घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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॥ सोरठा ॥
सेख तकी सुन बात, ज्वाब सवाल बोले नहीं।
धर्मा जैनी जाति, संग बात कीन्ही सही॥
अर्थ-शेख तकी उस बात को सुनकर उसके जबाब एवं सवाल (उत्तर तथा प्रश्न) के संदर्भ में
कुछ नहीं बोले—साथ में धर्मा नाम के जैनी पंडित थे, उन्होंने बातें कहीं॥
॥ चौपाई ॥
धर्मा नाम जाति इक जैनी। उन सब सुनी हमारी कहनी॥
धर्मा स्रावग कहै बिचारी। जैन मता है सब से भारी॥
ये मति आदि साध नहिं जानै। तैं मत झूठा बाद बखानै॥
चौबीसों तीर्थंकर जानी। आदि नाथ हैं हमरे स्वामी॥
तिनकी आदि कहा तुम जानौ। नाहक बेगुन बादि बखानौ॥
अर्थ-धर्मा नाम का एक जैन धर्ममतावलम्बी थे। उसने हमारी बातचीत सुनी। श्रावक धर्मी
विचारपूर्वक बोले, कि जैन मत सर्वश्रेष्ठ है। जो धार्मिक मत साधुओं का आदि रूप नहीं जानता, वह
मत झूठे सिद्धान्तों का वर्णन करता है। चौबीसों तीर्थंकरों को समझो और हमारे स्वामी तो आदि नाथ हैं।
उनके आदि उपदेश (कहा) तुम समझो निरर्थक बिना तत्त्व के सिद्धान्तों को बता रहे हो॥
॥ सोरठा ॥
हृिदै कहै सुनु बात, जैन मता पुनि सब कहौं।
सुनौ भेद बिख्यात, आदि अंत सब समझि कै॥
अर्थ-हृदय अहीरने कहा मेरी बातें सुनो, जैन धर्म के विषय में मैं पुनः सच कहता हूँ, इसके विज्ञान
भेद को, इसके आदि अन्त को समझकर सुनो॥
॥ चौपाई ॥
हिरदै कहै सुनौ हो भाई। आदि नाथ की आदि सुनाई॥
जो तुम सुनौ कहौं बिधि नाना। हम सब कहैं सुनौ दै काना॥
प्रथम जुगल्या धर्म बिचारी। आई छींक भये सुत नारी॥
होते छींक प्रान तेहि जाई। कन्या पुत्र भये तेहि ठाईं॥
ता पीछे कुलंकर की बाता। चित दे सुनौ कहौं बिख्याता॥
चौथा कुलंकर भेद बखाना। ता में नभ राजा इक जाना॥
मुरा देबि देहिं भाखौं भेवा। जाकर ऋषभराय भये देवा॥
भागवत कहै ताहि अवतारा। तिन का सुनौ आदि निरबारा॥
ता ने तप कीन्हौ निरबाना। मुक्ति पाइ पुनि काल समाना॥
ऐसे भये और चौबीसा। पुनि पुनि आये मुक्ति पद ईसा॥
ता में प्रथम ऋषभदेव होई। भाखा तिन जग थापा सोई॥
आगे भेद न उनहूँ जाना। यह सुन सार भेद निरबाना॥