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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 123

१३० / घट रामायण
पाँचों तत्त्व जल और अग्नि की ही भाँति पिंड के ही भीतर वैसे ही हैं, जैसे ब्रह्मांड में। यहीं सृष्टि
की ही भाँति सूर्य, चन्द्रमा एवं तारागण हैं-तथा अन्य सृष्टि विधान भी यहाँ समाए हुए हैं॥
बाह्य संसार के भ्रम तथा भेद की गति सभी गाते हैं और वहाँ साधुजन पत्थर (मूर्तिपूजा) एवं जल
(स्नान, तर्पणादि) में अपनी धार्मिक निष्ठा लगाते हैं॥ तीर्थ, व्रत और चारों धाम में सब पाप-पुण्य की
अपनी कल्पना है॥
पूरब, पश्चिम में परिक्रमाएँ करके पुनः पुनः जाते हैं-किन्तु ये सब सत्य पुरुष का मार्ग नहीं पाते हैं।
सत्य पुरुष-सत्य नाम से जाना जाता है (कहा जाता है) और उसका कोई नाम नहीं होता (अनाम)
ऐसी अवस्था इन सन्तों ने प्राप्त कर ली है॥
इन सारे भेदों को सन्तों ने बताया है-सत्य नाम से ही निर्गुण का प्राकट्य होता है। इस निर्गुण के
पाँच नाम हैं-निर्गुण, निराकार, निर्वाण, निरंजन और धर्मराज-इस प्रकार से उसके पाँच नाम हैं॥
वही व्यापक (प्रचंड) ब्रह्म है, जिसमें संसार अपना मन लगाकर गान करता है। इस ब्रह्म के दस
अवतार होते हैं-उसी को निर्गुण ब्रह्म कहा जाता है॥
उसी ने इस पिंड और ब्रह्मांड तथा सात द्वीप, पृथ्वी एवं नौ खण्डों की रचना की है। उसी को सारा
संसार ब्रह्म है, ब्रह्म है कहकर गान करता है, किन्तु उसके आदि अन्त का मार्ग कोई नहीं जानता॥
अपने ज्ञान और अपनी बुद्धि तथा विधि द्वारा मैंने उसका वर्णन किया है-सम्भव है, यह किसी के
विश्वास का विषय न बने। काशी के विद्वान् पंडित और धर्माचरण से सम्बद्ध विद्वान योगी, परमहंस
तथा ब्रह्मचारी आदि ने उसका रहस्य नहीं प्राप्त किया है। तुलसी साहब कहते हैं कि इन सबने तो उस
ब्रह्म के स्वरूप तथा भेद के विषय में निरन्तर लोगों को भरमाया है॥
हाल काशी का
॥दोहा॥
तुलसी ग्रन्थ पसार, कासी नगर सगरे भई।
पंडित ज्ञानी भेष, जैन तुरक सब मिलि कही॥१॥
तुलसी बाम्हन साध, गंगाजी पार रहतु है।
निंदत सिम्रित बेद, यह अभेद गति कहतु है॥२॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि हमारे ग्रन्थ का प्रचार (प्रसार) काशी नगरी में चारों तरफ हुआ
और पंडित, ज्ञानी, भेष, जैन, तुर्क इन सभी ने मिलकर कहा॥१॥
एक तुलसी नाम का साधु ब्राह्मण है, गंगा नदी के उस पार रहता है-वेद स्मृतियों की निन्दा करता
रहता है और (ब्रह्म की) रहस्यमयी गति का वर्णन करता है॥२॥
॥चौपाई॥
सब पंडित मिलि मता उठाई। या को करिये कौन उपाई॥
नैनू नाम इक पंडित भारी। तेहि पंडित मिलि सोच बिचारी॥
तुलसी नाम इक साध कहाये। जिन सब नेम अचार उठाये॥
ग्रंथ बनाइ कीन्ह एक भाषा। तीरथ बरत एक नहिं राखा॥
वा कौ भेद भाव सब लीजै। केहि बिधि ज्ञान समझ तेहि कीजै॥
स्यामा समझ एक बतलाई। रहन पास कोइ ताहि बुलाई॥
पंडित एक कही समझाई। रहन अहीर सोइ भाखि सुनाई॥