सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

पृष्ठ 129, कुल 150 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 129

१३६ / घट रामायण
सब चलि आये कुटी के पासा। जब तुलसी मन कियौ हुलासा ॥
उठि के चरन गहे सब केरे। कीन्ही दया दीन तन हेरे ॥
बाम्हन पंडित धर्मा जैनी। सेख तकी से कीन्ही सैनी ॥
नैनू पंडित सैन सँवारा। धर्मा हिये उठै जस झारा ॥
यह दोनों मिलि मता बिचारी। सेख तकी को आगे डारी ॥
नैनू नोक टोक इक झारा। यह इनके हैं गुरू बिचारा ॥
पूछे भेद कहैं निरवारा। इन कस भाखा झूठ पसारा ॥
अर्थ-शेख तकी और पंडित एक हो गए और धर्मा ने धर्म की टेक बाँध ली। ये तीनों तुलसी
साहब के पास गए इनके हृदय उद्विग्न थे और बाहें चढ़ी हुई थीं।। उनके साथ और अनेक मूर्ख जन थे-
कोई सीधे चलता था को कोई टेढ़े चलता था। हृदय अहीर के साथ सब एक हो चले और वहाँ आए,
जहाँ तुलसी ने अपनी कुटी सँवार रखी थी॥
हृदय अहीर के साथ बड़ी भीड़ थी, तब तुलसी साहब ने मन-ही-मन विचार किया। सब उनकी
कुटी के पास चलकर आए तब तुलसी ने मन में आनन्द प्रगट किया।। उन्होंने उठकर सबके चरणों में
प्रणाम किया (स्पर्श किया) और कहा कि आप सब इस दीन की ओर देखकर दया करें॥
ब्राह्मण, पंडित, जैनी धर्मा और शेख तकी की ओर देखा। नैनू पंडित ने नेत्रों से इशारा किया और
धर्मा जैनी के हृदय में आग की लपट जैसी उठ पड़ीं॥ उन दोनों ने मन में विचार करके शेख तकी को
आगे कर दिया।
नैनू पंडित ने पहले नोक झोंक शुरू कर दी-ये बेचार के इनके (हृदय अहीर के) गुरु हैं। इनसे
ज्ञान के भेदों की बात आप पूछिये ये इसका निराकरण करेंगे और आप इनसे पूछे कि इन्होंने इस प्रकार
असत्य का प्रसार क्यों किया है।
॥ सोरठा ॥
हिरदै कहै निहोर, स्वामी तुलसी विधि सुनौ।
मैं कछु कही न और, ये अबूझ बूझी नहीं ॥
अर्थ-हृदय अहीर ने सम्बोधित करके कहा कि हे स्वामी तुलसी साहब? इसे विधिपूर्वक सुनें-मैंने
अपनी तरफ से कोई नई बात नहीं कही (आपकी ही बातें बताई) किन्तु उस अबूझ वाणी को ये सब
समझ नहीं पाए॥
॥ चौपाई ॥
हिरदे कहै सुनौ हो स्वामी। मैं कछु कही रीति गति ज्ञानी ॥
नैनू पंडित कहै बिचारी। इन सब ज्ञान कही गति न्यारी ॥
इन सब धर्म कर्म जग पेला। अस कस ज्ञान कहै यह चेला ॥
इन सब बेद कितेब उठावा। जौगी जैन नहीं ठहरावा ॥
और अनेक बात नहिं मानै। अस कह मन्त्र सुनायौ कानै ॥
तब तुलसी सुनि आदर कीन्हा। प्रीति भाव उठि आसन दीन्हा ॥
दीन बिधी सब अपनी गाई। चरन परसि कै सीस चढ़ाई ॥
मैं अनाथ हौँ तुम्हरौ बारा। छिमा करौ मैं दास तुम्हारा ॥