सभी इसी में हैं। इसके भेद की राह मुल्ला काजी आदि नहीं पा सके। सबको

घट रामायण / १४
मुहम्मद साहब ने प्रकाश समझकर स्वर्ग तथा पृथ्वी दोनों पर अपना निवास बनाया। उस नबी (ईश्वर के
दूत) ने सबको नूर दिया फिर तुमने बकरी को उससे अलग समझकर क्यों उसका हलाल किया॥ इस
नरक के ये गुनहगार हैं-तुम रक्तपात करते हो, यह बड़ी अनीति है।
जिस (शरीर रूपी) मस्जिद को ईश्वर ने स्वयं बनाई है, उस (बकरे के शरीर) को हलाल करके
तुम खा जाते हो। तुम झूठे ईमान और अधिकार से प्रेरित मृत (मिट्टी) की शरीर (मस्जिद) को का
बनाते हो।
इस स्वामी की सच्ची मस्जिद यही तन-मन है और उसी के द्वारा खुदा इस संसार के बीच
खिलकत (आनन्दित) है। समस्त नूर एवं नबी उसी में विद्यमान हैं-जब तक ऐसा नहीं समझोगे उस
इस संसार से अलग कहते रहोगे।
नासुत (संसार), मलकूत (देवलोक) जबरूत (स्वर्गलोक) तथा लाहूत (मृत्युलोक) इन
चारों ने यहीं ही नबी (ईश्वर के दूत) की राह पाई थी।
वह स्वामी (मालिक) बिना मुकाम का है (सब जगह है, कोई निश्चित स्थान उसका मुकाम नहीं
है) उसी की खोज से तुम स्वर्ग की खोज पा सकते हो।
इतनी बातें सुनकर मियाँ शेख तकी पूरी तरह से थक रहे और उनके मुख से प्रश्न एवं उत्तर दोनों
नहीं निकल रहे थे॥
॥ पश्तो १ ॥
खोल देखो रे किताबें, आद अव्वल कौन था (मियाँ)।
नहिं जमीं असमान खिलकत, खुद खुदा तब था कहाँ ॥ १॥
कुफल खोले रे कुराना, मूल म्याना भेद का।
था कलम स्याही न कागज, और न था आदम मियाँ ॥ २॥
नहिं मुहम्मद रब न रे जब, नहिं पैगम्बर पीर थे।
नहिं नबी का नाम निसबत, भिश्त दोजख नहिं रचे ॥ ३॥
काजी मुल्ला रे बेहोशो, खोज करो दिलदार का।
मन मुआ मनसूर जब से, आशिक जो चश्मे यार का ॥ ४ ॥
अर्थ-हे मियाँ शास्त्र की पुस्तकों को खोल कर देखो, सबसे पहले कौन था? उस समय न पृथ्वी
थी, न आसमान था तब उस समय खुदा कहाँ था ॥ १ ॥
कुरान के कुफल के (रहस्य) को खोलो, उस मूल म्याना (तत्त्व) का रहस्य क्या था। उस समय
न कलम थी, न स्याही थी, न कागज था, और न कोई मनुष्य था ॥ २ ॥
न मुहम्मद साहब रब (स्वामी) थे, न पैगम्बर और पीर थे, न नबी का निश्वत (अस्तित्व) नाम
था। न स्वर्ग तथा पृथ्वी लोक रचा गया था ॥ ३ ॥
हे ना समझ (बेहोशो) काजी-मुल्ला, उस दिलदार (ईश्वर) की खोज करो-जब से वह मुआ मन
चश्मे यार (सर्वदर्शक ईश्वर का) मंसूर बना ॥ ४ ॥
॥ पश्तो २ ॥
यह खुदा ना है रे कुदरत, खुद खुदा कोइ और है (मियाँ)।
जिन खुदा को तख्त बख्शा, वह सकस कहो कौन है ॥ १ ॥
दिल दिया और रूह रोशन, है हसन तन हुस्न को।

१४२ / घट रामायण
अब तबक चौधा दिये हैं, आदि खुदा को जानिये ॥ २ ॥
कुल जहाँ आलम है कुन से, पट अबर अल्ला से है।
यह हर इक ना कोइ किसी पै, भेद दोस्ती दिल मिलै ॥ ३ ॥
महरम मियाँ मनसूर आशिक, वह है बेचूँ बेनमूँ।
यह किताबों में नहीं है, खुद खुदा का राज है ॥ ४ ॥
अर्थ-हे मियाँ! यह खुदा स्वयं कुदरत (प्रकृति) नहीं है-स्वयं खुदा (ईश्वर) इससे भिन्न कोई
अन्य और है। जिन खुदा को आदि शक्ति ने संसार का अधिक सौंप दिया, बताओ वह शख्स कौन है?
जिसने सबको दिल दिया, आत्मा को प्रकाश दिया, इस शरीर को सौन्दर्य प्रदान किया, जिसने
चौदह तबकों को आकाश के नीचे की धरती को प्रदान किया, उस आदि खुदा को समझें ॥ २ ॥
यह सम्पूर्ण संसार ईश्वर के मुँह से निकलने वाले शब्दों से सम्बद्ध हैं और इस सारे संसार का
नियंत्रण उसी ईश्वर से ही जुड़ा है यहाँ कोई किसी का नहीं है और दिल मिलने के बाद ही एक दूसरे से
लोग जुड़ जाते हैं।
लोग राज़दार हैं, उनके दिल की बातें मालूम नहीं होतीं और उनका प्रिय भी विलक्षण है और वह
ईश्वर तो बड़ा विलक्षण तथा सारे मन की बातें समझ लेता है। ये बातें किसी धर्मग्रन्थ में नहीं लिखी गई
हैं-यह ईश्वर का प्राकृतिक रहस्य है।
॥ पश्तो ३ ॥
ऐन अन्दर चश्म को रे, खोल देखो कौन है (म्याँ)।
कुल खलक आलम इसम बिच, दिल हिये में खसम है ॥ १ ॥
नहिं किताबों में रे है कुछ, कुल कुरानै छूछ है।
वह पिया आलम की आँखियाँ, और कहीं नहिं पूछ ले ॥ २ ॥
हुस्न है रे हंस जा से, हुस्न तन बिच में रहा।
भूल अपनी आद अव्वल, कट मेरे मन मौज में ॥ ३ ॥
होश गाफिल है रे दोजख, दिल दिया नहिं यार को।
बूझ बिल-आखिर खराबो, इश्क ज्यों मनसूर हो ॥ ४ ॥
अर्थ-हे मियाँ! ऐन (आँखों) के अन्दर अपने चश्म (नेत्र शक्ति) को खोल देखो। सम्पूर्ण सृष्टि में
उसका आलम (संसार) इसके बीच स्थित है और उसके दिल में उसका खसम (स्वामी) स्थित
है॥ २ ॥
हे मियाँ! इन कुरान जैसी किताबों में यह कुछ भी नहीं है और सारी कुरानें इस दृष्टि से खाली पड़ी
हैं॥ यदि कोई (सिद्ध साधक मिल जाए) मिल जाए तो उससे पूछो तो वह बताएगा कि वह ईश्वर
आलम (सृष्टि) की आँखों में ही है॥ २॥
हे हंस (आत्म) जिससे हुस्न (सौन्दर्य) बरकरार है और इस शरीर के बीच में हुश्न (सौन्दर्य)
बरकरार है तू आदि मूल आदिम स्थिति को भूल रहा है और मन की मौज में कटकर रहा है॥ ३॥
हे गाफिल (बेखबर) तुझे (इस नरक का होश नहीं है और उस परमात्मा रूपी मार को अभी तक
अपना दिल नहीं दिया है। अब अन्तिम समय की स्थिति के बारे में समझो-तुम्हारा प्रेम अब कैसे मनसूर
(एक साधक का नाम) हो॥

घट रामायण / १४३
॥ पश्तो ४॥
देख कुछ नहिं इस जहाँ में, सब फना हो जायँगे (मयाँ)।
रहै रब का नाम मरदो, लोग लशकर कूँच है॥ १॥
चार दिन खूबी खलक में, अन्त मरना इक है (मयाँ)।
ज्यों धुएँ का मेघडम्बर, कुल मिटै इक पलक में॥ २॥
तन को देखो आशिको, बस खून चमड़ी हाड़ है।
जब निकल जाबै पवन, तब गांड़ मिट्टी में मियाँ ॥ ३॥
यार अजीजों ने कफन में, बाँध धरा ताबूत पर।
जोरू अम्मा कुल कुटम सब, मनसूर तन मन झूठ हैं (मयाँ) ॥ ४॥
अर्थ--हे तकी मियाँ? देखो इस जगत में कुछ भी स्थायी नहीं है और एक दिन सब कुछ गायब हो
जाएँगे। हे पुरुषों! केवल रब (परमेश्वर) का ही नाम बचेगा और यहाँ सारे मनुष्य और उनके समूह
कूच कर जाएँगे॥ १॥
इस संसार की खूबी केवल चार दिनों तक के लिए ही है, और अन्त में एकमात्र मृत्यु ही शेष है।
जैसे, धुएँ के बादल की घटाएँ एक ही पल में सारी की सारी नष्ट हो उठती हैं॥ २॥
हे प्रेमियों! इस शरीर की तरफ देखो, इसमें केवल इसमें खून है, चमड़ी और हड्डियाँ ही हैं और इस
शरीर से जब वायु निकल जाती है तो हे मियाँ! इसे मिट्टी में गाड़ देते हैं॥ ३॥
मंसूर कहते हैं कि हे यार अपने साथियों में फिर कफन में बाँधकर उसे ताबूत पर रखा और फिर
पत्नी, माँ, परिवार, कुटुम्ब, शरीर, मन आदि सभी झूठे हो उठते हैं॥ ४॥
॥ पश्तो ५ ॥
खोज मुरशिद रे मुरीदो, राह रोशन यार को (मयाँ)।
रूह मेहर मुरशिद के दस्तों, दिल फिजल दिलदार में॥ १॥
रूह चढ़ावौ रे अबर को, हो खबर उस यार को।
लावै जब रब राह चीन्है, फल में लखै इसरार को॥ २॥
कुफल खोले रे अधर के रूह से फोड़ असमान म्याँ।
जान मलकूत नासूत को, जबरूत की कर कदर म्याँ ॥ ३॥
जा मिलै लाहूत रे जब, होश हो हाहूत का।
लौ लगी जो ला के अन्दर, रब मिले मनसूर को॥ ४॥
अर्थ--हे मुरीदों (शिष्यों) मुरशिद (गुरु) की रोशनी भरी राह को खोजो। उस दिलदार की आत्मा
प्रकाश है, मुरशिद (पथ-प्रदर्शक गुरु) के दस्त हैं और उस दिलदार में दिल फजल (कृपा) हैं।
उस परमात्मा के प्रति अपनी आत्मा समर्पित करो जिससे उस साथी को इस बात की खबर हो जाए
और जब उसे रब (परमेश्वर) मार्ग पर ले आए तो वह मार्ग पहचान कर उस इसरार (परमेश्वर) को
पल भर में देख ले॥ २॥
हे शेख तकी मियाँ! वह अन्तरात्मा के कुफर (धर्म के प्रति दुर्भाव) खोले और आत्मा से
शून्याकाश को फोड़ दे॥ तुम इस प्रकार मलकूत (देवलोक) तथा नासूत (मृत्युलोक) को समझो और
जबरूत की इज्जत करो॥ ३॥

१४४ / घट रामायण
जब साधक को हाहूत ( स्वर्गलोक ) का होश हो तब वह लाहूत ( मृत्यु लोक ) परमात्मा से जाकर
मिल जाए। मंसूर साहब कहते हैं कि यदि अल्हा के आनन्द की लौ लगी है, तो निश्चित ही रब
( परमेश्वर ) उसे मिल जाएगा ॥ ॥४॥
॥ दोहा ॥
रब्ब राह लौ लाह में, खुदा खोज दिल माह।
रब खोदाइ से अलग है, खुद खुदाइ तेहि नावँ ॥ १ ॥
बूझौ खोज किताब में, सब कुरान कुल झार।
कर तलास काजी सुनौ, कहि मनसूर पुकार ॥ २ ॥
अर्थ-'रब' की ओर जाने वाले मार्ग पर लौ लगाकर दिल के अन्दर खुदा की खोज करो। यह रब
( परमात्मा ) खुदाई से अलग है और खुदा तो स्वयं उसे के अन्दर हैं ॥ १ ॥
मंसूर पुकार कर कहते हैं कि मेरी बात सुनो ईश्वर को पुस्तकों में खोजो खोजकर समझो, कुरान
में भी अच्छी तरह ठोंकपीट कर समझ लो उसके बाद उसकी इनसे अलग तलाश करो ॥ २ ॥
॥ सोरठा ॥
तुलसी तकी निहार, कहि पुकार मनसूर ने।
मुरसिद खोज बिचार, बन मुरीद मुरसिद मिलै ॥
अर्थ-तुलसी साहब तकी शेख को पुकार कर कहते हैं कि मन में अच्छी तरह देखो विचारपूर्वक
धर्मगुरु की खोज करो, मन के मुताबिक वह धर्मगुरु मिलेगा।
॥ चौपाई ॥
तुलसी कहै तकी सुन बाता। खुद खुदाइ मालिक है दाता ॥
उनका खोज खुदा नहिं पाया। नहिं कितेब लिखने में आया ॥
काजी मुल्ला खोज न पावै। दे दे बाँग खुदा गोहरावै ॥
अब खुदाइ का खोज बताओं। खुदा राह और भिस्त लखाओं ॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि हे तकी! मेरी बातें सुनो, खुदा स्वयं स्वामी और दाता दोनों हैं। उस
मूल खुदा की खोज खुदा भी करके नहीं प्राप्त कर सका है, और लिखी हुई धर्म की पुस्तकों में कहीं
भी पढ़ने में नहीं आया है॥ अब मैं आपको खुदा की खोज बताता हूँ और स्वयं आपको खुदा का मार्ग
तथा स्वर्ग को दिखाता हूँ।
॥ रेखता ॥
अजब अनार दो भिस्त के द्वार पै।
लखै दुरवेस फक्कीर प्यारा ॥ १ ॥
ऐन के अधर दोउ चस्म के बीच में।
खसम को खोज जहँ झलक तारा ॥ २ ॥
उसी बिच फकत खुद खुदा का तखत है।
सिस्त से देख जहँ भिस्त सारा ॥ ३ ॥

घट रामायण / १४५
तुलसी तत मतं मुरसिद के हाथ है।
मुरीद दिल रूह दोजख नियारा ॥ ४ ॥
अर्थ—स्वर्ग के द्वार पर दो आश्चर्यजनक अनार हैं— जिसे प्रभु के प्यारे फकीर एव दरवेश देखते हैं॥
ऐनक के नीचे दोनों चश्मों के बीच, उस स्वामी को खोजो, वहाँ (स्वतः) एक तारा झलक रहा
है॥
उसी के बीच में फकत स्वयं खुदा का तख्त है, उसे सिस्त से देखो जहाँ सम्पूर्ण स्वर्ग है ॥ ३ ॥
तुलसीसाहब कहते हैं कि यह मत मुरशिद (धर्मगुरु) के हाथों में है और ईश्वर के मुरीद के दिल
और आत्मा दोनों इस जगत से भिन्न हैं॥ ४ ॥
॥ सोरठा ॥
तुलसी भिस्त मिलाप, खुदा खोज येहि बिधि मिलै।
चौधा तबक निवास, कहौ कुरान किस बिधि कहै॥
अर्थ—तुलसी साहब कहते हैं कि आत्मा और स्वर्ग के मिलन में खुदा को खोजो, वह इस प्रकार
प्राप्त हो सकता है, उस खुदा का निवास तो चौदह तबको (पृथ्वी की परतों) में है—बताइए वह कुरान
द्वारा किस प्रकार पाया जा सकता है?
॥ चौपाई ॥
तुलसी तबक तरक पहिचानौ। तब मियाँ तकी भिस्त को जानौ ॥
बिन मुरसिद पावै नहिं घाटा। ये सब समझ खोज ले घाटा ॥
सुनकर तकी बहुत भये दीना। बन्दा गुनहगाह नहिं चीन्हा ॥
चरन पकड़ पुनि सीस गिरावा। तुम फकीर हम मरम न पावा ॥
तुम खुदाई की जाति अजाती। हम इनके सँग भये सँगाती ॥
अर्थ—तुलसी साहब कहते हैं कि हे शेख तकी! पहले 'तबक' का मर्म समझो, तब स्वर्ग को
समझो। बिना मुरशिद (गुरु ....) के साधक किनारा नहीं प्राप्त कर सकता—यह परमात्मक की खोज
के मार्ग पर आने से होता है॥
इसे सुनकर तकी मियाँ बड़े दुखी हुए, और बोले, यह बन्दा! गुनहगार है क्योंकि आपको पहचान
नहीं सका। उन्होंने तुलसी साहब के चरणों को पकड़ कर अपना सिर उस पर गिरा दिया और बोले,
आप सिद्ध फकीर हैं, मैं आपका मर्म नहीं समझ सका। आप स्वयं अज्ञेय खुदा की जाति के फकीर हैं,
मैं तो इन सबका साथी बनकर आपके पास आया था॥
॥ दोहा ॥
तकी कहै तुलसी मियाँ, तुम गुरु पीर हमार।
गुनह बक्स अपना करौ, बंदा तकी तुम्हार ॥ १ ॥
तकी दीन तुलसी लखा, पका दीन मत माँईं।
झका तका अपनी तरफ, गुनहगार तुम पाईं ॥ २ ॥
तकी तबक जाना नहीं, नबी नूर नहिं पाइ।
भिस्त दोजख में तुम रहे, कैसे मिलै खुदाइ ॥ ३ ॥

१४६ / घट रामायण
अर्थ-तब तकी ने कहा कि तुलसी साहब आप हमारे गुरु और पीर हैं। मेरी गलतियों को क्षमा
करके मुझे अपना बना लें और यह बंदा तकी अब आपका है॥ १॥
तुलसी साहब ने जब तकी को उस दुखी अवस्था में देखा समझा कि यह पूरी तरह से मेरे मतों में
'पक गया है। तब बोले कि तुम अपने को गुहगार पाते हो, अब इससे ऐसा लगता कि तुमने अपनी तरफ
से (मन के अन्दर) झाँका और देखा है, आत्मालोचन किया है॥ २॥
तुलसी साहब कहते हैं कि हे तकी! तुमने तबक (सृष्टि की परतें) नहीं समझा और नवी
(धर्मगुरु) तथा नूर को भी नहीं प्राप्त किया है-स्वर्ग समझ कर इसनरक में तुम रहते रहे, तुम्हें खुदा
कैसे मिल सकते हैं॥ ३॥
॥रेखता नसीहत॥
तुलसी तबक जाना नहीं, बेहोस गाफिल हो रहा।
जिस ने तुझे पैदा किया, उस यार को चीन्हा नहीं॥ १॥
नाहक अदम दम खोवता, मुरसिद पकड़ नहिं डूबही।
तुलसी खलक कुल ख्याल है, आसिक मुहब्बत कर सही॥ २॥
खोजो मुहम्मद दिल-रहम, जिस इस्म से आलम हुआ।
तुलसी नबी निरखै नहीं, जहाँ लग मुसल्लम है नहीं ॥ ३॥
रब रूह मरहम ना हुआ, रब देख अंदर है सही।
तुलसी तकी बूझा नहीं, जग में जिया तो क्या हुआ ॥ ४॥
गन्दा नजिस क्यों हो रहा, इस जक्त में रहना नहीं।
अरे ऐ तकी तल्लास कर, तुलसी फना होना सही ॥ ५॥
चारो चसम को खोल कर, देखो जुलम जालिम वही।
जबरील को तैंना लखा, तुलसी खबर खोजा नहीं॥ ६॥
रोजा निमाज हर दम किया, उस यार को दिल ना दिया।
खोजा नहीं अपना पिया, तुलसी तकी दोजख लिया॥ ७॥
नासूत मलकूत जबरूत हैं, लाहूत लौं तैं ना लिया।
हाहूत हिये खोजा नहीं, ला में रबी जीता पिया॥ ८॥
तुलसी तकी तालिम दिया, हर दम गुनह बंदा हुआ।
मुरसिद मुरीदी दस्त है, पावै तकी अपना किया॥ ९॥
तुलसी रहम राजी हुआ, तोला तकी अपना किया।
दिया दस्त दरदी जान कै, तुलसी तकी मुरसिद हुआ॥ १०॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि हे शेख तकी तुमने तबक (सृष्टि) नहीं समझा और अपने गर्व में
बराबर बेहोश तथा गाफिल (भयग्रस्त) होता रहा। जिसने तुम्हें जन्म दिया है, इस दोस्त ईश्वर को तुमने
पहचाना नहीं॥
॥ दोहा॥
तकी दीन तुलसी लखा, दीन्हा पंथ लखाइ।
सुरति सैल असमान कर, चढ़े गगन को धाइ॥