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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 128

घट रामायण / १३५
जग थापा पुनि धर्म चलाई। आदि पुरान में देखौ भाई॥
कह नौकार जाए बतलाई। जाकी विधी कहाँ समझाई॥
जाप भेद मैं कहौं पुकारी। दिल अपने में लेउ बिचारी॥
अरिहँत सिद्ध भाखि बिधि नामा। अरियानं उज्झान जाना॥
लोये सर्व साध को कीन्हा। ये नौकार मन्त्र उन लीन्हा॥
सुनि धर्मा तब चकृत भयऊ। सब बरतंत जैन कौ कहेऊ॥
अर्थ-हृदय ने कहा, हे भाई? सुनो, आदि नाथ की आदिकथा मैं सुनाता हूँ। यदि तुम उसे सुनना
चाहते हो तो मैं उसे नाना विधियों से कहता हूँ। (इस कथा को) हम सब कहते हैं, हृदय से ध्यान
लगाकर सुनो ॥
प्रथम 'जुगल्या' धर्म पर विचार करता हूँ। छींक आई और उससे चार बच्चे पैदा हुए। छींक आते ही
उसके प्राण विनष्ट हो उठे और उस स्थल पर कन्या तथा पुत्र हुए। उसके पीछे कुलंकर की बातें कहता
हूँ। लोक में प्रसिद्ध कथा को चित्त लगाकर सुनो।।
मैं चौथे कुलंकर की बात कहता हूँ-उसमें नभ नामक एक राजा था। उसको मुरा देवी ने सारा ज्ञान
रहस्य बताया-जिसके ऋषभ राय हुए। भागवत में ऋषभराय अवतार बताए गए हैं-उनके विषय में मूल
निराकरण सुनें। उन्होंने तपस्या करके निर्वाण प्राप्त किया और मुक्ति पाकर वह काल में समाहित हो
उठे। इसी प्रकार अन्य चौबीस तीर्थंकर हुए और वे मुक्त होकर बार-बार ईश्वर में विलीन हुए ॥
इन समस्त तीर्थंकरों में सर्वप्रथम ऋषभदेव हुए-उन्होंने जिस मत का उपदेश दिया, वही संसार में
स्थापित हुआ। उसके आगे उन्होंने भी भेद नहीं समझा-तुम उस निर्वाण भेद के सार तत्त्वों को सुनो।
उन्होंने जैन धर्म चलाकर संसार में उसकी स्थापना की। हे भाई! इसे जाकर आदि पुराण में पढ़ो।
उन्होंने नौ प्रकार के जापों की चर्चा की है-उनकी विधियाँ मैं समझाकर कहता हूँ। मैं जापभेदों के
विषय में पुकार कर कहता हूँ, आप इसे अपने दिल में विचार लें।
अरिहंत, सिद्ध तथा विधिपूर्वक नामों का कथन करके अरियान, उज्झान लुप्त (लोए) एवं सर्व
साध-आदि नौकार मंत्र उन्होंने बतलाया था?
इसे सुनकर धर्मा जैनी चकित हो उठा कि इसने तो जैन मत का सारा वृत्तान्त बता दिया।
॥ दोहा ॥
सुनिधर्मा यह भेद ये अभेद कछु दीन कहैं।
जैन मत समझाइ ये अकाय कछु अगम हैं॥
अर्थ-धर्मा ने इस भेदों को सुनकर कहा ये भेद अभेद्य हैं-जैनमत के अन्तर्गत ये वैचारिक
(अकाय) तथा अगम्य मत हैं (इस हृदय अहीर को कैसे ज्ञात हुआ)।
॥ चौपाई ॥
सेख तकी पंडित भये एका। धर्मा धर्म कि बाँधी टेका॥
ये तीनों तुलसी पै आये। हिरदे ऊपर बाँह चढ़ाये॥
और अनेक मूरख बहुतेरे। कोइ सूधे कोइ चलैं अनेरे॥
हिरदे अहीर चले सब झारी। जहाँ तुलसी ने कुटी सँवारी॥
हिरदे अहीर साथ झख भारी। तब तुलसी ने मता बिचारी॥