घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंघट रामायण / १४
मुहम्मद साहब ने प्रकाश समझकर स्वर्ग तथा पृथ्वी दोनों पर अपना निवास बनाया। उस नबी (ईश्वर के
दूत) ने सबको नूर दिया फिर तुमने बकरी को उससे अलग समझकर क्यों उसका हलाल किया॥ इस
नरक के ये गुनहगार हैं-तुम रक्तपात करते हो, यह बड़ी अनीति है।
जिस (शरीर रूपी) मस्जिद को ईश्वर ने स्वयं बनाई है, उस (बकरे के शरीर) को हलाल करके
तुम खा जाते हो। तुम झूठे ईमान और अधिकार से प्रेरित मृत (मिट्टी) की शरीर (मस्जिद) को का
बनाते हो।
इस स्वामी की सच्ची मस्जिद यही तन-मन है और उसी के द्वारा खुदा इस संसार के बीच
खिलकत (आनन्दित) है। समस्त नूर एवं नबी उसी में विद्यमान हैं-जब तक ऐसा नहीं समझोगे उस
इस संसार से अलग कहते रहोगे।
नासुत (संसार), मलकूत (देवलोक) जबरूत (स्वर्गलोक) तथा लाहूत (मृत्युलोक) इन
चारों ने यहीं ही नबी (ईश्वर के दूत) की राह पाई थी।
वह स्वामी (मालिक) बिना मुकाम का है (सब जगह है, कोई निश्चित स्थान उसका मुकाम नहीं
है) उसी की खोज से तुम स्वर्ग की खोज पा सकते हो।
इतनी बातें सुनकर मियाँ शेख तकी पूरी तरह से थक रहे और उनके मुख से प्रश्न एवं उत्तर दोनों
नहीं निकल रहे थे॥
॥ पश्तो १ ॥
खोल देखो रे किताबें, आद अव्वल कौन था (मियाँ)।
नहिं जमीं असमान खिलकत, खुद खुदा तब था कहाँ ॥ १॥
कुफल खोले रे कुराना, मूल म्याना भेद का।
था कलम स्याही न कागज, और न था आदम मियाँ ॥ २॥
नहिं मुहम्मद रब न रे जब, नहिं पैगम्बर पीर थे।
नहिं नबी का नाम निसबत, भिश्त दोजख नहिं रचे ॥ ३॥
काजी मुल्ला रे बेहोशो, खोज करो दिलदार का।
मन मुआ मनसूर जब से, आशिक जो चश्मे यार का ॥ ४ ॥
अर्थ-हे मियाँ शास्त्र की पुस्तकों को खोल कर देखो, सबसे पहले कौन था? उस समय न पृथ्वी
थी, न आसमान था तब उस समय खुदा कहाँ था ॥ १ ॥
कुरान के कुफल के (रहस्य) को खोलो, उस मूल म्याना (तत्त्व) का रहस्य क्या था। उस समय
न कलम थी, न स्याही थी, न कागज था, और न कोई मनुष्य था ॥ २ ॥
न मुहम्मद साहब रब (स्वामी) थे, न पैगम्बर और पीर थे, न नबी का निश्वत (अस्तित्व) नाम
था। न स्वर्ग तथा पृथ्वी लोक रचा गया था ॥ ३ ॥
हे ना समझ (बेहोशो) काजी-मुल्ला, उस दिलदार (ईश्वर) की खोज करो-जब से वह मुआ मन
चश्मे यार (सर्वदर्शक ईश्वर का) मंसूर बना ॥ ४ ॥
॥ पश्तो २ ॥
यह खुदा ना है रे कुदरत, खुद खुदा कोइ और है (मियाँ)।
जिन खुदा को तख्त बख्शा, वह सकस कहो कौन है ॥ १ ॥
दिल दिया और रूह रोशन, है हसन तन हुस्न को।