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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 133

१४० / घट रामायण
तुलसी तकी दीन जब देखा। तब भाखा बिधि भेद बिसेखा॥
साँची महजित तन को जाना। जा में चौधा तबक समाना॥
मक्का भिस्त हज्ज येहि माई। मुल्ला काजी राह न पाई॥
मुहम्मद नूर जानि सब केरा। दोजख भिस्त में किया बसेरा॥
नूर नबी ने सब का कीन्हा। तुम हलाल बकरी कस कीन्हा॥
गुनहगार दोजख की रीती। करौ खून ये बहुत अनीती॥
जो महजित उन आप बनाई। सो हलाल करि कै तुम खाई॥
मिट्टी महजित कबर बनाई। झूठा हक ईमान बताई॥
साँची महजित तन मन साईं। खिलकत खुदा खलक के माईं॥
नूर नबी सब माहिं बिराजा। जाकी हर दम उठै अवाजा॥
नूर नबी सब माहिं बिचारा। तब दोजख से होईहै न्यारा॥
नासुत मलकूत जबरुत भाई। लाहुत राह नबी की पाई॥
लामुकाम रब साहिब साँई। वाको खोज भिस्त तब पाई॥
सेख तकी तक थक रहे भाई। ज्वाब स्वाल मुख से नहिं आई॥
अर्थ-हे शेख मियाँ। हक के विषय में बोलकर बताओ। अल्ला मियाँ को बेचून कहते हो। उनके न
मुख है, न जुबान है-उन्होंने कितेब (धर्मग्रन्थ) और कुरान कैसे बनाया॥
उन्होंने कागज पर स्याही से कैसे लिख डाला, और बिना जुबान के उसका कैसे वर्णन करके
विस्तार किया। यदि अल्ला मियाँ ने कितेब (धर्मग्रन्थ) बनाया है तो बताओ कि बिन जुबान के कैसे
गाया॥
यह बात तो दिल में सच्ची तरह से उतरती नहीं-तुलसी साहब कहते हैं किमेरे इस प्रश्न पर तकी
मियाँ बोल नहीं पा रहे थे। यदि अल्ला मियाँ के न मुख है, न जुबान तो बिना जुबान के उन्होंने कुरान
कैसे कहा?
चून, बेचून और नमून का कोई जवाब नहीं है। हे तकी मियाँ, सुनो, यह किताबें बताती हैं। उसी
कितेब (धर्मग्रन्थ) को खुदा की जुबान कहा जाता है और यह भी कहा जाता है कि अल्ला मियाँ के
मुख से कुरान निकला था। हे भाई! यदि उनके पास जुबान नहीं है, तो उन्होंने कुरान कैसे कहा था। हे
तकी मियाँ! इसका रहस्य समझाइये।
दिल और आला की राह भी बतलाइये तब समझकर कुरान की आयतें गायें। आत्मा रकान
(नियंत्रक) आसमान पर रहती है। यह किस तरह अपने राह से आसमान तक गई क्या आपने इसे जाना
है? हे मियाँ! उस घर का आप भेद बताइये चौदह तबकों (पृथ्वी और सृष्टि) का तोल (मानदण्ड) भी
बतलाएँ॥
इसे सुनकर, तकी ने तुलसी साहब को देखा किन्तु बोल नहीं सके-मुँह बन्द हो उठा, जुबान नहीं
खुली। तुलसी साहब ने प्रश्न किया कि हे भाई! कुछ कहो न, जिससे दिल को कुछ शान्ति मिल जाएँ।
उसे सुनकर तकी ने इस प्रकार जबाब दिया। हे मियाँ इस मुरशीद (पथ प्रदर्शक) ने आपके रहस्य को
पहचान किया है-तुलसी साहब ने जब तकी मियाँ को असहाय की तरह देखा तब उन्होंने विशेष रूप
की विधियों का वर्णन किया।
हे मियाँ! इस शरीर को ही सच्ची मस्जिद समझो, इसी में उसके चौदह तबके समाए हुए हैं।
मक्का, हज, स्वर्ग सभी इसी में हैं। इसके भेद की राह मुल्ला काजी आदि नहीं पा सके। सबको