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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 122

घट रामायण / १२९
॥ दोहा ॥
पंडित ज्ञानी भेष, यह अदेश गति ना लखी।
स्रावग तूरक न देख, सत सार अंदर चखी ॥
अर्थ-पंडित, ज्ञानी, आडम्बर वेषधारी आदि इस अदेख (घट रामायण) की गति के अर्थ को नहीं
जानते। इस घट के भीतर चलने वाली प्रक्रिया और मूलतत्त्व को स्रावक (जैन) एवं तुर्क भी नहीं देख
पाते॥
॥ चौपाई ॥
ये सब भूल भाव गति गाई। तन भीतर काहू नहिं पाई ॥
ये तन भीतर संतन देखा। यह अदेख गति कहौं अलेखा ॥
गंगा जमुना और त्रिबेनी। तन भीतर ब्रह्माण्ड की सैनी॥
पृथ्बी पवन गगन अकासा। यह सब देखे घटहि निवासा॥
पाँच तत्त जल अगिनि समाना। पिंड माहिं ब्रह्मांड बखाना॥
रबि चंदा तारागन होई। और अनेक बिधान समोई॥
बाहिर भर्म भेद गति गावैं। पाहन पानी से लौ लावैं॥
तीरथ बरत जो चारौ धामा। यह सब पाप पुन्य निज कामा॥
पूरब पच्छिम फिर फिरि धावैं। सत्त पुरुष की राह न पावैं ॥
सत्त पुरुष सत नाम कहाई। वह अनाम गति संतन पाई॥
सत्त नाम से निर्गुन आया। यह सब भेद संत बतलाया॥
पाँच नाम निरगुन के जाना। निरगुन निराकार निरबाना॥
और निरंजन है धर्मराई। ऐसे पाँच नाम गति गाई॥
सोई ब्रह्म परचंड कहाई। ता को जपै जगत मन लाई॥
दस औतार ब्रह्म कर होई। ता को कहिये निरगुन सोई॥
तिन पुनि रचा पिंड ब्रह्मांडा। सात दीप पृथ्बी नौ खंडा॥
सब जग ब्रह्म ब्रह्म करि गाई। आदि अन्त की राह न पाई॥
यह गति मति बिधि मैं पुनि भाखा। कोई जगत न सूझी आँखा ॥
यह विधि सत मति भेद बताई। काहू के परतीत न आई॥
कासी पंडित और अचारी। जोगी परमहंस ब्रह्मचारी॥
कहै तुलसी कोइ भेद न पाया। यह सब भाव भेद भरमाया॥
अर्थ-मैंने इन सब मूल भावों की गति का गान किया-जिसे मन के भीतर (इन) किसी ने भी नहीं
प्राप्त किया है। इस शरीर के भीतर इसे सन्तों ने देखा है। इस अदेख की अलक्ष्य गति का मैं वर्णन
करता हूँ॥
गंगा, यमुना और त्रिवेणी-इस शरीर के भीतर (इड़ा, पिंगला, सुषम्ना के रूप में) इस शरीर के
भीतर ब्रह्मांड की सरणि में हैं। पृथ्वी, पवन, गगन और आकाश इनका निवास मैंने घट के अन्दर ही
देखा है॥