सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

पृष्ठ 138, कुल 150 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 138

घट रामायण / १४५
तुलसी तत मतं मुरसिद के हाथ है।
मुरीद दिल रूह दोजख नियारा ॥ ४ ॥
अर्थ—स्वर्ग के द्वार पर दो आश्चर्यजनक अनार हैं— जिसे प्रभु के प्यारे फकीर एव दरवेश देखते हैं॥
ऐनक के नीचे दोनों चश्मों के बीच, उस स्वामी को खोजो, वहाँ (स्वतः) एक तारा झलक रहा
है॥
उसी के बीच में फकत स्वयं खुदा का तख्त है, उसे सिस्त से देखो जहाँ सम्पूर्ण स्वर्ग है ॥ ३ ॥
तुलसीसाहब कहते हैं कि यह मत मुरशिद (धर्मगुरु) के हाथों में है और ईश्वर के मुरीद के दिल
और आत्मा दोनों इस जगत से भिन्न हैं॥ ४ ॥
॥ सोरठा ॥
तुलसी भिस्त मिलाप, खुदा खोज येहि बिधि मिलै।
चौधा तबक निवास, कहौ कुरान किस बिधि कहै॥
अर्थ—तुलसी साहब कहते हैं कि आत्मा और स्वर्ग के मिलन में खुदा को खोजो, वह इस प्रकार
प्राप्त हो सकता है, उस खुदा का निवास तो चौदह तबको (पृथ्वी की परतों) में है—बताइए वह कुरान
द्वारा किस प्रकार पाया जा सकता है?
॥ चौपाई ॥
तुलसी तबक तरक पहिचानौ। तब मियाँ तकी भिस्त को जानौ ॥
बिन मुरसिद पावै नहिं घाटा। ये सब समझ खोज ले घाटा ॥
सुनकर तकी बहुत भये दीना। बन्दा गुनहगाह नहिं चीन्हा ॥
चरन पकड़ पुनि सीस गिरावा। तुम फकीर हम मरम न पावा ॥
तुम खुदाई की जाति अजाती। हम इनके सँग भये सँगाती ॥
अर्थ—तुलसी साहब कहते हैं कि हे शेख तकी! पहले 'तबक' का मर्म समझो, तब स्वर्ग को
समझो। बिना मुरशिद (गुरु ....) के साधक किनारा नहीं प्राप्त कर सकता—यह परमात्मक की खोज
के मार्ग पर आने से होता है॥
इसे सुनकर तकी मियाँ बड़े दुखी हुए, और बोले, यह बन्दा! गुनहगार है क्योंकि आपको पहचान
नहीं सका। उन्होंने तुलसी साहब के चरणों को पकड़ कर अपना सिर उस पर गिरा दिया और बोले,
आप सिद्ध फकीर हैं, मैं आपका मर्म नहीं समझ सका। आप स्वयं अज्ञेय खुदा की जाति के फकीर हैं,
मैं तो इन सबका साथी बनकर आपके पास आया था॥
॥ दोहा ॥
तकी कहै तुलसी मियाँ, तुम गुरु पीर हमार।
गुनह बक्स अपना करौ, बंदा तकी तुम्हार ॥ १ ॥
तकी दीन तुलसी लखा, पका दीन मत माँईं।
झका तका अपनी तरफ, गुनहगार तुम पाईं ॥ २ ॥
तकी तबक जाना नहीं, नबी नूर नहिं पाइ।
भिस्त दोजख में तुम रहे, कैसे मिलै खुदाइ ॥ ३ ॥