घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंघट रामायण / १३१
नाम जानि इक ह्रिदे अहीरा। निसि दिन आबै हमरे तीरा॥
सुनै कथा पुनि सेवा कटई। गत दिवस बस पासै परई॥
नैनू मिलि सब बाम्हन भाई। तिनि पुनि ह्रिदे अहीर बुलाई॥
सब पंडित अस पूछन लाई। कौन ज्ञान यह कहत गुसाँई॥
वेद भेद मरजाद उठावै। सिम्रित सास्तर ना ठहरावै॥
गंगा जमुना अन्तर मानै। है परतच्छ ताहि नहिं जानै॥
पूजा पत्री और अचारा। तीरथ बरत कहै झूठ पसारा॥
राम रहीम एक नहिं, मानै। यह कछु ठौर और कछु ठानै॥
अर्थ-सभी पंडितों ने मिल कर यह तय किया कि इसके लिए क्या उपाय किया जाए। नैनू नाम के एक बड़े पंडित थे-उन्होंने उन पंडितों के साथ मिलकर सोच विचार किया॥
तुलसी नाम के एक साधु कहे जाते हैं जिन्होंने सारे नियमों तथा आचरणों को समाप्त सा कर दिया है (उठाये)। यह सब एक ग्रन्थ बनाकर किया है और उन्होंने तीर्थों एवं व्रतादि एक भी तत्त्व की रक्षा नहीं की है॥
उनके इस प्रकरण में सारे रहस्य (भेदभाव) लें और उनका ज्ञान किस प्रकार का है, उसे समझकर उसके लिए निर्णय लीजिए॥ हे श्यामा! मैं एक समझदारी की बात कहता हूँ-उसे समझो, उनके पास जो कोई रहता हो, उसे बुलवा लीजिए॥
एक पंडित ने समझाकर कहा कि-एक अहीर उनके पास रहता है, उसी को आने के लिए कहकर बुलाओ। हृदय अहीर का नाम जानकर-जो रात-दिन पास आता था। वह मुझसे कथाएँ सुनता था और फिर वह सेवा में तत्पर रहता था और रातदिन हमारे पास ही पड़ा रहता था।
नैनू और समस्त ब्राह्मण बन्धु मिलकर उन्होंने फिर उस हृदय अहीर को बुलवाया। समस्त पंडित इस प्रकार पूछने लगे कि यह (तुलसीदास गोस्वामी) किस ज्ञान की बात करता है।
उनकी बातें सुनकर हृदय ने उत्तर दिया यह गोस्वामी वेदों के भेद की मर्यादा को समाप्त करके (उठावें) स्मृति एवं शास्त्र ज्ञान को नकारते हैं। वे गंगा और यमुना के अन्तर को मानते हैं और जो लोकधर्म प्रत्यक्षतः दिखाई पड़ता है (मूर्तिपूजा, तर्पण आदि) उनको महत्त्व नहीं देते॥
पूजा-पत्री तथा अन्य आचरण एवं तीर्थ-व्रतादि को मिथ्या प्रसार कहते हैं। राम तथा रहीम दोनों में से किसी को भी नहीं मानते हैं और वे कुछ देर तक परम्परा से हटकर कुछ अन्य बातें कहते हैं।
॥ दोहा ॥
दीन्हा ह्रिदे जवाब, साफ बात बिधि यों कही।
गति सत संत अपार, पंडित बिधि जानै नहीं॥
अर्थ-हृदय ने इस प्रकार का उत्तर दिया और सारी बातें साफ-साफ इस प्रकार कह दी। उन संत का ज्ञान अनन्त है, पंडित जन तो किसी विधि से उसे नहीं जान सकते॥
॥ चौपाई ॥
ह्रिदे अहीर ज्वाब अस दीन्हा। संत गती कोइ बिरले चीन्हा॥
मैं तौ अपढ़ जाति अज्ञाना। तुम पंडित पढ़े बेद पुराना॥
संतन की गति कहौं बुझाई। तुमहुँ ने बेद भेद नहिं पाई॥
पढ़ि पढ़ि पंडित पचि पचि हारी। बेद न भेद संत गति न्यारी॥