सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

घट रामायण / १०७
॥ सोरठा।
साहिबै एक अनाम, अगम धाम संतन लखा।
भखा भेद जिन जान, तिन तिन बरनि सुनाइया॥
अर्थ-स्वामी (ब्रह्म) एक है और अनाम है, उसका धाम अगम्य है, ऐसा सन्तों ने देखा है-जिन्होंने
उसे जाना है-उसके स्वरूप भेद जो वर्णन किया है और बार-बार उसका वर्णन करके सुनाया भी है।
॥ चौपाई॥
अब अनाम इक साहिब न्यारा। सुन और महासुन्न के पारा॥
वो साहिब संतन कर प्यारा। सोइ घर संत करैं दरबारा॥
वा घर का कोई मरम न जाने। नानक दास कबीर बखाने॥
दादू और दरिया रैदासा। नाभा मीरा अगम बिलासा॥
और अनेक संत कहि गाये। जे जे अगम पंथ पद पाये॥
तुलसी मैं चरनन चित चेरा। उन रज चरनन कीन्ह निबेरा॥
अर्थ-मेरा एक साहब (पारमात्मा) अनाम और विलक्षण है वह शून्य तथा महाशून्य के भी पार
स्थित है। वह स्वामी सन्तों को प्रिय है और सन्तगण उसी के घर में दरबार लगाते हैं॥
उस घर का मर्म कोई नहीं जानता, ऐसा नानक एवं कबीरदास कहते हैं। सन्त दादू, दरियादास एवं
रैदास, नाभादास, मीराबाई आदि उसके अगम्य आनन्द विलास को जानते हैं॥
अनेक सन्तगण भी कह गए हैं कि जिन्होंने उसके अगम्य पद को प्राप्त कर लिया है, ऐसे अनेक
सन्तगण भी कह गए हैं। तुलसी साहब कहते हैं कि मैं उनके चरणों का मन से दास हूँ और उन्हीं के
चरण रजों से इस परमतत्त्व का विवेचन किया है।
॥ सोरठा॥
संत चरन निज दास, तुलसी ताहि बिचारिया।
पायौ जिन घर बास, आदि अनामी लखि कह्यौ॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि मैं सन्त चरणों का सेवक हूँ और मैंने उन्हें मैंने अच्छी तरह से
विचार कर रखा है उस आदि तथा अनादि ब्रह्म को देखकर कह रहा हूँ कि मैंने अपने आत्मस्वरूप गृह
में निवास प्राप्त कर लिया है।
बरनन चार गति बैराग
॥ चौपाई ॥
अब बैराग जोग गति गाऊँ। ज्ञान भक्ति भिनि भिनि दरसाऊँ॥
चारि गति बैराग बताऊँ। जोगी चारि गती गति गाऊँ॥
तीनि ज्ञान का भेद बताई। चौथा ज्ञान जगत जग माईं॥
तेरा भक्ति भेद बतलाऊँ। भिन्न भिन्न कर कहि समझाऊँ॥
न्यारा भेद भाव सब केरा। जो जस जिनका भया निबेरा॥
जो जिनकी करनी जस भाँती। सो सब संतन कही सनाथी॥
मैं रज पावन उन कर चेरा। निरनय कहौं छानि इन केरा॥

१०८ / घट रामायण
अर्थ-अब मैं वैराग्य तथा योग के ज्ञान का वर्णन करता हूँ। उसी के साथ ज्ञान तथा भक्ति को भी
भिन्न-भिन्न रूपों में बतलाऊँगा। वैराग्य की चार अवस्थाओं का वर्णन करूँगा और योगियों की चार
गतियों का भी गान करूँगा ॥
ज्ञान की तीन गतियों का भेद बतलाकर और चौथे ज्ञान को जो जगत में स्थित है-उसका वर्णन
करूँगा। भक्ति के तेरह भेदों का वर्णन करूँगा और भिन्न-भिन्न करके उनके विविध रूपों का वर्णन
करूँगा ॥
सभी भक्ति के भेद भाव न्यारे हैं-जिनसे उनके स्वरूप का स्पष्टीकरण (निबेरा) हो सके, उसका
वर्णन करूँगा। जिनका जैसा स्वरूप है और जैसा भेद है-उन सबको सन्तों ने विश्वास भाव (सनाथी)
से कहा है।
मैं उन सन्तों के चरणों की पवित्र धूलि का दास हूँ, और उन्हीं का मत समझकर मैं उनका वर्णन
करूँगा ॥
॥ सोरठा ॥
भक्ति ग्यान और जोग, भोग भाव सब विधि कहीं।
जो जेहिं गति जस भोग, सो तस करौं विचारि कै ॥
अर्थ-भक्ति ज्ञान तथा योग, भोग एवं अन्य भावों का हर प्रकार से वर्णन करूँगा। जो जिस गति
एवं जिस भोग में जीवन जी रहा है, उन सबका मैं विचारपूर्वक वर्णन कर रहा हूँ॥
॥ प्रथम बैराग ॥
॥ चौपाई ॥
अब बैराग तीनि गति गाऊँ। भाखों भेद भिन्न दरसाऊँ ॥
बेरक्ती बैराग सुनाऊँ। ता कर चिन्ह भिन्न बतलाऊँ ॥
माया मोह जगत नहिं भावै। काम रु क्रोध लोभ नहिं लावै ॥
और जगत सँग रहै उदासी। जग संसार करत सब हाँसी ॥
त्यागी अति संतोष समावा। भूख प्यास निद्रा न सतावा ॥
और अनेक भाँति रस त्यागी। बन बसि रहै नाम अनुरागी ॥
बिन सतगुरू धूरि सब जाना। संत सुरति बिन भरमै खाना ॥
जो कोइ त्याग लाग मन कीन्हा। संगल दीप भोग तेहि दीन्हा ॥
जो जेहि त्याग भाग जस पावा। सुरति सब्द बिन भौं में आवा ॥
अर्थ-अब वैराग्य की तीन गतियों का वर्णन कर रहा हूँ और उनके भिन्न-भिन्न भेदों को दिखला
रहा हूँ। 'विरक्ति' वैराग्य का वर्णन कर रहा हूँ तथा उसके भिन्न-भिन्न लक्षणों को बतला रहा हूँ॥
विरक्त सांयासी को इस संसार के माया-मोह भाते नहीं और कभी काम, क्रोध एवं लोभ के
वशीभूत नहीं होता। वह संसार की संसक्ति से उदासीन रहता है और सारा संसार उसकी हँसी करता
रहता है।
वह त्यागी है तथा उसमें सन्तोष भाव समाया हुआ है। उसे भूख प्यास एवं निद्रा पीड़ित नहीं करते।
उसने अनेक रूपों की संसक्तियों रस-वासनाओं का त्याग कर रखा है। वन में निवास करता हुआ
केवल परमात्मा के नाम में अनुरक्त रहता है॥
बिना सतगुरु (परमात्मा) के वह सम्पूर्ण जगत को धूलि की भाँति समझता है-सन्तों की सुरति योग
के बिना दर दर (खाना) भटकता रहता है।

घट रामायण / १०९
जिस किसी ने भी त्यागपूर्वक उस परमात्मा में मन लगा दिया वह सिंघल द्वीप (सिद्ध भूमि) में
निरन्तर आनन्द करता रहेगा ॥
॥ द्वितीय वैराग ॥
॥ चौपाई ॥
परम जोग बैराग बताऊँ। रहनी चाल ताहि दरसाऊँ॥
अष्ट कँवल उलटै हिये माई। उलटै कँवल तत्त मन लाई॥
निस दिन तत्त मती गति राखै। पाँचो तत्त गती सोइ भाखै॥
तब तन छूटे तत्त समाई। चारि तत्त जिव उपजै जाई॥
फिर तन छूटै खानि समाना। सो पुनि करै जो लेइ निदाना॥
अर्थ-परम जोग वैराग्य के विषय में बता रहा हूँ-उसकी दिनचर्या एवं आचरण (रहनी) का वर्णन
करता हूँ। उसने चित्त में स्थित अष्ट कमलदल को उल्टा कर दिया है और उस उल्टे कमल से जुड़े
तत्त्व में चित्त लगाए रहता है॥
रात-दिन वह मूल तत्त्व (ब्रह्म) की गति का वर्णन करता रहता है और पाँचों तत्त्वों की गति का
वह वर्णन करता रहता है॥
उसके बाद जब उसका शरीर विनष्ट होता है तो वह परमतत्त्व में विलीन हो जाता है और वह चार
तत्त्वों एवं जीव के साथ पुनः उत्पन्न होता है। इसके पश्चात् उसका चित्त भण्डार की तरह भर जाता है-
इसको वही कर सकता है-जो इसके फलों को धारण करने की आकांक्षा करता हो॥
॥ तृतीय बैराग ॥
॥ चौपाई ॥
त्याग बैराग कौ बरनि सुनाई। छूटै देह खानि गति पाई॥
जो जस त्याग भोग तन तैसा। खान पान तन पावै जैसा॥
अर्थ-त्याग वैराग्य का मैं वर्णन करके सुनाता हूँ-उसकी देह छूटने पर इसे सम्पन्नता की गति प्राप्त
होती है। उसका जैसा त्याग होगा, या जैसा भोग होगा-उसी प्रकार उसका शरीर होगा, वह अपने कर्म
के अनुसार ही खान-पान तथा शरीर प्राप्त करेगा॥
॥ चतुर्थ बैराग ॥
॥ चौपाई ॥
तन त्यागी बैरागी भाई। जो जेहि लिया देन सोइ जाई॥
बार बार छूटै तन जाइ। छूटै तन तहँ गर्भ समाई॥
वहि वहि देह खाइ पुनि जाई। ऐसे भर्म खानि भरमाई॥
बिना सुरति नहिं पावै पारा। भरमै भोग परै भौ धारा॥
अर्थ-त्वह बार-बार शरीर छोड़कर माता के गर्भ में जाता है-उसे देकर वह पुनः खाता हुआ अपना
जीवन व्यतीत करता है, ऐसे भ्रम की खानि में वह भटकता रहता है। बिना सुरति ज्ञान के वह भवसागर
से पार नहीं हो पाता-क्योंकि वह संसार सागर की योग धारा में बहता हुआ निगरन्तर भरमता रहता है॥

११० / घट रामायण
॥ सोरठा ॥
चारौ गति वैराग सुरति लाग न्यारी रही।
सत मत गति कोइ जाग संत सरनि उबरा सोइ॥
अर्थ-त्ये चारों गति वैराग्य की हैं-इसमें सुरति में लगी हुई चित्तगति विलक्षण है-कोई ही सन्तमति
का व्यक्ति संसार में जगता है-और सन्तों की शरण में जाकर मुक्ति प्राप्त कर लेता है॥
॥ वरनन जोग ॥
॥ प्रथम जोग ॥
॥ चौपाई ॥
चारों गति बैराग बखाना। आगे कहौं जोग साधांना॥
पिरथम परम जोग गति गाऊँ। भिन्न भिन्न तेहि को दरसाऊँ॥
मुद्रा पाँच अवस्था चारी। तीनि ज्ञान पुनि बानी चारी॥
सहस कँवलदल सुरति लगावै। आतम तत्त अकास समावै॥
पुनि तन छूटि पावै नर दही। भोग भुगति पुनि भव रस लेही॥
पावै मुक्ति बास कर चीन्हा। मुक्ति भोग पुनि होइ अधीना॥
अर्थ-वैराग्य की चारों गतियों का वर्णन कर रहा हूँ। आगे योग के लक्ष्य (संधान) का वर्णन
करूँगा। प्रथम परम योग की गति का गान करता हूँ। उसके भिन्न-भिन्न स्वरूपों को भी स्पष्ट करूँगा।
पाँच मुद्राएँ हैं, चार अवस्थाएँ, तीन ज्ञान हैं, तथा चार वाणियाँ हैं। सहस्त्र कमल दल पर जो सुरति
ध्यान लगाता है, और आत्म तत्त्व के साथ जो शून्य में समा जाता (विलीन हो जाता) है। पुनः शरीर
छूटने पर वह मनुष्य की देह प्राप्त करता है फिर अनेक प्रकार के भोगों एवं संसार की आनन्दमयी
वासनाओं का भोग करता है। अन्त में, वह मुक्ति का निवास प्राप्त करता है, फिर मुक्ति और भोग दोनों
उसके अधीन हो उठते हैं॥
द्वितीय जोग
॥ चौपाई ॥
दूजा जोग कहौं समझाई। इड़ा पिंगला सुषमनि माई॥
बंक नाल पट मारग जाई। मन भया भिन्न सुन्न के माई॥
देखै जोति निरखि निज नैना। तन छूटै सुपने की सैना॥
जो कछु कर्म भाव जग कीन्हा। छूटै देह भोग फल लीन्हा॥
सुरति सब्द बिन भये अचीन्हा। ता सों हो गये जोग अधीना॥
बिन सतसंग भेद नहिं पावै। ता ते कर्म भोग भव आवै॥
अर्थ-अब मैं दूसरे योग का समझाकर वर्णन कर रहा हूँ। इसका सम्बन्ध इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना से
है। बंक नाल के छः सन्धियों के मार्ग से जाता हुआ इस साधक का मन शून्य में पहुँच जाने के कारण
लोकजन से भिन्न हो उठता है।
वह अपने नेत्रों से उस परम ज्योति को देखता है और उसकी मृत्यु भी स्वप्न की ही भाँति होती है।
उसने संसार में जो भी कर्म तथा भावनाएँ की हैं-देह छूटने पर उसके अनुसार फल भोग प्राप्त होता है।

घट रामायण / १११
वह साधक सुरति ज्ञान से सर्वथा अपरिचित ( अचीन्हा ) रहता है इसलिए वह उसी योग के ही
अधीन बना रहता है। (इसने सतसंग नहीं किया हैं) इसलिए सत्संग के बिना ज्ञान (भेद) नहीं समझ में
आता-इसीलिए वह पुर्नजन्म लेकर सांसारिक कर्म भोगों में आता है।
॥ सोरठा ॥
जोग जुगुति गति गाइ, नहिं अकाय गति पायऊ।
बिन सतसंग नसाइ, सुरति सब्द चीन्हें बिना॥
ज्ञान गती कथि गाइ, जो अघाइ आगे कही।
ताहिं पाइ मति माइ, सो तुलसी सब बिधि कही॥
अर्थ-योग युक्ति (तरीकों) की गति गाकर निष्काम गति नहीं प्राप्त की जा सकती। सुरति शब्द
की पहचान किए बिना तथा सत्संगति से रहित सारा जीवन नष्ट हो जाता हैं।
मैंने ज्ञान की गति का वर्णन किया है-जो साधुजनों की तृप्ति का कारण होता है उसे मैं आगे
कहूँगा-हे सन्तों, उसे ज्ञान के अन्तर्गत प्राप्त करो-इसका वर्णन मैं (तुलसीदास) आगे करूँगा॥
॥ बरनन ज्ञान ॥
॥ प्रथम ज्ञान ॥
॥ चौपाई ॥
अब सुनु ज्ञान ठान गति गाऊँ। ता का भेद भाव बतलाऊँ ॥
रेचक पूरक कुम्भक कहिये। ता का भेद सबै सुनि लैये ॥
चारि अवस्था तन में भाखी। तुरिया तत्त चारि अभिलाखी ॥
परमहंस ता की मति जाना। मन करता को ब्रह्म बखाना ॥
जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति कहाई। तुरिया चौथी भेद न पाई ॥
तुरियातीत बसै वोहि पारा। सुनि पुनि है मन का ब्यौहारा ॥
मनमत चलै मान मद माई। मन करता को ब्रह्म बताई ॥
ता ते भौ गति मति नहिं पावै। बार-बार भौ माहिं समावै ॥
सतगुरु सब्द भेद नहिं जानै। आपी आप ब्रह्म मन मानै ॥
सास्तर सिंध सार बतलावै। ता ते भौजल पार न पावै ॥
चीन्हैं संत सुरति गति न्यारी। तौ पुनि उतरै भौजल पारी ॥
आपा आप पाप गति खोवै। तब सतसंग संत गति जोवै ॥
अर्थ-अब ज्ञान की स्थिति (ठाम) सुनों, मैं उसकी गति का गान कर रहा हूँ और मैं उसके भेद
तथा भाव की गति बतला रहा हूँ। रेचक, पूरक, कुम्भक इसे कहा जाता हैं और सभी भेदों को सुन लें॥
शरीर की चार अवस्थाएँ कही गई हैं-(जागृति, स्वप्न, सुषुप्ति) के साथ तुरीया गति की
अभिलाषा की जाती हैं। इसकी गति परमहंस ही जानते हैं तथा इस कर्त्ता मन को ही ब्रह्म कहा जाता है॥
मन की अवस्थाएँ जागृति, स्वप्न एवं सुषुप्ति कही जाती हैं-इसके चौथे भेद तुरीया को सामान्य
जन नहीं प्राप्त करते। मन की अन्तिम व्यवहार दशा यह है कि वह तुरीयातीत होकर उसके उस पर
निवास करता रहे ॥

१९२ / घट रामायण
म् आदि को मन में विलीन करके मन के अनुसार आचरण करे तथा कर्त्ता मन को ब्रह्म समझे।
इससे व्यक्ति भवसागर को भोगने की स्थिति नहीं प्राप्त करेगा किन्तु इसके विपरीत बार-बार भवसागर
में भोग की गति प्राप्त करता है। जो 'सतगुरु' शब्द का अर्थ नहीं समझता, और स्वयं अपने-आप को
ही ब्रह्म मानता है, शास्त्रों को ज्ञानसिन्धु का सार तत्त्व समझता है, वह इस मायाजाल (भौजल) से
मुक्ति नहीं पाता॥
जो सन्तों को पहचानता है, उनकी विलक्षण सुरति गति (ज्ञान) को जानता है, वही इस सांसारिक
प्रपंचों से मुक्त होता है। आत्म ज्ञान से स्वयं जो पापमयी वृत्ति को नष्ट कर देता है, वही सत्संगति द्वारा
संत गति को प्राप्त करता है॥
॥ द्वितीय ज्ञान॥
॥ चौपाई॥
औरहि ज्ञान सुनौ जग केरी। बेद पुरान जाल भौ बेरी॥
पंडित पढ़ पढ़ ज्ञान सुनावै। आदि गती गम भेद न पावै॥
झूठी आस बास सब केरी। फिरि फिरि स्वाँस आस भौ बेरी॥
जो जो कर्म करै सोइ पावै। बार बार भौ भटका खावै॥
मन में मान मोट कर जानै। ता ते परै नरक की खानै॥
भक्ती भाव भेद नहिं पावै। ऊँची जाति मान मन लावै॥
साधु संत मन में नहिं आवै। ऊँचा ज्ञान आप ठहरावै॥
नीचा होइ संत को जानै। संत कृपा कछु जानै आनै॥
संतन भेद बेद से न्यारा। नीच होइ पुनि पावै सारा॥
ऊँचा मान सदा मन राखै। सोइ सब जगत जीव कह भाखै॥
पूजन अपनी चाल बतावै। ऐसे सकल जीव भरमावै॥
अर्थ—संसार के अन्य ज्ञान के विषय में सुनें। वेद पुराणादि तो भवसागर के लिए बेड़ी बन्धन
(बेरी) जैसे हैं। पंडित इन्हें पढ़-पढ़कर ज्ञान कहता है, और वह आदि ज्ञान की समझ और उसके भेदों
को नहीं समझता॥
आशा, वासनाएँ (बास) सब कुछ झूठे हैं-पुनः पुनः श्वास की आशा (जीवन) भवसागर के लिए
बेड़ी बन्धन (बेरी) बन जाता है। जो जो कार्य करता है, उसी का फल उसे मिलता है—और वह वासना
के संसार में भटकता रहता है॥
मन की आकांक्षाओं का वह लक्षण (मोह) मान बैठता है, इसीलिए वह नरक की खान में पड़ता
है। वह भक्तिभाव का रहस्य नहीं समझ पाता और जातियों को श्रेष्ठ मानकर उनमें मन लगाता है॥
साधु संगति का भाव उसके मन में नहीं उत्पन्न होता और अपने ज्ञान को ही सर्वोच्च ठहराता है। वह
जब लघुता के भाव से सम्पन्न होगा तो संतों को समझेगा, फिर सन्तों की कृपा से थोड़ा बहुत ज्ञान
उत्पन्न होगा। संतों के भेद वेद ज्ञान से भी विलक्षण हैं और सब कुछ लघुता से ही व्यक्ति प्राप्त कर
सकता है।
उच्च मानदण्ड सदैव ही रक्षा करते हैं और वही सम्पूर्ण संसार एवं जीवों के रूपों का निरूपण
करता है। इससे भिन्न केवल अपने अनुसार अन्य पूजा आदि की विधियाँ बताते हैं, ऐसे व्यक्ति सभी
के लिए भ्रम उत्पन्न करते हैं॥

घट रामायण / ११३
॥ सोरठा ॥
यहिं बिधि जग मत ज्ञान पंडित भूले भरम में।
वाक ज्ञान परमान संत भेद चीन्हें नहीं॥
अर्थ-इस प्रकार से सांसारिक ज्ञान है, शास्त्रकार पंडित भ्रम में भूले हुए हैं-जहाँ तक सन्तों का
प्रश्न है, वे किसी तरह के भेद भाव को नहीं पहचानते। उनके लिए केवल वाक् ज्ञान (सही-सही रूपो
में शब्दों का गया) ही प्रमाण है॥
॥ चौपाई ॥
अब सुनु भक्ति भाव कर लेखा। रामायन में कीन्ह बिबेका॥
भक्ति भाव नौ बरनि सुनाई। ता से भिन्न चारि पुनि भाई॥
नौ फल भाव बेद बतलावै। जो जस करै भोग तस पावै॥
नौ की राह मुक्ति नहिं पावै। दसवीं अविरल भक्ति लखावै॥
एकादस अनुपावन लेई। बार बार मुक्ती बर देई॥
भेद भक्ति कर भाखौं लेखा। इष्ट भाव मन बसै बिबेका॥
अब अभेद का भेद अभेदा। ता को परम न पावै बेदा॥
कोइ कोइ साध संत गति पाई। जिन की सूरति सब्द समाई॥
सूरति सैल करै असमाना। जोगी पंडित परम न जाना॥
परमहंस सन्यासी भाई। उन का मरम नहीं उन पाई॥
जगत जाल संसार बिचारा। उनकी गति कोइ पावै न पारा॥
अर्थ-अब भावभक्ति का वर्णन सुनें। मैंने रामायण में उसका विवेक (स्पष्ट निरूपण) किया है।
मैंने नौ प्रकार के भक्तिरूपों का वर्णन करके बताया है-उनसे भिन्न चार प्रकार के और भी भक्ति भेद
हैं।
वेद या शास्त्र परम्परा नवधा भक्ति के फलों के स्वरूप का वर्णन करते हैं-जो जिस प्रकार की
भक्ति करता है-वह उसी प्रकार का फलभोग प्राप्त करता है। नवधा भक्ति के मार्ग पर चलने से मुक्ति
नहीं मिलती। दसवीं अविरल भक्ति का मार्ग दिखाती है। एकादश भक्ति अनुपावन (आत्म शुद्धि) होती
है और यह भक्ति बार-बार श्रेष्ठ मुक्ति देती है।
अब भेद भक्ति का वर्णन करता हूँ इससे इष्ट भाव के प्रति मन में विवेक उत्पन्न होता है। अब
अभेद रूप अभेद भक्ति का भेद बताता हूँ उसका रहस्य वेद को भी नहीं ज्ञात है। इसका ज्ञान किसी-
किसी साधु सन्त को प्राप्त होता है-इसका ज्ञान सुरति समाधि में समाविष्ट है॥
सुरति समाधि द्वारा जो शून्य (आकाश) में स्थित शिखर पर है, योगी तथा पंडितजन भी उसके मर्म
को नहीं जानते। परमहंस एवं सन्यासी भी उसका रहस्य नहीं जान पाए हैं। यह बेचारा मनुष्य संसार
जगत जाल में फँसा पड़ा है-उनकी गति का कोई पार नहीं पा सकता॥
॥ सोरठा ॥
तेरा भक्ति बयान, सो प्रमान संतन कही।
तुलसी तनहिं बिचारि, सुरति भेद समझै कोई॥१॥
नौ जग माहिं पसार, दसवीं कछु कछु भिन्न है।

११४ / घट रामायण
एकादस मुक्ति मँझार, द्वादस गति मति मुक्ति मय ॥ २ ॥
अब अभेद गति गाइ, तेरह येहि बिधि यों कही।
ये साधन के माहिँ, सुरति सब्द जा ने लखी ॥ ३ ॥
अर्थ-सन्त तुलसी साहब कहते हैं कि उनकी भक्ति के वर्णन का प्रमाण वही है, जो संतों द्वारा
किया गया है। जरा विचार करके देखो, सुरतिभेद (रूपी भक्ति) कोई समझता नहीं है॥ १॥
नवधा भक्ति का संसार में प्रचलन है, दसवीं भक्ति कुछ-कुछ भिन्न है, एकादश भक्ति के लिए
वही आधार है और बारहवीं भक्ति ज्ञानमय, विवेकमयी एवं मुक्तिमयी है॥ २॥
इस अभेद भक्ति का वर्णन करके मैंने इस प्रकार तेरह भक्ति रूपों का वर्णन किया है-जिसने
सुरति 'शब्द' देख लिया है, उनके लिए ये सब साधन हैं या मार्ग हैं॥ ३॥
॥ छन्द ॥
चारों बैरागा जोग समाधा। तीनि ज्ञान गति गाड़ दई।
नौ चारों भक्ती जो निज उक्ती। भाषि भेद सब गाइ कही॥
जो जिन जानी संत बखानी। चरन चेत चित लाइ लई ॥ १ ॥
सूरति सर चेती छाँड़ि अचेती। सुरति सैल नभ माहिं लई।
फोड़ा असमाना निरखि ठिकाना। पच्छिम किवारी द्वार गई॥ २ ॥
परमातम पाया जीव छुड़ाया। पारब्रह्म पद कँवल मई।
कँवला निज फूला मिटि गया सूला। जीव गती तजि ब्रह्म भई ॥ ३ ॥
आगे इक द्वारा अगम पसारा। सत्तलोक वोहि नाम कही।
वहँ है सतनामा ब्रह्म न जाना। वे सत साहिब अगम सही ॥ ४ ॥
तीनों से न्यारा लोक पसारा। चौथे पद के पार वही।
जहँ है निःनामी कोउ न जानी। तीनों पट के पार रही ॥ ५॥
कहौं अगम अनामी ठीक न ठामी। संतन जानी सार सही।
अंबर असमाना मही न भाना। चाँद सुरज तत तारे नहीं ॥ ६ ॥
पानी नहिं पवना अगिनि न भवना। वेद भेद गति नाहिं लई।
ब्रह्मा नहिं बिस्ना राम न किस्ना। सिव सिद्धी नहिं पार लई ॥ ७ ॥
निर्गुन नहिं सर्गुन नहिं अपबर्गुन। पिंड ब्रह्मांड दोउ नाहिं कही।
जोती नहिं सोती अगम न होती। पारब्रह्म की आदि नहीं ॥ ८ ॥
नहिं कार अकारा नहिं निरकारा। सत्त नाम सत सत्त रही।
नहिं नाम अनामी तुलसी जानी। जाइ समानी सार मई ॥ ९॥
अर्थ-चारों प्रकार के वैराग्य, योग, समाधि तथा तीन ज्ञानों की गतियों का वर्णन करके बतला
चुका हूँ। तेरह (नौ + चार) प्रकार की भक्ति के सम्बन्ध में अपने मत आदि का वर्णन करके उनके
भेदों का निरूपण किया ॥
इनमें से जो इसको जान ले रहा सन्त कहा जाएगा और मैंने उसके निर्मल चरणों में चित्त को लगा
लिया है॥ १॥

घट रामायण / १९५
अज्ञानता (अचेती) का त्याग करके सूरति रूपी सरोवर का स्मरण करो (ध्यान करो) और सूरति
के पार स्थित ध्यान के पर्वत शिखर के आकाश पर ध्यान लगाओ। उस आसमान को तोड़कर अपने
ठिकाने को देखो और मैं पश्चिमी किवाड़े के द्वार पर पहुँची ॥ २ ॥
वहाँ परमात्मा मिला और इस जीवत्व के बन्धन से मुक्ति मिली और पारब्रह्म के चरण कमलमय
हो उठे॥ स्व कमल पुष्पित हुआ-जन्म जन्मान्तर की पीड़ा समाप्त हो उठी और जीव के इस स्वरूप का
परित्याग करके मैं ब्रह्ममय हो उठा॥ ३ ॥
उसके आगे अगम्य तक फैला एक द्वार मिला-उसका नाम सत्य लोक कहा गया है। वहाँ एक
सत्यनाम है-जिसे ब्रह्म भी नहीं जानता-वही अगम्य 'सत साहब' हैं॥ ४ ॥
यह लोक तीनों लोकों से विलक्षण तथा व्याप्य लोक है, और वही चतुर्थ पद (मोक्ष) के उस पार
है, जहाँ पर अनाम (निःनामी) निवास करते हैं और जिनके विषय में कोई नहीं जानता। वे तीनों पटों
(लोकों की सीमा) के पार रहते हैं॥ ५ ॥
न वहाँ जल है, न वायु है, न अग्नि है, न निवास गृह है और ज्ञान की गतियों का कोई स्वरूप भी
नहीं है। जहाँ न ब्रह्मा हैं, न विष्णु हैं, न राम हैं, न कृष्ण हैं और शिव तथा सिद्ध भी जिसका रहस्य नहीं
प्राप्त कर पाते ॥ ७ ॥
वहाँ न निर्गुण है, न सगुण है और न वहाँ स्वर्ग का नामोनिशान है और न कहीं वहाँ पिंड या ब्रह्मांड
है॥ परमात्मा की ज्योति का न वहाँ कोई स्रोत (सोती) है, वहाँ अगम या अज्ञेय भी नहीं है और पार
ब्रह्म परमात्मा का आदि स्वरूप लक्षण भी नहीं है॥ ८ ॥
वहाँ न कोई अनाकृति है, न कोई आकृति है, न कोई निरंकार है-वहाँ केवल 'सत्य नाम-ही सही-
सही स्थिति में है। तुलसी साहब जानते हैं कि वहाँ न कोई नाम है, न अनामी है वरन् वहाँ समस्त तत्त्व
या महातत्त्व उस परम सारगय 'सत्य तत्त्व' में जाकर समाविष्ट हैं ॥ ९ ॥
॥ सोरठा ॥
तुलसी अगम अनाम, अगत भेद का से कहौं।
कोड न मानै बात, संत अंत कोड ना लखै ॥ १ ॥
निगम न पावै बेद, नेति नेति गोहरावही।
ब्रह्म न जानै भेद सत्त, नाम निज भिन्न है॥२॥
एक अनीह अनाम, सत सुरति जानै यही।
वे पहुँचे वोहि धाम, सो अनाम गति जिन कही॥ ३॥
तुलसी अगम बिचार, सार पार गति पद लखा।
वह अलेख का ठाम, तुलसी तरक विचारिया ॥ ४ ॥
सुरति अटा के पार, आठ अटारी अधर में।
तुलसिदास लियौ सार, सुरति सिंध से भिनि भई॥ ५॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि वह परम तत्त्व अगम्य है, अनाम है-फिर उसे ज्ञान के भेद का
वर्णन मैं कैसे करूँ सम्भव है, मेरी बातें कोई न स्वीकार करे-क्योंकि सन्तों की अन्तिम ज्ञान दशा
किसी की समझ में नहीं आती ॥ १ ॥
शास्त्रादि जिसके ज्ञान को नहीं प्राप्त कर सकते और जिसे 'नेति नेति' कहकर पुकारते हैं-जिसके,
स्वरूप भेद को ब्रह्म भी नहीं जानता, यह 'सत्य' नाम स्वयं में सबसे अलग है॥ २॥
वह केवल एक है, आकांक्षा शून्य, अनाम है और जिसे सुरति के द्वारा ही जाना जाता है-वही

१९६ / घट रामायण
सुरति ध्यानी मे न ही उस धाम तक पहुँचते हैं, वह अनाम गति है-उसके विषय में ऐसा कहा गया
है॥ ३ ॥
तुलसी साहब कहते हैं कि यह मेरा अपना अगम चिन्तन है और मैंने इसे उस परम तत्त्व के पार
(शून्य पर्वत शिखर के पार ) जाकर मैंने देखा है-वह अलेख्य की स्थली है-तुलसी ने उसे अपने
अनुभव से विचारा ( समझा) है॥ ४॥
सुरति ध्यान रूपी अटारी ( अट्टालिका ) के उस पार उस शून्य (अघट ) में आठ अटारियाँ
( अट्टालिकाएँ) हैं। तुलसी साहब कहते हैं कि मैंने उनका सारतत्त्व समझा है और उसको समझने के
बाद उनमें तन्मयता (भिनि गई) प्राप्त कर ली॥ ५ ॥
॥ चौपाई ॥
आठ अटारी सुरति समानी। मंगल ठुमरी करी बखानी॥
जस जस सूरति चढ़ी अटारी। तस तस बिधि मैं भाखी सारी ॥
अर्थ-सुरति आठ अटारियों (अट्टालिकाओं) में जाकर समा गई और मैं उसका वर्णन मंगल ठुमरी
राग में कर रहा हूँ। जैसे-जैसे एक-एक (अटारी) अट्टालिका पर सुरति चढ़ रही है, उस-उस प्रकार से
उसके मंगल का गान मैं कर रहा हूँ।
॥ मंगल ॥
आठ अटारी महल, सुरति चढ़ि चाखिया।
ठुमरी माहीं भेद, भाव सब भाखिया ॥ १ ॥
संत पंथ का अंत, साध कोइ बूझिहै।
प्यारी पुरुष मिलाप, साफ स्रुति सूझिहै॥ २ ॥
जस जस मारग रीति, राह समझाइया।
प्यारी अटारी माहि, जाइ सोइ गाइया ॥ ३ ॥
मन मथ कीन्हा चूर, सूर स्रुति ले चढ़ी।
गुरु पद पदम मँझार, पुरुष पै जा खड़ी ॥ ४॥
बिधि बिधि ठुमरी माहिं, गाइ तुलसी कही।
जो कोइ चीन्हे भेद, संत सोई सही ॥ ५ ॥
अर्थ-आठ अटारियों (अट्टालिकाओं) के ऊपर चढ़कर सुरति अपने प्रिय का आनन्द चख रही है।
इस मंगल ठुमरी के माध्यम से उसके स्वरूप तथा दशाओं का मैं वर्णन करता हूँ॥ १ ॥
संत मार्ग की समाप्ति का मर्म कोई ही संत बूझेगा। प्रिय आत्मा एवं पुरुष ब्रह्म का मिलन वेदों में
साफ-साफ दिखाई पड़ता है॥ २ ॥
जैसा-जैसा वहाँ तक पहुँचने का मार्ग है और उनके परस्पर मिलने की रीति है, मैं उसे समझा रहा
हूँ। प्रिया (आत्मा) प्रिय (ब्रह्म) की अटारी में है वहीं जाकर मैं गान करता हूँ॥
कामदेव को पूरी तरह नष्ट करके चूर्णकर दिया और श्रुति के सूर (आत्म तत्त्व) को लेकर मैं
अट्टालिका के ऊपर चढ़ चली। गुरु के चरण कमल के मध्य होकर मैं अपने प्रिय पुरुष (आराध्य
परमात्मा) के चरणों में जाकर खड़ी हो गई ॥ ५ ॥
तुलसी साहब कहते है अनेक प्रकार की ठुमरियों में इसे गाकर बताया है-जो इन भिन्न-भिन्न
ठुमरियों के भेद पहचान ले वही संत है ॥ ५ ॥

घट रामायण / १९७
॥ सोरठा ॥
ठीका ठुमरी माँहि आठ अटारी अधर की।
सूरति पदम विलास विधि बयालीस पद मिली॥
अर्थ-इस ठीका ठुमरी राग द्वारा अन्तर्रात्मा (अधर) की आठ अटारियों का वर्णन कर रहा हूँ।
सूरति द्वारा प्रिय के चरणों में विलास करती हुई मैं विधिवत् बयालीस तत्त्वों से मैं मिली॥
॥ ठुमरी १॥
अली अटकी सुरति अटारी। मन हटकर हारा री॥ टेक ॥
यह अँग संग भंग ले लटकी। सूली स्वर्ग नर्क भौ भटकी।
दीन्ही सतगुरु घट की तारी। चटकी मति फटक फटा री॥ १॥
ये ले लार पार स्रुति सटकी। निरखि अलख आदि घटघट की।
हकलख लागी बिरह करारी। हिये खटकी कसक कटारी॥ २॥
नौलख खेल कला ज्यों नट की। सूरति सहस कँवल झर भटकी॥
लीला सिखर निकर नित न्यारी। दधि मटुकी घिरत मठारी॥ ३॥
तुलसी तोल कही तिल तट की। भड़ धुनि रंकार रस रट की॥
ये दस रस बस सुरति सँवारी। पिउ पट की खोलि किवारी॥ ४॥
अर्थ-हमारी सखी अभी सुरति की अटारी में ही फँसी हुई है, वहाँ से हटकर मन हार बैठा है, सुरति
लोक में अन्य तत्त्वों को साथ-साथ लेकर मैं लटकी रही-स्वर्ग, नरक, भवसागर की पीड़ा (सूली)
में भटकती रही। सतगुरु ने इस पिंड के दरवाजे पर ताली लगा दी और उस दरवाजे की आवाज सुनते
है-हमारी चेतना जाग्रत (फटक) हो उठी॥ १॥
अलक्ष्य ब्रह्म जो मूलरूप में आदि से ही घट-घट में स्थित है, उसे देखकर यह मेरी ज्ञान चेतना
आनन्दपूर्वक मुझे लेकर उसके पास पहुँच गई-एकाएक (हकलक) मुझे उसे पाने के लिए तीक्ष्ण
वियोग जागृत हो उठा और हृदय में जैसे कसक भरी कटारी खटक (घुस गई या लग गई-या हिल
गई) गई हो॥ २॥
मैं सुरति ज्ञान के स्त्रहस्त्रार कमल दल में एकाएक ऐसी भटक गई मानो नट कला के नौलख
खेलों में भटक गया हो। शून्य शिखर की लीला नित्य विलक्षण है-जैसे दही से भरी हुई मटकी में ऊपर
छाँछ क्षण-क्षण अपने आप उतर आता हो॥ ३॥
एक तिल जैसे स्थान वाले तट की कोई तुलना (तोल) नहीं है और उसमें अनाहत नाद के 'रंकार'
ध्वनि की रसमयी रटन शुरू हो उठी। फिर पति (ब्रह्म) के कक्ष की किवाड़े खोलकर मैंने दस रसों के
वश में होकर सुरति ध्यान (आलिंगनादि का आनन्द) सँवार लिया॥ ४॥
॥ ठुमरी २॥
मँझरी पिय झाँकि निहारी। सखि सतगुरु की बलिहारी॥
दीन्हे दृग सुरति सँवारी। चीन्हा पद पुरुष अपारी॥ १॥
चली गगन गुफा नभ न्यारी। जहँ चंद न सूर सिहारी॥
तुलसी पिय सेज सँवारी। पौढ़ी पलँगा सुख भारी॥ २॥
अर्थ-हे सखि! मझली नायिका ने पति (ब्रह्म) को झाँक कर देख लिया, यह गुरु की ही कृपा का

तृतीय खण्ड: घट रामायण उपसंहार एवं परमपद प्राप्ति

११८ / घट रामायण
फल है। सुरति ध्यान को सँवार कर उसने आँखें बन्द कर ली और उस अनन्य ब्रह्म (अपारी पुरुष) का
स्थान पहचान लिया ॥ १ ॥
उस शून्याकाश की न्यारी गुफा में वह चल पड़ी जहाँ न चन्द्रमा है, न सूर्य है-न कोई अन्य
(सिहारी) है। तुलसी साहब कहते हैं कि वहाँ प्रिय (ब्रह्म) की सेज सजी हुई बिछी है-और वह आत्मा
पलँग पर अत्यन्त आनन्द के साथ लेट गई (पौढ़ी) ॥ २ ॥
॥ ठुमरी ३ ॥
सलिता जिमि सिंध सिधारी। सूरति रत सब्द बिचारी॥
जहँ सुन्न न सुन्नी न्यारी। मत मीन महासुन पारी॥ १ ॥
नहिं गुन निर्गुन मत झारी। निज नाम निअच्छर भारी॥
जहँ पिंड ब्रह्मांड न तारी। तुलसी जहँ सुरति हमारी॥ २ ॥
अर्थ-जैसे सरिताएँ सिन्धु के लिए प्रस्थान करती हैं-उसी प्रकार सुरति रत साधक अनादि शब्द की
ओर चलता है। जहाँ न शून्याकाश है और न शून्यसाधक चित्त, यह मन रूपी मछली उस महाशून्य रूपी
सरोवर में जा पड़ी (पारी) ॥ १ ॥
जहाँ न गुण है, न निर्गुण है और सारे मतवाद भी वहाँ नहीं हैं-और वहाँ उसका (ब्रह्म का) अपना
नाम बिना अक्षर का है। जहाँ न पिंड है, न ब्रह्मांड हैं न ज्ञान की किवाड़ों को बंद किये हुए ताली हैं-
तुलसी साहब कहते हैं कि वहाँ हमारी सुरति निवास करती है ॥ २ ॥
॥ ठुमरी ४ ॥
ए अली आदि अंत अधिकारी। पिय प्यारी प्रीति दुलारी॥
हम कीन्हा खेल पसारी। सब रचना रीति हमारी॥ १ ॥
करता नहिं काल पसारी। हम अगम पुरुष की नारी॥
ठुमरी सोइ संत बिचारी। तुलसी नित नीच निहारी॥ २ ॥
अर्थ-हे सखी ! यह नायिका (पत्नी), आत्मा प्रिय (ब्रह्म) को अति प्रिय हैं, उसके आदि अन्त की
स्वामिनी है और अत्यन्त प्रेम के कारण उसके लिए दुलारी बनी हुई है। हमारे सारा खेल खुला फैला है
और खेल की रचना और दूसरे की नहीं, मेरी ही है ॥ १ ॥
इस खेल का कर्त्ता चारों ओर फैला हुआ काल नहीं है मैं तो उस अगम पुरुष (ब्रह्म) की पत्नी हूँ।
(जिस पर किसी अन्य का प्रभाव नहीं है)। संतों की इस आनन्दमंगलमयी ठुमरी को सुनकर तुलसी
साहब सदैव अपने को छोटा (तुच्छ, नीच) समझते रहते हैं ॥ २ ॥
॥ ठुमरी ५ ॥
ए गुइयाँ पिय हम हम पिय एकी। कोइ फरक न जानौ नेकी॥
कोइ बूझै संत बिबेकी। जोड़ अगम निगम नहिं लेखी॥ १ ॥
जिन अटल अटारी पेखी। पिय रूप न रेख अदेखी॥
कोइ कंथ न पंथ न भेषी। तुलसी सब मारग छेकी॥ २ ॥
अर्थ-हे साथिन (गुइयाँ)! प्रिय में मयी और मैं प्रियमयी बनकर एक हो उठी हूँ और हममें तथा
उनमें (आत्मा तथा ब्रह्म में) कोई जरा भी (नेकी) अन्तर न समझो। इस वास्तविकता को कोई
बिबेकवान् सन्त ही समझ सकता है-जिसने अगम एवं निगम में निरूपति ब्रह्म को न समझकर
आत्मब्रह्म को समझा हो ॥ १ ॥

घट रामायण / १११
जिन सन्तों ने इस शून्याकाश की अटल अट्टालिकाओं को देख लिया है और रूप तथा लक्षणों
(रेख) से हीन ब्रह्म को हृदय में अपने को तन्मय कर दिया है, वह न कोई कंथ (कथा-शास्त्र) कहता
है और न किसी पंथ (ज्ञानमार्ग) को जानता है और न वह वेषभूषा (सन्तों जैसी) धारण करता है, वही
उस ब्रह्म के समस्त मार्गों में आत्म चित्त को साक्षात्कृत करके बैठा है॥२॥
॥ सोरठा ॥
ठुमरी ठौर ठिकान, अगम भान स्रुति पद लखा।
चखा अमर रस ज्ञान, पार पुरुष पद में मिली॥१॥
पिया भवन के माईँ, जाइ जोइ जस जस कही।
रही पुरुष पद छाइ, लई आदि अपने गई॥२॥
अर्थ-उसका ठौर ठिकाना ठुमरी ही है और उसी भाव में श्रुतियों ने निर्दिष्ट अगम्य सूर्य का स्थान
देखा है। इसी के माध्यम से उन्होंने उस ब्रह्म के अगम ज्ञान रस का स्वाद चखा है और मैं (आत्मा) उस
लोक (पार) में जाकर पुरुष (ब्रह्म) से मिल गई॥१॥
मैंने जो-

१२० / घट रामायण
अर्थ-सुरति रूपी दूरबीन की सहायता से शून्य शिखर पर चढ़कर मैंने उस आदि रूप अनादि तत्त्व
को हृदय रूपी नेत्रों से समाधि के क्षणों में साध कर देखा।
॥ चौपाई ॥
तुलसी निरखि देखि निज नैना। कोइ कोइ संत परखिहै बैना॥
जो कोइ संत अगम गति गाई। चरन टेकि पुनि महूँ सुनाई॥
अब जीवन का कहौं निबेरा। जा से मिटै भरम बस बेरा॥
जब या मुक्ति जीव की होई। मुक्ति जानि सतगुरु पद सेई॥
सतगुरु संत कंज में बासा। सुरति लाइ जो चढ़ै अकासा॥
स्याम कंज लीला गिरि सोई। तिल परिमान जानि जन कोई॥
छिन छिन मन को तहाँ लगावै। एक पलक छूटन नहिं पावै॥
स्रुति ठहरानी रहै अकासा। तिल खिरकी में निस दिन वासा॥
गगन द्वार दीसै इक तारा। अनहद नाद सुनै झनकारा॥
अनहद सुनै गुनै नहिं भाई। सूरति ठीक ठहर जब जाई॥
चूवै अमृत पिवै अघाई। पीवत पीवत मन छकि जाई॥
सूरति साथ संघ ठहराई। तब मन थिरता सूरति पाई॥
सूरति ठहरि द्वार जिन पकरा। मन अपंग होइ मानौ जकरा॥
चमकै बीज गगन के माईं। जबकि उजास पास रहै छाई॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि मैंने भली भांति निरखकर उस तत्त्व को अपनी हृदय-रूपी आँखों
से देखा है-कोई-कोई ही सन्त मेरी इस वाणी को समझेगा॥ जो कोई सन्त की गति का गान करता है,
उसी के स्वर में स्वर मिलाकर मैंने भी चरण टेक कर (उस ब्रह्म के प्रति) मैंने (महूँ) भी उस सत्त्व
को सुनाया है॥
अब मैं जीवन के वर्णन का निपटारा करता हूँ-जिससे कि भ्रमवश स्थित चित्त का बन्धन (घेरा)
समाप्त हो उठे। जब इस जीव की मुक्ति होगी-मुक्ति को समझकर साधक गुरुचरणों की सेवा
करेगा। सतगुरु (ब्रह्म) का निवास सहस्रार कमल में है, और जो साधक सुरति साधना द्वारा उस
शून्याकाश तक पहुँचता है वहीं उसे श्याम कमल लीला शिखर दिखाई पड़ता है-कोई-कोई ही सन्त जन
उसके तिल जैसे होने की प्रमाण गति को पहचानता है। वह साधक उस तिल जैसे तत्त्व पर क्षण-क्षण
मन को लगाए रहता है और एक पल के लिए वह ध्यान छूटने नहीं पाता॥
समस्त श्रुतियाँ उस आकाश में ठहरी रहती हैं और तिल की खिड़की में उनका निरन्तर निवास बना
रहता है। शून्याकाश के द्वार पर एक तारा दिखाई पड़ता है-और निरन्तर (अनाहत नाद की झंकार सुनाई
पड़ती है। हे भाई! अनाहत सुनाई पड़ती है किन्तु समझ में नहीं आती और जब भलीभाँति सुरति समाधि
ठहर जाती है, तब 'अमृत का निरन्तर स्राव होने लगता है और साधक तृप्त होकर उसका पान करता है
और उसका पान करते-करते मन सर्वथा परितृप्त हो उठता है॥
वह साधक सुरति के साथ आनन्द सिंधु में ठहर जाता है और तब साधक का स्थिर सुरति प्राप्त
करता है।
सुरति में स्थिर होकर जिन्होंने उस अगम्य के द्वार को पकड़ रखा है-उसका मन उसी में विलुप्त हो
उठता है, अपंग (जड़) की भाँति जकड़ उठता है। उस आकाश में हे सखी! विद्युत चमकती रहती है
और पास में उजाला छाया रहता है।

घट रामायण / १२१
॥ चौपाई ॥
जस जस सुरति सरकि सत द्वारा। तस तस बढ़त जात उँजियारा॥
सेत स्याम स्रुति सैल समानी। झरि झरि चुवै कूप से पानी॥
मन इस्थिर अस अमी अघाना। तत्त पाँच रँग बिधी बखाना॥
स्याही सुरख सपेदी होई। जरद जाति जंगाली सोई॥
तिल्ली ताल तरंग बखानी। मोहन मुरली बजै सुहानी॥
मुरली नाद साध मन सोवा। विष रस बादि बिधी सब खोवा॥
खिरकी तिल भरि सुरति समाई। मन तत देखि रहै टक लाई॥१
जब उजास घट भीतर आवा। तत्त तेज और जोति दिखावा॥
जैसे मंदिर दीप किवारा। ऐसे जोति होत उँजियारा॥
जोति उजास फाटि पुनि गयऊ। अंदर चंद तेज अस भयऊ॥
देखै तत सोइ मनहि रहाई। पुनि चंदा देखै घट माई॥
चंद्र उजास तेज भया भाई। फूला चंद चाँदनी छाई॥
सूरति देखि रहै ठहराई। ज्यों उजियास बढ़त जिमि जाई॥
ज्यों ज्यों सुरति चढ़ि चलि गयऊ। सेता ठौर ठाम लखि लयऊ॥
देख सैल ब्रहाण्ड समाई। तारा अनेक अकास दिखाई॥
महि अरु गगन देखि उर माई। और अनेकन बात दिखाई॥
कछु कछु दिवस सैल अस कीन्हा। ऊगा भान तेज को चीन्हा॥
तारा चंद्र तेज मिटि गयऊ। जिमि मध्यान भान घट भयऊ॥
ज्यों दोपहर गगन रबि छाई। तैसे उजास भया घट माई॥
ता के मधि में निरखि निहारा। घट में देखा अगम पसारा॥
सात दीप पिरथी नौ खण्डा। गगन अकास सकल ब्रह्मंडा॥
समुँदर सात प्राग पद बेनी। गंगा जमुना सरसुतौ बहिनी॥
औरै नदी अठारा गंडा। ये सब निरखि परा ब्रह्मंडा॥
चारौ खानि जीव निज होई। अंडज पिंडज उषमज सोई॥
अस्थावर चर अचर दिखाई। यह सब देखा घट के माई॥
अर्थ—जैसे-जैसे सुरति समाधि सुरति द्वार की ओर से सरक 'सत्य' द्वार की ओर आती है, वैसे-वैसे
उजाला बढ़ता जाता है। श्वेत और श्याम रूप में स्थित सुरति शून्य शिखर में समा उठती है, तब ऐसा
अनुभव होता है कि झर-झर झरता हुआ औंधे कुएँ का जल बरस रहा है।
इस अमृत से तृप्त होकर मन स्थिर है। संसार का पाँच तत्त्वों में रंग जाना विधि का विधान है—ये
स्याह रंग, लाल श्वेत पीला तथा हरा हैं। तिल जैसे ब्रह्मद्वार पर स्थित सरोवर की लहरों का वर्णन कर
१. मुं० दे० प्र० के पाठ में "टक लाई" की जगह "टकराई" है।

१२२ / घट रामायण
रहा हूँ, जहाँ मोहन श्रीकृष्ण की आनन्ददायिनी मुरली बजती रहती है। मुरली की ध्वनि साधु जनों के
मन का विश्राम करने लगती है और वासना के विषय रसों के विपरीत सभी विधाता के रंग में खो जाते
हैं। तिल की खिड़की सुरति में विलीन हो उठती है और मैं उस रूप को देखकर एकटक टकटकी
लगाए रखता है।
वह उजाला जब पिंड के भीतर आता है, वह तत्त्व को तेज और परम ज्योति दिखलाने लगता है।
जैसे मंदिर का दीपक, ठीक उसी प्रकार इस ज्योति से सर्वत्र उजाला हो उठता है॥ एक क्षण के लिए
इस ज्योति का प्रकाश फूट पड़ता है, फिर शरीर के अन्तःकरण में चन्द्रमा जैसी ज्योति निखर आती है।
फिर साधक, मन में स्थित उस तत्त्व को देखता रहता है, और उसके बाद घट के भीतर वह चन्द्रमा
देखता रहता है॥
चन्द्रमा का उजाला तेजमय प्रकाश में बदल जाता है-और चारों तरफ चन्द्रमा खिल उठता है और
उसकी चाँदनी छा उठती है। उस उजाले को देखती हुई सुरति भी एक क्षण के लिए ठहर जाती है और
तब ऐसा लगता है मानो उजाला बढ़ता जा रहा हो॥ ज्यों-ज्यों सुरति आगे चढ़कर चलती जाती है वह
चाँदनी की उज्ज्वलता का सार ठौर-ठामों (स्थानों) पर देख लेती है॥
वह उज्ज्वल पर्वत शिखर देखकर ब्रह्मांड में समा जाती है-जहाँ आकाश में अनेक तारागण दिखाई
पड़ते हैं। हृदय में ही पृथ्वी तथा आकाश को देखो तथा अन्य अनेक बातें भी यहाँ दिखाई पड़ती हैं॥
कुछ दिनों तक वह पर्वत शिखर इसी प्रकार रहता है और तब सूर्य का उदय होता है किन्तु उस सूर्य के
प्रकाश को कौन पहचानता है। सूर्य का तेज व्याप्त होने पर तारा समूह तथा चन्द्रमा का प्रकाश का समय
मिट जाता है, ठीक उसी तरह घट के भीतर सूर्य का प्रकाश है।
जैसे दोपहर में सूर्य आकाश में व्याप्त हो उठता है वैसा ही, प्रकाश घट के भीतर हो उठता है-उस
मध्य में अच्छी तरह निरख और निहार कर मैंने इस पिंड में अगम्य ईश्वर का प्रसार देखा है।
सात द्वीप एवं नौ खंडों वाली पृथ्वी-आकाश, अन्तरिक्ष तथा समस्त ब्रह्मांड में यह व्याप्त है। सात
समुद्र यहाँ हैं, प्रयाग (प्राग) और त्रिवेणी (ब्रेनी) है, साथ में, गंगा, यमुना तथा प्रवाहित सरस्वती भी
तथा नब्बे (अठारह गंडा) नदियाँ, ये सभी पिंड में (ब्रह्मांड के परे) दिखाई पड़ी।
चारों प्रकार के जीव समूह-अंडज, पिंडज, उष्मजआदि तथा 'स्थावर, चर, अचर आदि सभी घट
के भीतर ही दिखाई पड़े।
॥ चौपाई ॥
भिनि भिनि जीवन कर बिस्तारा। चारि लाख चौरासी धारा॥
और पहार नार बहुतेरा। जो ब्रह्मांड में जीव बसेरा॥
कछु कछु दिवस सैल अस कीन्हा। तीनि लोक भीतर में चीन्हा॥
जो जग घट घट माहिं समाना। घट घट जग जिव माहिं जहाना॥
ऐसे कड़ दिन बीति सिराने। एक दिवस गये अधर ठिकाने॥
परदा दूसर फोड़ि उड़ानी। सुरति सुहागिनि भइ अगमानी॥
सबद सिंध में जाइ सिरानी। अगम द्वार खिरकी नियरानी॥
चढ़ि गइ सूरति अगम ठिकाना। हिये लखि नैना पुरुष पुराना॥
ता में पैठि अधर में देखा। रोम रोम ब्रह्मांड का लेखा॥
अंड अनेक अंत कछु नाहीं। पिंड ब्रह्मांड देखि हिये माहीं॥
जहँ सतगुरु पूरन पद बासी। पदम माहिं सतलोक निवासी॥

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ (ट्रांसक्रिप्शन) दिया जा रहा है:

घट रामायण / १२३
सेत बरन वह सेतइ साँईं। वहँ संतन ने सुरति समाई॥
सत्तहि लोक अलोक सुहेला। जहँवाँ सुरति करै निज केला॥
सूरति संत करै कोइ सैला। चौथा पद सत नाम दुहेला॥
परदा तीसर फोड़ि समानी। पिंड ब्रह्मांड नहीं अस्थानी॥
जहँवाँ अगम अगाधि अघाई। जहँ की सत गति संतन पाई॥
महुँ उन तार लार लरकाई। उन सँग टहल करत नित जाई॥
महुँ पुनि चीन्ह लीन्ह वह धामा। बरनि न जाइ अगमपुर ठामा॥
निःनामी वह स्वामी अनामी। तुलसी सुरति सैल तहँ थामी॥
जो कोइ पूछै तेहि कर लेखा। कस कस भाखों रूप न रेखा॥
तुलसी नैन सैन हिये हेरा। संत बिना नहिं होइ निबेरा॥
निज नैना देखा हिये आँखी। जस जस तुलसी कहि कहि भाखी॥
अर्थ-भिन्न-भिन्न प्रकार के जीवन रूपों का विस्तार अर्थात् चार लाख चौरासी हजार प्रकार के
जीवों साथ में, अनेक पहाड़ और अनेकों नालें (नार) आदि जिसमें ब्रह्मांड के जीवों का निवास है
(मैंने देखा)।
अनेक दिनों तक पर्वत शिखर पर इस प्रकार रहकर अपने पिंड के भीतर स्थित तीनों लोकों को
पहचाना जो संसार घट-घट के भीतर समाया हुआ है, वही घट-घट का स्थित जीव सृष्टि (जहान) में
भी है।
इस प्रकार कुछ दिन यहाँ व्यतीत हुए फिर एक दिन मैं अन्तर-तल (अधर) के स्थान पर पहुँचा।
द्वार पर स्थित दूसरा पर्दा फट कर उड़ गया और तब सौभाग्यवती सुरति का आगमन हुआ। (सब्द)
समुद्र में जाकर खो गया फिर अगम द्वार की खिड़की समीप आई। सुरति समाधि अपने निवास स्थली
पर चढ़ गई और हृदय के नेत्रों से अपने उस पूर्व साथी पुरुष (ब्रह्म) को देखा। वहाँ बैठकर उसने
अन्तस्तल में रोम-रोम में ब्रह्मांड देखा।
अनेक लोक (पिंड) दिखाई पड़े-जिनके अन्त नहीं हैं और अपने हृदय में अनेकों पिंड एवं ब्रह्मांड
देखे-वहाँ पूर्ण पद निवासी सतगुरु (ब्रह्म) और उसके सहस्रार कमल में 'सत्य लोक' निवास करता
दिखाई पड़ा।
स्वामी ब्रह्म भी श्वेत वर्ण के हैं और वह सत्य लोक भी श्वेत वर्ण का है और वहीं संत गण सुरति
ध्यान में डूबे हुए दिखाई पड़े। इस सत्यलोक का आलोक बड़ा ही सुहावना (सुहेला) था जहाँ सुरति
स्वयं क्रीड़ा में लीन थी। कोई विरला साधु ही सुरति में क्रीड़ा (केलि-क्रीड़ा-केला) करता है। उसके
पश्चात् चौथे लोक का नाम 'सत लोक' है-जो नितान्त दुर्लभ है।
इसके पश्चात् तीसरे पर्दे को फाड़कर उसके आगे घुसी (समानी)। वहाँ न पिंड था, न ब्रह्मांड था,
न कोई स्थान विशेष ही)। यहाँ अगम्य अगाध, पूर्ण परितृप्त है-जिसकी थाह केवल संतों ने प्राप्त की
है) मैंने भी, उनकी संसक्ति में अपनी संसक्ति लगा दी (तरकाई) और नित्य प्रति उनके साथ जाकर
सेवा टहल करने लगा। मैंने उन्हीं के साथ उस धाम (लोक) की पहचान कर ली। उस अगम नगरी के
स्थानों का वर्णन नहीं किया जा सकता।
वहाँ स्थित स्वामी निःनामी तथा अनामी है-तुलसी साहब कहते हैं कि यह सुरति ध्यान का पर्वत
शिखर वहीं ठहरा है। उसके विषय में जो जैसा पूछता है-वही उसका सार्थक संदर्भ है-मैं किस-किस
रूप में उसके रूप तथा लक्षणों का वर्णन करूँ। तुलसी साहब कहते हैं कि मैंने हृदय की आँखों से
जिस प्रकार का उसे देखा है, उसी-उसी प्रकार कह कर वर्णन करता हूँ॥

१२४ / घट रामायण
॥ सोरठा ॥
पिंड माँहि ब्रह्मांड, ताहि पार पद तेहि लखा।
तुलसी तेहि की लार, खोलि तीनि पट भिनि भई॥ १॥
तुलसी संत अनुकूल, कँवल फूल ता में धसी।
लसी जाइ सत मूल, फँसी पाइ सतगुरु सरन॥ २॥
खुलि गये अगम किवार, लील सिखर के पार होइ।
गिरा गगन के पार, पाइ सैल अस बिधि कही॥ ३॥
अंडा फूट अकास, होइ निरास सूरति चली।
अगम गली निज पाइ, तहँ आसन तुलसी कियौ॥ ४॥
हिरदे हरष समाइ, पाइ ताहि गति कस कही।
कोइ कोइ संत समाय, ताही तें गति तस भई॥ ५॥
अर्थ-पिंड (घट) के भीतर ही ब्रह्मांड है और उसके पार जाकर ब्रह्म का निवास देखा। तुलसी
साहब कहते हैं कि उसकी संसक्ति में तीनों पटों को खोलकर मैं भिन्न स्वरूप का साधु हो गया॥ १॥
सन्तों की अनुकूलता तथा सद्गुरु की शरण पाकर मैं सहस्त्रार कमल के मध्य जाकर विलीन हो
गया और उस 'सत्य' तत्त्व के मूल में जाकर संसक्त होकर फँस गया॥ २॥
फिर इसके बाद तो उस अगम के कपाट खुल गए और तब लीला शिखर के पार होकर पृथ्वी
तथा आकाश के उस पार शून्य शिखर को प्राप्त करके इस प्रकार कह रहा हूँ।
तुलसी साहब कहते हैं कि ब्रह्मांड (अंडा) आकाश में फूट गया और इसे देखकर सुरति निराश
होकर चल पड़ी और आगे एक अगम्य गली पाकर उसने वहाँ आसन जमा लिया॥ ४॥
उसे पाकर, उसकी गति का वर्णन कैसे किया जा सकता है, हृदय में हर्ष समाया हुआ है। कोई-
कोई सन्त उस अगम गली में प्रवेश करता है उसमें प्रवेश करते ही उसकी दशा तन्मयी (ब्रह्ममयी) हो
उठती है॥ ५॥
॥ छन्द॥
तीनों पट बाहिर कहूँ नहिं जाहिर। अगम अगत की राह लई॥
खोला वह द्वारा अगम पसारा। सतगुरु पुर के पार गई॥ १॥
सतलोक दुहेला कीन्ही सैला। अगम अकेला लार भई॥
ता से पद न्यारा निरखि निहारा। तासु अनामी नाम नहीं॥ २॥
फूला निज कँवला सूरति सम्हला। नील सिखर तन तार लई॥
अंडा निज फूटा दस दिस टूटा। छूटि सुरति असमान गई॥ ३॥
तुलसी तन सैला घट बिच खेला। संतकृपा से राह लई॥
ब्रह्मांड न पिंडा नहिं नौ खंडा। रबि चंदा तहँ तार नहीं॥ ४॥
पानी नहिं पवना अगिन न भवना। गगन गिरा के पार भई॥
देखा सत्त सैला अगम अकेला। सूरति केला सब्द मई॥ ५॥
तुलसी मत पाई संत लखाई। पास समाई गाइ कही॥ ६॥

घट रामायण / १२५
अर्थ-तीनों पटों के बाहर कुछ भी जाहिर (स्पष्ट) नहीं होता-साधक केवल अगम्य एवं अज्ञेय की
राह पकड़ लेता है। जैसे ही, साधक ने वह द्वार (चौथा द्वार) खोला-चारों ओर अगम्य ही प्रसरित
पसरा फैला हुए दिखाई पड़ता है-सतगुरु पुर के पार आत्मा चली गई ॥ १ ॥
दुर्लभ सत्यलोक में एक पर्वत शिखर है। वह अगम्य अकेला वहीं आत्मभूत तन्मय है-इसलिए
उसका स्थान विलक्षण है, अच्छी तरह से मूक साधक को देखा-वह अनाम है, कोई उसका नाम नहीं
है॥ २ ॥
अगने ही कमल दल वह तन्मय होकर आनन्दित है, सुरति ज्ञान से सम्बला हुआ है और अपने चित्त
का तारतम्य (एकतानता) नील शून्य शिखर से जोड़े हुए है। उसका ब्रह्मांड फूट पड़ा, समस्त दसों
दिशाएँ टूट चलीं और सुरति बन्धन से छूटकर शून्याकाश में विलीन हो गई ॥ ३ ॥
उस ब्रह्म का शून्य शिखर इस शरीर पिंड के बीच क्रीड़ा करता दिखा और संतों की कृपा से मैंने
सन्मार्ग पकड़ा। फिर वहाँ न ब्रह्मांड है, न पिंड है, न नौ खण्ड (लोक) हैं। वहाँ सूर्य, चन्द्रमा एवं तारे
भी नहीं हैं। ४ ॥
न वहाँ जल है, वायु है, न अग्नि है, न पृथ्वी (भवन) है, न आकाश है। और आकाश शब्द के
पार जाकर स्थित हो उठा। तुलसी साहब कहते हैं कि इस प्रकार की अनुभूति पाकर मैंने सन्तों को
दिखाया-वह मेरे पास आकर समानिष्ट हो उठी और मैंने उसे इस प्रकार से गाकर सुनाया ॥ ५ ॥
॥ सोरठा ॥
तुलसी निरखि निहारि, नैन पार निज देखि कै।
यह अदेख की बात, जिन अदृष्टि हिरदे लखा॥ १ ॥
तुलसी तुच्छ अबूझ, जबै सूझ सूरति लखी।
अलख खलक के पार, निः अच्छर वो है सही ॥ २ ॥
संत चरन पद धूर, तुलसी कूर कारज कियौ।
लिया अगम पद मूर, सूर सन्त अपना कियौ॥ ३ ॥
मैं उनकी बलिहार, लार लागि पारै कियौ।
चौथा पद निज सार, सो लखाइ संतन दियौ ॥ ४ ॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि मैंने उसे भलीभाँति समझकर निहारकर और अपने नेत्रों के उस
पार देखकर उस अदृश्य मूल तत्त्व की चर्चा की है। उस अदृश्य को मैंने हृदय में देखा था ॥ १ ॥
तुलसी साहब कहते हैं कि उस अत्यन्त सूक्ष्म एवं अज्ञेय को जब सुरति ध्यान साधा, तब सूझ पड़ा।
इस संसार के उस पार, अलक्ष्य रूप वह निश्चय रूप से अक्षर शून्य हैं अर्थात् उसे अक्षरों में नहीं बाँधा
जा सकता ॥ २ ॥
तुलसी साहब कहते हैं कि मैं तो सन्त चरणों के पग की धूलि हूँ-मैंने उस अगम पद के मूल तत्त्व
को अपना लिया और दिव्य दृष्टि वाले साधक सिद्धों (सूर सन्त) को अपना बना लिया ॥ ३ ॥
मैं उनकी बलिहारी जाता हूँ-जिन्होंने उस ब्रह्म की संसक्ति से सम्बद्ध होकर संसार सागर को पार
कर लिया है। मेरी संत साधना का सार तत्त्व यह चतुर्थ पद है-जिसको मैंने सन्तों को दिखा दिया ॥ ४ ॥
भेद पिंड और ब्रह्मांड का
॥ चौपाई ॥
तुलसी मैं अति नीच निकामा। मैं अनाथ गति बूझि न जाना॥
मैं अति कुटिल कूर कुबिचारी। सत सत संत सरनि निरबारी॥

१२६ / घट रामायण
अब मैं अपना औगुन भाखी। निरनय जी की कोइ नहिं राखी॥
अपनी चाल गती गुन गाऊँ। मोहिं सों अधम और नहिं नाऊँ॥
संत दयाल दीन-हितकारी। मोरे औगुन नाहिं बिचारी॥
संत सरल चित सब सुखकारी। मो को पकरि हाथ निरबारी॥
कहँ लगि उनके गुन गति गाऊँ। मोर अचेत लखी नहिं काहू॥
मोरी तपन ताप निज हेरा। तुलसी नीच का कीन्ह निबेरा॥
कोटिन जिभ्या जो मुख होई। तौ मैं बरनि सकौं नहिं सोई॥
कोटिन कल्प-बृच्छ जो होई। तौ सरवर पावै नहिं कोई॥
तिनकी तीनि लोक रज पावन। कस बरनौँ मोरे मन भावन॥
तिन कौ भेद बेद नहिं पावै। वोहू नेति नेति गोहरावै॥
दस औतार और तिरदेवा। वोहु न उनको पावै भेवा॥
कहँ लग कहौं संत गति न्यारी। मोरी मति गति नाहिं बिचारी॥
तीनि लोक का पटतर लाऊँ। उन सम तुलसी कहा दिखाऊँ॥
मैं मत त्राहि त्राहि करि भाखी। ऐसी कौन बताऊँ साखी॥
संतन की गति कस कस गाऊँ। अस कोइ देखि परै नहिं ठाऊँ॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि मैं अत्यन्त तुच्छ तथा निकम्मा हूँ। सदा मैं अनाथ रहा हूँ और इस
संसार की गति की मुझसे समझ नहीं है। मैं अत्यन्त कुटिल, क्रूर और ना समझ हूँ किन्तु मुझे
अनेकानेक संतों की शरण ने विवेक दिया (निखारी) है॥
मैं अपने अवगुणों का वर्णन कर दिया है और हृदय (जी) के किसी निर्णय (निरनय) को
(छिपाकर) नहीं रखा है। मैं अपने व्यवहार एवं समझ का वर्णन कर रहा हूँ-(इस संसार में) मुझसे
अधम और कोई नहीं है॥
सन्तजन तो अत्यन्त दयालु एवं दीनों के हितैषी होते हैं-वे मेरे अवगुणों पर विचार नहीं करेंगे। संत
जन अत्यन्त सरस चित्त के तथा सभी के लिए सुखदायी होते हैं-उन्होंने मेरा हाथ थाम कर मुझे विवेक
दिया है॥
कहाँ तक मैं उनके गुणों और विवेक का वर्णन करूँ। किसी ने भी मेरी अज्ञनता (उनके
अतिरिक्त) नहीं देखी। उन्होंने मेरी पीड़ा और मेरे कष्टों को समझा-बूझा और तुलसी साहब कहते हैं कि
उन्होंने इस तुच्छ दास को संकट मुक्त किया॥
यदि मेरे मुख में कोटि-कोटि जीभें होतीं तो भी उनके उपकार का मैं वर्णन नहीं कर सकता। यदि
कोटि-कोटि कल्पवृक्ष भी हो तो भी वे उस (ज्ञान) सरोवर को नहीं प्राप्त कर सकते॥
तीनों लोकों में इन संतों की चरण रज पवित्र है-उनका वर्णन मैं कैसे कर सकता हूँ क्योंकि मेरा
मन तो संसक्तियों से भरा (भावन) है। उनकी समझ वेद आदि भी नहीं पा सकते और वे भी नेति नेति
कहकर पुकारते रहते हैं॥
ब्रह्मा, विष्णु, महेश ये तीनों (त्रिदेवा) तथा विष्णु के दशावतार वे भी उनका भेद नहीं पा सकते हैं।
मैं कहाँ तक संतों की विलक्षण गति का वर्णन करूँ-मेरी बुद्धि उसकी गति का विचार नहीं कर
सकती॥
तुलसी साहब कहते हैं कि मैं तीनों लोकों के सादृश्यों को इकट्ठा भी कर दूँ तो सन्तों के सदृश कैसे
दिखाऊँगा। मैं और मेरी बुद्धि त्राहि-त्राहि करके कह रही है कि उनकी साक्षी (प्रमाण-समता) के लिए