घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंघट रामायण / १२७
ऐसी किस वस्तु को बताऊँ (समझ में नहीं आती)। सन्तों के व्यवहार का मैं कैसे-कैसे वर्णन करूँ
ऐसी वस्तु किसी स्थान पर कहीं भी नहीं दिखाई पड़ती॥
॥ छन्द ॥
मोरी मति नीची माहुर सींची। संत चरन के लार भई॥
करमन कर मैली बिष रस पेली। संत चरन चित जाइ बसी॥ १॥
मति महा अति रंका मन निः संका। बिष रस कस की धार मई॥
कहँ लग गोहराऊँ अंत न पाऊँ। संत चरन की लार लसी॥ २॥
दरसन पाये करम नसाये। पाप पुन्य सब छार भई॥
मोहिं निरमल कीन्हा दयानिधि चीन्हा। ऐसे सिंध दरियाव मई॥ ३॥
तिनकी रज पावन तुलसी अपावन। मो से अधम को धाम दई॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि मेरी बुद्धि निकृष्ट है और वह विष से सींची हुई है और वह सन्तों
के चरणों में संसक्त (लार) हो उठी है। कर्मवासनाओं से मैली तथा विषय वासनाओं से रौंदी हुई संतों
के चरणों में अत्यन्त प्रेमपूर्वक जाकर बसगई है॥ १॥
मेरा यह निःशंकित मन अत्यन्त रंक है और विषय वासनाओं के रस में फँसी हुई धारामयी है। कहाँ
तक उसको बुलाऊँ (बुलाकर सुधारूँ) इसका अन्त नहीं मिलता-मेरी संसक्ति तो संतचरणों में लग
चुकी है॥ २॥
संतों का मुझे दर्शन मिला, कर्म जाल नष्ट हो चला और पाप-पुण्य सब जलकर राखमय हो उठे॥
दयानिधि सन्त ने मुझे पहचाना और मुझे निर्मल बना दिया जैसे कोई समुद्र (संत) स्वयं नदीमय (मै
साधक) हो उठे, मेरी स्थिति जैसी हो रही॥ ३॥
तुलसी साहब कहते हैं कि सन्तों की पावन चरणरज ने मुझ जैसे अपवित्र को मुक्तिलोक प्रदान
किया॥
॥ सोरठा ॥
तुलसी नीच निहार, संत सरन न्यारा किया।
महुँ पुनि उतरौं पार, संत चरन रज धूरि धर॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि इस पापी को देखकर संतों की शरणागति ने इसे विलक्षण बना
दिया। (उनकी कृपा से) मैं पुनः उनकी चरण रज को सिर पर रखकर मैं इस भवसागर के उस पार
उतरा॥
॥ दोहा॥
तुलसी मन निरमल भयौ, सूरति सार सुधार॥
संत चरन किरपा भई, उतरौ भौजल पार॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि सुरति तत्त्व को सुधार कर मेरा मन निर्मल हो उठा है। सन्त के
चरणों की यह कृपा है मैं अब भवसागर से पार उतर गया हूँ॥
॥ सोरठा॥
घट रामायन सार, ये अगार गति यों कही।
बूझै बूझनहार, बिन सतगुरु पावै नहीं॥