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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

१३४ गरीबदास जी की बानी
आठो बखत अल्हैया¹ बाजै, होता सब्द टँकोरा ।
गरीबदास यूँ ध्यान लगावै, जैसे चंद चकोरा ॥१०॥
( २ )
बँगला सोई सत्त परवान, तामें पारब्रह्म का ध्यान ॥टेक॥
साढ़े तीन करोड़ बृच्छ² हैं, या बँगले के पासा ।
सालेमार सरीर सरोवर, नौ लख बाग खुलासा ॥ १ ॥
या बँगले के आगे कूआ, उरध-मुखी महमंता ।
मनुवा माली वारे ढारै, आठो बखत चलंता ॥ २ ॥
इला पिंगला मद्ध सुखमना, ता पर एक सुराही ।
अमी महारस छाक परी है, पीवत होय रुसनाई ॥ ३ ॥
रोसन तकिये रास होत है, बाजे बजैं अपारा ।
पाँचौं इन्द्री अस्थिर होई, घूमै मन मतवारा ॥ ४ ॥
संखौं कमल कलस की नाईं, सेत भमर झनकारैं ।
कोयल मोर पपीहा बोलैं, दादुर अधिक गुंजारैं ॥ ५ ॥
बीना ताल पर पखावज बाजै, गावै गंधर्प रागी ।
सिव की तहाँ समाध लगी है, चीन्ह पड़ी बड़ भागी ॥ ६ ॥
ध्रू प्रहलाद और नाम³ कबीरा, नारद सुकदे व्यासा ।
गोरख दत्त भये गलताना, देखा अजब तमासा ॥ ७ ॥
ब्रह्मा बिस्नु महेसर सेसा, ररंकार धुन होई ।
गुफ⁴ बीरज⁵ यह मंत्र जो दीन्हा, राख सब्द कूँ गोई⁴ ॥ ८ ॥
मान सरोवर ऊपर बँगला, जहँ हंस परमहंस खेलै ।
गरीबदास भवसागर सेती, पूरा सतगुरु बेलै⁶ ॥ ६ ॥
( ३ )
बँगला सोई सत्त निज सार, जा में पारब्रह्म दीदार ॥टेक॥
(१) एक रागिनी का नाम । यहां अनहद धुन से मतलब है । (२) रोम (रोआँ) की
गिनती शास्त्रों में साढ़े तीन करोड़ लिखी है । (३) नाम देव । (४) गुप्त । (५) बीज मंत्र
ओंकार शब्द का नाम है । (६) उबारै ।

राग बँगला १३५
दिल अंदर दीदार होत है, बाहर भीतर सोई।
तिरबेनी असनान कीजिये, मल मुत्तर सब धोई ॥ १ ॥
बँगले आगे संख फुहारा, फूटैं सहसर१ धारा।
दिब्य दृष्ट तो देखत है सो, हर दम बारम्बारा ॥ २ ॥
गंगा जमुना मद्ध सुरसती, पट्टन घाट फुहारा।
कालिन्द्री काया परछाली२, धन बड़ भाग हमारा ॥ ३ ॥
इंदरदौन३ महोधध३ बाजै, रतनागर४ लहराई।
जगन्नाथ जगदीश बिराजै, देखो क्यूँ ना भाई ॥ ४ ॥
हरद्वार हरि पैड़ी न्हाये, बद्रीनाथ बिलासा।
द्वारावती५ दरस नित होई, कर बृन्दावन बासा ॥ ५ ॥
लोहागिर३ पुष्कर३ पद परसे, गया३ पिंड परधाना।
अठसठ तीरथ हैं तन माहीं, मोच्छ मुक्त भये प्राना ॥ ६ ॥
कासी औ कांती६ काया में, मोच्छ दायका माया।
अकल अजोध्या आदि अनादं, सप्त पुरी दरसाया ॥ ७ ॥
अवन्तिकापुरी६ अरथ के माहीं, सुरत निरत से जानी।
गरीबदास साहब का बँगला, अजर अमर परवानी ॥ ८ ॥
( ४ )
बँगला खूब बना प्राचीन, जा में अरस७ कला दुरबीन ॥टेक॥
बँगले आगे ज्योढ़ी लागी, पलकों दी चिक बंधा।
छानबे कोटी मेघ माल८ है, सब्द सिंध गरजंदा ॥ १ ॥
बँगले आगे नग सरवर९ है, तेंतिस कोट तपंता१०।
सहस अठासी मुनिन्दर बैठे, सोहं जाप जपंता ॥ २ ॥
बँगले आगे बाट११ बिहंगम, दो दर हैं भितरी के।
(१) हजार । (२) धोई । (३) तीर्थों के नाम । (४) समुद्र जिसमें मोती पैदा होता
है । (५) द्वारिका । (६) तीर्थों के नाम । (७) सहसदलकँवल । (८) बादलों का समूह ।
(९) रत्न का सागर । (१०) जहाँ तेंतीस कोट देवता तपस्या करते हैं। (११) रास्ता ।

१३६ गरीबदास जी की बानी
ब्रह्म रंध्र१ का घाट जहाँ है, साधू चढ़ै सु देखे ॥ ३ ॥
बँगले आगे नटवा२ नाचै, ताहि लखै नहि कोई ।
पड़ै गगन से धरती ऊपर, खंड बिहंड न होई ॥ ४ ॥
बँगले भीतर रतन अमोली, सेत पीत नहिं जरदा ।
बिनहीं चरनों चलै चिदानंद, चसमों आगे फिरदा ॥ ५ ॥
रिग जजु साम अथर्वन चारो, बँगले माहिं बिराजैं ।
सुखम३ बेद से तारी लागी, अनहद नौबत बाजैं ॥ ६ ॥
आसन पदम लगाय रहा है, हाथ कमंडल डंडा ।
ब्रह्मा आदि अनादं बैठे, चार बेद धुन खंडा ॥ ७ ॥
सुखम बेद से सुरत लगावै, सो सुरती महँ अंगा ।
गरीबदास बाहर क्यूँ भरमै, घटही अंदर गङ्गो ॥ ८ ॥
( ५ )
बँगला खूब बना है बेस४, यामें ररङ्कार धुन सेस ॥टेक॥
रोम रोम में नाम चलत है, अजपा तारा लागी ।
सुरत निरत पर अनहद बाजै, सुनते हैं अनुरागी ॥ १ ॥
मूल चक्र का घाट बाँध कर, सुखमन पवन अरोधै ।
परथम आदि गनेस मनावै, नाभि कमल कूँ सोधै ॥ २ ॥
बङ्क नाल का घाट बिकट है, जहाँ खेचरी लावै ।
अमी महारस अमृत पीवै, अजर अमर हो जावै ॥ ३ ॥
दहिने गङ्गा बायें जमुना, मद्ध सुरसती धारा ।
उलटा मीन चढ़ै सरवर में, ऐसा खेल हमारा ॥ ४ ॥
हाथ न पैर पिंड नहि प्राना, सुन सरवर में खेलै ।
बाँस बल्ली नौका नहिं लागै, (तौ) कैसे भौंरा पेलै ॥ ५ ॥
दूरबीन ऐनक अनुसरी, पवन पिंड भर गोला ।
सुरत निरत की सुरङ्ग लगावै, दरसै रतन अमोला ॥ ६ ॥
(१) शिवनेत्र, तीसरा तिल । (२) मन । (३) सूक्ष्म । (४) उत्तम ।

राग बँगला १३७
कोट कोट दामिन दमकाहीं, गरजै सिंध समूचा।
सीलवंत सैलानी जोगी, मिलै काछ का सूचा१ ॥ ७ ॥
संखौं पदम झिलमिलै जोती, अगम पंथ बैराटा।
गरीबदास सतगुरु के सारै२, उतरै औघट घाटा ॥ ८ ॥
(६)
बँगला अजब बना है खूब, जामें पार ब्रह्म महबूब ॥टेक॥
आगे नौलख पातुर नाचैं, ब्रह्मानंद रिझावैं।
तेज पुंज की सुंदर नारी, अनहद मंगल गावैं ॥ १ ॥
पीतंबर फहरात तासु कै, सूहे३ बस्तर साजैं।
एक कान्ह औ नौलख गोपी, बँगले माहिं बिराजैं ॥ २ ॥
चंद सूर दो अधर चिरागा, हुकमी पौन औ पानी।
सकल संत औ सकल साहबी, बङ्गले माहिं बिनानी ॥ ३ ॥
पाँचो तत्त खवास खड़े हैं, हाजिर नाजिर जाके।
तिरलोकी का राज रसातल, क्या कोड़ी धज लाखै४ ॥ ४ ॥
सब रतनन का रतन नाम है, नाम रतन कूँ जानै।
इन्द्र का राज काग की बिष्टा, जासे उलटा तानै ॥ ५ ॥
हीरा मोती जबाहिर ताईं, पारस पल्ले न बाँधै।
सब्द सिध चिंतामन साहब, सुरत गगन कूँ साधै ॥ ६ ॥
चिंतामन पारस परमेसर, हिरदे माहिं बिराजै।
गरीबदास ताही कूँ सेवै, जाका अविचल राजै ॥ ७ ॥
(७)
बँगला खूब बना है ऐन५।
जामें कलबिरछा६ काम धैन ॥ टेक ॥
गंगा कोट त्रिवेनी संगम, कासी गया प्रयागा।
(१) लँ गोट का पक्का। (२) सहायता से, सहारे। (३) लाल। (४) पारब्रह्म की शोभा
के आगे तीन लोक का राज जहन्नुम के बराबर और करोड़ों की सम्पत गई है। कोड़ी-
धज = कोटिध्वज (देखो नोट पृष्ठ ७७)। (५) सुन्दर। (६) कल्पवृक्ष।

१३८ गरीबदास जी की बानी
या बँगले में साहब बैठा, सब्द करै अनुरागा ॥ १ ॥
संख सरसुती बहैं अगोचर१, गुपती गोप गियाना२।
बँगले की पारस की पैंड़ी, पाया पद निरवाना ॥ २ ॥
या बँगले में सेत गुमठ३ है, ता मध अलख गुसाँई ।
सेत छत्र सिर मुकुट बिराजै, दरसा नैनों माहीं ॥ ३ ॥
निरबानी परवानी पद है, रूप बरन सूँ न्यारा।
बँगले में से उड़ै बिहंगम, खेलै अधर अधारा ॥ ४ ॥
अधर अधार अपार पुरुष है, दृष्ट मुष्ट नहि आवै।
सूक्ष्म रूप सरूप जान के, सेस सहस मुख गावै ॥ ५ ॥
उड़े बिहंगम अकल तरंगम, जाके मोह न माया।
सतगुरु भेदी भेद कहत हैं, हम दिब दृष्ट लखाया ॥ ६ ॥
जोजन संख पलक में पहुँचै, बिनही चरनों धावै।
अगमी डोर सुरत से खैंचै, फिर बँगले में आवै ॥ ७ ॥
सुरत सुहंगम मूल बिहंगम, ज्ञान ध्यान से ऊँचा।
घट मठ महतत४ सेती न्यारा, कहा घाट बँध कूचा ॥ ८ ॥
पिंड ब्रह्मांड से न्यारी जोती, बिन ही पेंगन झूलै।
गरीबदास धिरकार जनम कूँ, जो इस पद कूँ भूलै ॥ ६ ॥
( ८ )
बँगला खूब बना दरहाल, जामें रतन अमोले लाल ॥ टेक॥
जल की बूँद महल मठ कीन्हा, नख सिख साज बनाया।
या बँगले में गैबी खेलै, ना मूवा ना जाया ॥ १ ॥
या बँगले के चौसठ खंभा, पाँच पदारथ लागे।
तीन गुनन की गलियाँ माहीं, कोइ सूते कोइ जागे ॥ २ ॥
कोट उनंचा५ पवन गुँजारैं, नौ नाड़ी से नेहा।
धाम बहत्तर धारा नगरी, जासे लगा सनेहा ॥ ३ ॥
(१) इंद्रियों की पहुँच के परे। (२) ज्ञान। (३) गुम्बज़ । (४) महातत्व । (५) उनचास ।

राग बँगला १३६
चौथे पद से महरम नाहीं, तीन गुनन में धोका ।
चौथा पद चितामन साहब, सौदा रोकम रोका१ ॥ ४ ॥
आलस नींद जम्हाई जोरा, कर्म नास होई ।
सील संतोष बिबेक न चीन्हा, जनम अकारथ खोई ॥ ५ ॥
आसा त्रिस्ना बनी दुलहिनी, मनसा नारी सोई ।
बँगले के दरवाजे बैठी, देख सहेली दोई ॥ ६ ॥
दूती दोइ दलों बिच खेलै, मोहे सुर नर सारे ।
गन गंधर्प औ ज्ञानी ध्यानी, बँगले माहि पछारे२ ॥ ७ ॥
काम क्रोध औ लोभ मोह की, मदिरा प्याई भारी ।
गरीबदास सतगुरु सौदागर, भौसागर से पारी ॥ ८ ॥
( ६ )
बँगला खूब किया बकसीस, साहब पारब्रह्म जगदीस ॥टेक॥
या बँगले की चीन्ह परी है, बाँधा नौ दस मासा ।
पैसा एक न मेहनत माँगे, धन दासन पति दासा ॥ १ ॥
लख चौरासी बँगले छावै, न्यारी न्यारी भाँती ।
साच्छीभूत सकल सँग खेलै, कीड़ी कुंजर हाथी ॥ २ ॥
या बँगले का तोल न मोलं, संख पदम झनकाईं ।
या बँगले कूँ राख न सक्कैं, सेस महेसर ताई ॥ ३ ॥
हीरे मोती झालर लागे, और लालन की पाँती ।
या बँगले कूँ छाँड़ चलेंगे, ना कोई संग ना साथी ॥ ४ ॥
चंद सूर दो कलस बिराजैं, मध इक अजब फुहारा ।
झलकै जोती बरषै मोती, जानै जाननहारा ॥ ५ ॥
काम धेनु अरु कल्प बृच्छ हैं, ये दो बँगले माहीं ।
अठ सिध नौ निध परम पदारथ, अवगत अलख गुसाँई ॥ ६ ॥
या बँगले में बाघ बसत है, हंसा लेत गिरासी ।
(१) नकद, खरा । (२) गिरा दिया ।

१४० गरीबदास जी की बानी
पकरै बाघ राग कूँ चीन्है, ताहि मिलै अबिनासी ॥ ७ ॥
पकरा बाघ कबीर पुरुष ने, जड़िया तौक जँजीरं ।
जाका बँगला अजर अमर है, धन पीरन सिर पीरं ॥ ८ ॥
संख कलप जुग परलै जाहीं, बँगला डिगै न डोलै ।
गरीबदास सतगुरु का बँगला, ना कुछ तोल न मोलै ॥ ६ ॥
( १० )
काया खोज ले रे, तो में रहता पुरुष अलेख ।
बिभिचारिन का स्वाँग छाँड़ दे, क्या दिखलावै भेख ॥टेक॥
मुक्ताहल की पैंठ लगी है, चौपड़ के बाजार ।
ब्रह्म सहर बेगम पुर चलिये, अवगत नगर अपार ॥ १ ॥
अष्ट कमल दल भींजन लागे, बरषत अमृत नीर ।
सोहं हंसा किया पयान, मानसरोवर तीर ॥ २ ॥
बिन बादल बिन बिजली चमकै, बूटै१ सुन्न फुहार ।
संख कला झलकंती जोती, गगन मँडल गुलजार ॥ ३ ॥
इस काया में नीझर झरते, औंडे२ दरिया कूप ।
सीसी३ संख४ फिरैं सुर पीवैं, प्याले अजब अनूप ॥ ४ ॥
इस काया में रास मंडल है, बाजैं अनहद तूर ।
सोहं हंसा सिंध मिले हैं, झिलमिल नूर जहूर

चतुर्थ खण्ड: आरती, साखी संग्रह एवं गरीबदास जी की बानी उपसंहार

राग रामकली १४१
ज्ञान ध्यान जिस धाम न पहुँचै, साखी सब्द सरीर ।
सुन्न असुन्न परम सुन चीन्हों, औंडी१ मँजिल कबीर ॥ ६ ॥
सप्त सुन्न पर संखा झालर, अछर घाम की डोर ।
मकर तार की बीन चीन्ह कर, होना गारतगोर ॥१०॥
पाँच तत्त तीनों गुन नाहीं, धर२ अंबर३ नहिं धौल४ ।
चन्द्र सूर नहिं पावक पानी, बङ्की नगरी पौल५ ॥११॥
मेटो खोज बोझ सब डारो, मिलिहो निरगुन तान ।
दास गरीब परम रंग भीना, चीन्हा पद निरबान ॥१२॥
॥ राग रामकली ॥
राम सुमिर राम सुमिर राम सुमिर हंसा ॥
भक्ति जान ज्ञान ध्यान छाँड़ो कुल बंसा ॥टेक॥
कोट करम भरम जारि पार तोहि उतारै ॥
मुक्ति लोक पाय मोक्ष नाम जो उचारै ॥ १ ॥
सुरत सिंध कोट चंद्र झलकै पल माहीं ॥
पद निर्बान है अमान आदि अंत नाहीं ॥ २ ॥
निराकार अधर धार वार पार नाहीं ॥
ब्यापक महबूब खूब धूप है न छाहीं ॥ ३ ॥
संख तूर दर जहूर मिल मिल मिल रंगा ॥
घुरै नाद संख साध चरन कोट गङ्गा ॥ ४ ॥
अरस कुरस नूर दरस तेज पुंज देखा ॥
कोट भानु साँच मानु रोम रोम पेखा ॥ ५ ॥
अमृत रस अमी पीव खुरदनी खुसाली ॥
प्याले मुसताक पाक लालन सिर लाली ॥ ६ ॥
(१) गहिरी, अड़बड़। (२) धर = धरा अर्थात् पृथ्वी। (३) आकाश। (४) धवल के
अर्थ सफेद के हैं—यहाँ धवलागिरि से मतलब हो, या धौल = धूल अर्थात् परमाणु रूप
माया से। (५) द्वार।
१६

१४२ गरीबदास जी की बानी
नाद बिन्द घट अकार देह गेह नाहीं ॥
निरमल निरदंद ऐन, देखतही होत चैन, पलकन के माहीं ।७।
आदि मूल रतन फूल सेत पद सुभाना ॥
गरीबदास जहाँ बास दरस में दिवाना ॥ ८ ॥
( २ )
राम सुमिर राम सुमिर राम सुमिर लोई ।
सतगुरु उपदेस दीन्ह भक्ति बीज बोई ॥ टेक ॥
काम क्रोध लोभ मोह सत्रु हैं तुम्हारे ।
हरष सोग राग दोष पकर क्यों न मारे ॥ १ ॥
तीन चीन्ह पाँच मार पकरो मठधारी१।
पुत्र तो पचीस संग सैन है अपारी ॥ २ ॥
पाँच नार घट मँझार मन की पटरानी ।
द्वादस दल कोट कटक सेन२ है बिरानी ॥ ३ ॥
साहुकार पकर लीन्ह लूटै गढ़ चोरा ।
आतम तो अनाथ सुनो राम बाप मोरा ॥ ४ ॥
मन के सब राज पाट तीन लोक माहीं ।
आतम तो अनाथ जीव सुनो हो गुसाईं ॥ ५ ॥
फंद काट करो साँट३ मौज मेहरबाना ।
अरज तो कबूल होय साहब रहमाना४ ॥ ६ ॥
साहब दरबार बीच कूकै बंदिजादा५ ।
महजर६ क्यूँ न सुनो राम पूछ हो फिलादा७ ॥ ७ ॥
समरथ जगदीस ईस, सरन आया तोहीं ।
ठाढ़ा दरबार तोरे सुनो राम दोही८ ॥ ८ ॥
अर्थ धर्म काम मोच्छ पूरन सब काजा ।
गरीबदास सरन आया बाप राम राजा ॥ ६ ॥
(१) महंत यानी मन । (२) फौज । (३) मेला । (४) दयाल । (५) दास । (६)
अर्जी । (७) फर्याद । (८) दुहाई ।

राग रामकली १४३
( ३ )
राम सुमिर राम सुमिर राम सुमिर बौरे ।
हर दम तो अजपा जाप साहबै भजो रे ॥ टेक ॥
इंद्री घट पाँच भूत, दूत हैं दिवाने ।
पच्चिस परकिर्त१ लार जाने तीन जाने ॥ १ ॥
काम सहर क्रोध कहर लोभ लहर ऊठैं ।
मोह के तो परे फंद कैसे कर टूटैं ॥ २ ॥
सेन दल अपार यार एती ठकुराई ।
कैसे कर पड़ा जाय गढ़ सुरंग लाई ॥ ३ ॥
अकड़ी२ हठवान३ बाँका जोधा मन राजा ।
कोट तो निसान घुरैं बजैं अनँत बाजा ॥ ४ ॥
सेन दल अपार सजे संख लहर लहरी ।
खसिया४ मन राज करै मरद है न मेहरी५ ॥ ५ ॥
सुरग और पताल मिरत तिहूँ लोक लूटे ।
सतगुरु की सरन आये सोई जान छूटे ॥ ६ ॥
काया गढ़ नहीं तेरा देंह साँच मानी ।
भाड़े६ की दुकान यार सो तो है बिरानी ॥ ७ ॥
दूने तीने नाहिं कीन्हे हाट बीच टोटा ।
पकरैंगे जम जहूद तोरैंगे लँगोटा ॥ ८ ॥
होयगा बेवतन७ हंस देह जार दीनी ।
गरीबदास कहाँ बास पंथ खोज मीनी ॥ ६ ॥
( ४ )
राम सुमिर राम सुमिर, राम सुमिर मीता ।
बिन सतगुरु ज्ञान ध्यान, खाली है सलीता८ ॥टेक॥
(१) प्रकृति । (२) हेकड़ । (३) हठीला । (४) बधिया, हिजड़ा । (५) स्त्री । (६)
किराया । (७) बिना घर का । (८) बोरा ।

१४४ गरीबदास जी की बानी
हाड़ चाम सकल गाम, गंद है खलीता१ ।
पाक तो बिसार दीन, बरहना जरीता२ ॥ १ ॥
दम का सुमार कीन, नाम क्यूँ न लीता ।
इला पिगला बिचार, सुखमना पलीता३ ॥ २ ॥
सील और संतोष आन, दया धरम कीता ।
काम क्रोध लोभ मोह, सत्त्रु क्यों न जीता ॥ ३ ॥
साहब दिल से बिसार, कौन जुलम कीता ।
दुनिया गुफ्तार४ यार, बाँड़ दे अनीता ॥ ४ ॥
नाहीं वह स्याम सेत, लाल है न पीता५ ।
आवै नहिं पारख६, पढ़ो कोट ज्ञान गीता ॥ ५ ॥
पिंड प्रान अरप दीन, सतगुराँ सरीता७ ।
गरीबदास पावै यूँ, ब्रह्म पद अतीता ॥ ६ ॥
( ५ )
राम सुमिर राम सुमिर, राम सुमिर लै रे ।
जम और जहान जीत, तीन लोक जै रे ॥टेक॥
इंद्री अदालत चोर, पकड़ो मन आहि८ रे ।
अनहद टंकोर घोर, सुनै क्यूँ न बहिरे ॥ १ ॥
सुरत निरत नाद बिंद, मन पवना गहि रे ।
उनमुनी अलेल९ रूप, निराकार लहि रे ॥ २ ॥
धनुष१० ध्यान मार बान११, दुरजन से फहरे१२ ।
देखत के सीत कोट, भरम बुजे ढह रे ॥ ३ ॥
साँचे से प्रीत कीन, झूठा मन मह१३ रे ।
कहत है गरीबदास, कुटिल बचन सह रे ॥ ४ ॥
(१) थैली, झोला। (२) नंगा जलाया जायगा। (३) बत्ती जिससे रंजक में आग
लगाते हैं। (४) निरी बात, कहानी। (५) पीला। (६) परख, जाँच । (७) शरन ली।
(८) साँप। (९) बेपरवाह। (१०) कमान। (११) तीर। (१२) दूर रहो, बचो। (१३) मथ
लो अर्थात् छाछ की तरह अलग कर दो।

॥ राग असावरी ॥
मन तू चल रे सुख के सागर, जहाँ सब्द सिंध रतनागर ॥टेक॥
कोट जनम जुग भरमत होगये, कछू न हाथ लगा रे ।
कूकर सूकर खर भया बौरे, कौवा हंस बिगारे ॥ १ ॥
कोट जनम जुग राजा कीन्हा, मिटी न मन की आसा ।
बिच्छुक होकर दर दर हाँडा१, मिला न निरगुन रासा ॥ २ ॥
इन्द्र कुबेर ईस की पदवी, ब्रह्मा बरुन धर्मराया ।
बिस्वनाथ के पुर कूँ पहुँचा, बहुर अपूठा२ आया ॥ ३ ॥
संख जनम जुग मरते हो गये, जीवत क्यूँ न मरै रे ।
द्वादस मद्ध महल मठ बौरे, बहुर न देह धरै रे ॥ ४ ॥
दोजख भिस्त सबै तैं देखे, राज पाट के रसिया ।
तिरलोकी से तिरपत नाहीं, यह मन भोगी खसिया३ ॥ ५ ॥
सतगुरु मिलै तो इच्छा मेटै, पद मिल पदहिं समाना ।
चल हंसा उपदेस पठाऊँ, जहँ आद अमर अस्थाना ॥ ६ ॥
चार मुक्ति जहँ चंपी करिहैं, माया हो रहि दासी ।
दास गरीब अभय पद पर से, मिले राम अबिनासी ॥ ७ ॥
( २ )
मन तूँ सुख के सागर बस रे, और न ऐसा जस रे ॥टेक॥
सब सोने की लंका होती, रावन से रन धीरं ।
एक पलक में राज बिराजी, जम के पड़े जँजीरं ॥ १ ॥
दुर्योधन से राजा होते, संग इकोतर४ भाई ।
ग्यारह छोहनि संग चलै थी, देह गीध ने खाई ॥ २ ॥
साठ हजार सुभट५ के होते, कपिल मुनीस्वर खाये६ ।
एकै पुत्र उत्तानपात के७, परमातम पद पाये ॥ ३ ॥
(१) भरमा । (२) उलटा । (३) हिजड़ा । (४) एक सौ एक । (५) जोधा । (६) देखो
नोट पृष्ठ ८५ । (७) देखो ध्रुव की कथा नोट पृष्ट २७ ।

१४६ गरीबदास जी की बानी
राम नाम पहलाद पढ़े थे, हिरनाकुस नहिं भाये ।
नरसिंह रूप धरे नारायन, खंभ फार कर आये१ ॥ ४ ॥
नामदे नाम निरंजन राते, जाकी छान छवाई ।
एक पलक में देवल फेरा, मिर्तक गऊ जिवाई२ ॥ ५ ॥
कासीपुरी कबीरा होते, ताहि लखो रे भाई ।
जहाँ केसो बनजारा उतरा, नौलख बालद आई ॥ ६ ॥
कनक जनेऊ कन्ध दिखाया, भक्ति करी रैदासा ।
दासगरीब कौन गत पावै, मगहर मुक्ति बिलासा ॥ ७ ॥
( ३ )
मन तूँ मान सरोवर न्हा रे, इहाँ न भटका खारे ॥ टेक ॥
सूरज मुखी फूल जहाँ फूलै, संख पदम उँजियारा ।
गंगा जमुना मद्ध सरसुती, तिरबेनी की धारा ॥ १ ॥
जहाँ कमोदनि चन्द्र उगत हैं, कमल कमल मध तूरा३ ।
अनहद नाद अजब धुन होहीं, जानै सतगुरु पूरा ॥ २ ॥
ओघट घाट बिषम है दरिया, न्हावै संत सुजाना ।
मोच्छ मुक्ति की परबी लै रे, साखी है ससि भाना ॥ ३ ॥
जहाँ उहाँ हंस कुतूहल करते, मोती मुक्ता खाहीं ।
ऐसा देस हमेस हमारे, अमृत भोजन भाहीं४ ॥ ४ ॥
संखों लहर मिहर की उपजै, कहर नहीं जहाँ कोई ।
दास गरीब अचल अबिनासी, सुख का सागर सोई ॥ ५ ॥
( ४ )
बाबा बिकट पंथ रे जोगी,
तातें छाँड़ सकल रस भोगी ॥ टेक ॥
पर्थम सिद्धि गनेस मनावों, मूल कमल की मुद्रा ।
किलियं जाप जपो हरि हीरा, मिटै करम सब छुद्रा५ ॥ १ ॥
(१) देखो नोट पृष्ठ ७३ (२) देखो पृष्ठ ७० । (३) तुरही । (४) रुचते हैं । (५) नीच ।

कुरम वाय पर सेस वाय१ है, तासु होत उदगार२ ।
दो कूँ जीत जनम जुग जोगी, अवगत खेल अपारं ॥ २ ॥
नाभि कमल में नाद समोवो, नागिन निद्रा मारो ।
दो फुंकार संखिनी जीतो, उरधै नाम बिचारो ॥ ३ ॥
हिरदै कमल सुरत का संजम, निरत कला निरस्वासा ।
सोहं सिंध सैल पद कीजै, ऐसे चढ़ो अकासा ॥ ४ ॥
कंठ कमल से हर हर बोलै, षोड़स कला उगानी ।
यह तो मध मारग सतगुरु का, पंथ बूझ ब्रह्मज्ञानी ॥ ५ ॥
त्रिकुटि मद्धे मूरत दरसै, दो दल दरपन झांहीं ।
कोट जतन कर देखा भाई, बाहर भीतर नाहीं ॥ ६ ॥
वह तो सिंध दोऊ से न्यारा, कहो कहाँ ठहराये ।
सुन्न बेसुन्न मिले नहिं भौंरा, कहाँ रहत घर पाये ॥ ७ ॥
अनहद नाद बजाओ जोगी, बिना चरन चल नगरी ।
काया कासी छाँड़ चलोगे, जाय बसो मन मधरी ॥ ८ ॥
धरती धूत अकार न पाऊँ, मेरु दंड पर मेला ।
गगन मँडल में आसन करहूँ, तो सतगुरु का चेला ॥ ९ ॥
तिल परमान ब्रह्म दरवाजा, तिस घाटी ले जाऊँ ।
चींटी के पग हस्ती बाँधूँ, अधर धार ठहराऊँ ॥ १० ॥
दखिन देस में दीपक जोऊँ, उत्तर धरूँ धियाना ।
पच्छिम देस में देवल हमारा, पूरब पंथ पयाना ॥ ११ ॥
पिंड ब्रह्मांड दोऊ से न्यारा, अगम ज्ञान गोहराऊँ ।
दास गरीब अगम गत आपै, सिधै सिंध मिलाऊँ ॥ १२ ॥
( ५ )
संतो मानो मोर सँदेसा, तातें बहुर न रहै अँदेसा ॥टेक॥
अधर गंग इक अधर सरोवर, अधर पुहुप गुलजारा ।
सूरज मुखी संख सुर सोभा, ऐसा देस हमारा ॥ १ ॥
(१) कुरम और नाग (= सेस) दो वायुओं के नाम हैं । (२) डकारना ।

१४८ गरीबदास जी की बानी
षटकोन चक्र कूँ चीन्ह पियारे, अकस१ अरस अनादं।
तुरही रूप बंकड़ा साहब, लीला अगम अगाधं ॥ २ ॥
हंस मोर के मद्ध चंद्र है, कलँगी कोटि बिराजै।
जाके ऊपर अरस गुमठ है, तीन कलस जहँ साजै ॥ ३ ॥
परानंदनी२ कामधेनु है, गोमुख गंग कहावै।
कल्प रूप साहब सरबंगी, मन बांछित फल पावै ॥ ४ ॥
सुन्न सलहली धजा फरककैं, ध्यान धरै कोई बीना।
अललपंख ज्यूँ करै पयाना, खोज न पावै मीना ॥ ५ ॥
त्रिकुटी कमल पर सेत गुमठ है, जा मध भँवर बिराजै।
दास गरीब कहै रे संतो, सब्द अनाहद बाजै ॥ ६ ॥
( ६ )
संतो निज पद अधर बिवाना, जा मूरत पर कुरबाना ॥ टेक ॥
सेत छत्र सिर मुकुट मनोहर, बना मुकैसी३ चीरा।
संख चक्र गदा पद्म बिराजै, दामन दमकै हीरा ॥ १ ॥
जरीबाफ झिलमिल झिलकंता, पीतंबर परकासा।
हाजिर नाजिर देख अरस में, अवगत चौर खवासा ॥ २ ॥
कच्छ मच्छ औ कुरम धौल से, सेस पार नहिं पाई।
बिना दस्त जहँ चौर होत है, हम देखा रे भाई ॥ ३ ॥
सत्तर खान बहत्तर उबरे, सिव ब्रह्मा से रागी।
नारद नाम कबीरा गावै, सुरत सब्द में लागी ॥ ४ ॥
राग बिहंग भंग नहिं होई, बंधा रहत समीरं।
दास गरीब बजर पट खोले, सतगुरु मिले कबीरं ॥ ५ ॥
( ७ )
बिसमिल कित से आई काजी बिसमिल कित से आई।
ताते बोलो नाम खुदाई४ ॥ टेक ॥
(१) छाया। (२) परम आनंद या रस की खान। (३) कारचोबी। (४) काजी तुमको
खुदा की सौगंध बताओ कि जिबह करने का दस्तूर कहाँ से लाये।

राग असावरी १४६
उहाँ तो लोह लुहार नहीं रे, करद१ गढ़ी किन्ह भाई ।
अहरन२ नाहि हथौड़ा नाहीं, बिन आरन३ कहँ ताई ॥ १ ॥
जाम४ भेड़ी का दूध पिवत हो, दही घिरत५ बहु खाई ।
जा कूँ फेर हलाल करत हो, लेकर करद कसाई ॥ २ ॥
गोस्त माटी६ चाम उधेरा, रूह कहाँ पहुँचाई ।
उस दरगह की खबर नहीं है, कौन हुकम से ढाई७ ॥ ३ ॥
हक हक करके मुल्ला बोलै, मसजिद बाँग सुनाई ।
तीसों रोजे खून करत हौ, खोज न पाया राई८ ॥ ४ ॥
सुअर गऊ की एकै माटी, आतम रूह इलाही ।
दास गरीब एक वह साहब, जिन यह उमत९ उपाई ॥ ५ ॥
( ८ )
दिल ही अन्दर हुजरा काजी दिल ही अन्दर हुजरा ।
कर ले उस साहब से मुजरा ॥ टेक ॥
मका मदीना दिल ही अन्दर, काबे कूँ कुरबाना ।
काहे लेट निमाज करत हो, खोजो तन अस्थाना ॥ १ ॥
सत्तर काबे देख नूर के, खोल किवारी झाँकी ।
ता पर एक गुमठ है गैबी, पन्थ डगरिया बाँकी ॥ २ ॥
हक हक करके मुल्ला बोले, काजी पढ़ै कुराना ।
जिन कूँ वह दीदार कहाँ है, काटैं गला बिराना ॥ ३ ॥
अरस कुरस१० में अलह तखत है, खालिक बिन नहिं खाली ।
वै पैगम्बर पाक पुरुष थे, साहब के अबदाली११ ॥ ४ ॥
मुहमद ने नहिं गोस्त खाया, गऊ न बिसमिल कीती ।
एक बेर कहा मनी१२ मुहम्मद, ता पर एती बीती ॥ ५ ॥
(१) छुरी । (२) निहाई । (३) भट्टी । (४) मा । (५) घी । (६) देह । (७) मारा ।
(८) राई के बराबर, रत्ती भर । (९) सृष्टि । (१०) अर्श और कुर्सी दो स्थान ब्रह्मांड के
हैं । (११) भक्त, दास । (१२) मौत, क़तल ।
२०

१५० गरीबदास जी की बानी
नबी मुहम्मद नमस्कार है, राम रसूल कहाया।
एक लाख अस्सी कूँ सौगँद, जिन नहिं करद चलाया ॥ ६ ॥
वेई मुहम्मद वेई महादेव, वेई र्बिसुन वेई ब्रह्मा।
दास गरीब दूसरा को है, देखो अपने घर माँ ॥ ७ ॥
( ६ )
कोई बाँका सूरा, लड़त बेहद मैदाना ॥ टेक ॥
नैनन की बंदूक बनी है, स्रवन बरूद समाना।
काल बली को मार गिरावो, सुरत की गोली ताना ॥ १ ॥
मन को टेर१ दया को बखतर, सुरत कटारी ठाना।
पाँच पचीस मिल टक्कर मारो, अमर लोक अस्थाना ॥ २ ॥
ईथर पाथर कभी न पूज्यो, तीरथ बर्त न माना।
सत्त सब्द में रह्यो समाई, तब मेरो मन जाना ॥ ३ ॥
जूझैगा कोई परम सूरमा, घाव लगै निर्बाना।
दास गरीब कबीर का चेला, जूँ का त्यूँ ठहराना ॥ ४ ॥
( १० )
जो कोई ना मानै ना मानै,
जाकूँ अजाजील्लै रानै२ ॥ टेक ॥
करै अचार बिचार असंभी, पूजत जड़ पाषानै।
पाती तोर चढ़ावत अँधरे, जीवत जी कूँ भानै३ ॥ १ ॥
पिंड प्रदान करै पितरों के, तीरथ जग औ दानै।
बिना बंदगी मोच्छ नहीं रे, भूल रहे सुर४ ज्ञानै ॥ २ ॥
सुकदे स्यू का तंत सुना है, भक्ति दई धिग ता ने।
सतगुरु जनक बिदेही भेंटे, पद मिल पदै समाने५ ॥ ३ ॥
अकथ कथा कुछ कही न जाई, देखत नयन सिराने६।
प्रबल बली दरियाव बिहंगम, लाय ले चोट निशाने ॥ ४ ॥
(१) टोपा, खोड़। (२) उसको शैतान गिरावै। (३) मारै। (४) देवता। (५)
शुकदेव जी ने पहिले भक्ति का निरादर किया था और ज्ञान ही को मानते थे, देखो नोट
पृष्ट ६४ और ८६। (६) शीतल हुए।

राग असावरी १५१
पंडित बेद कहै बहु बानी, काजी पढ़ै कुराने ।
सुअर गऊ को दोय बतावै, दोनों दीन दिवाने ॥ ५ ॥
एकहि मट्टी एकहि चमड़ा, एकहि बोलत प्राने ।
जिभ्या स्वादै मारत है नर, समुझत नहीं हैवाने ॥ ६ ॥
मुरगी बकरी कुकड़ी खाई, कूके बंग मुलाने ।
जैसा दरद आपने होवै, वैसा दरद बिराने ॥ ७ ॥
मन मक्का की हज्ज न कीन्ही, दिल काबा नहिं जाने ।
कैसी काजी कजा१ करत हो, खाते हौ हलवाने२ ॥ ८ ॥
जा दिन साहब लेखा माँगे, द्यो क्या ज्वाब दिवाने ।
ऐसा कुफर तरस नहिं आवै, काटै सीस खुराने ॥ ६ ॥
उस पुर सेतो महरम३ नाहीं, अनहद नाद घुरानै ।
दास गरीब दुनी४ गई दोजख, द्यावै गालि गुरानै५ ॥ १० ॥
( ११ )
अवधू पाया अति आरूढ़ं,
कोट उनंचा६ काहे नाचा तन ढूँढ़े में ढूँढ़ं ॥टेक॥
पोथी थोथी काहे ढूँढ़ो, सुन रे पंडित मूढ़ ।
लंबी जटा अटा क्यूँ बाँधै, काहे मुड़ावै मूड ॥ १ ॥
जल पाषान तरा नहि कोई, सूवा सेम्हर डूँड़ं७ ।
वह नग हीरा परखा नाहीं, क्यूँ खोजत हौ जूड़ं ॥ २ ॥
जल मृग त्रिसना सृष्टि भुलानी, भूल रहा जग भूड़ं ।
नाम अभय पद निःचै निपजै, बीज परे ज्यूँ खूड़ं८ ॥ ३ ॥
बिन आकार अपार पुरुष है, बाल बृद्ध नहिं बूढ़ं ।
दास गरीब अचल अबिनासी, अवगत मंतर गूढ़ ॥ ४ ॥
(१) पाँचो वक्त की नमाज पढ़ना। (२) बकरी का बच्चा। (३) भेदी। (४) दुनिया।
(५) गाली गलौज। (६) उनचास। (७) डौंडी। (८) हराई, रिघाई।

१५२ गरीबदास जी की बानी
( १२ )
संतो मन की माला फेरो,
यह मन बाहर जात हेरो ॥ टेक ॥
तीन लोक औ भवन चतुर्दस, एक पलक फिर आवै।
बिनहीं पंखों उड़ै पखेरू, याका खोज न पावै ॥ १ ॥
तत की तसबी१ सुरत सुमिरनी, दृढ़ के धागे पोई।
हर दम नाम निरंजन साहब, यह सुमिरन कर लोई ॥ २ ॥
किलियं ओञ्र्यं हिरियं सिरियं, सोहं सुरत लगावै।
पंच नाम गायत्री गैबी, आतम तत्त जगावै ॥ ३ ॥
ररंकार उच्चार अनाहद, रोम रोम रस तालं।
कर की माला कौन काम जब, आतम राम अबदालं२ ॥ ४ ॥
सुरग पताल सृष्टि में डोलै, सर्व लोक सैलानी।
यह मन भैरो भूत बितालं, यह मन अलख बिनानी ॥ ५ ॥
यह मन ब्रह्मा बिसुन महेसं, इन्दर बरुन कुबेरं।
मनही धर्मराय है भाई, सकल दूत जम जेरं३ ॥ ६ ॥
मनही सनक सनन्दन बाला, गौरज और गनेसा।
मनही कच्छ मच्छ कूरंभा, धौल धरन अरु सेसा ॥ ७ ॥
मनही गोरख दत्त दिगंबर, नारद सुकदे व्यासा।
मनही बलि बावन है आया, मन का अजब तमासा ॥ ८ ॥
मनही ध्रू प्रहलाद अभीखन, मन का सकल पसारा।
मनही हरि हीरा हिरनाकुस, मन नरसिंघ औतारा ॥ ६ ॥
मन सुग्रीव बालि बल अंगद, रावन राम रँगीला।
मनही नौ औतार धरत है, मन की अवगत लीला ॥१०॥
मनही लछमन हनूमान है, मनही चेरी सीता।
मनही चारो बेद बिद्या सब, मन भागवत औ गीता ॥११॥
(१) माला। (२) भक्त । (३) परास्त करना ।

राग असावरी १५३
मनही परसराम परसोतम, छत्री किये निछत्री१।
मनही कपिल देव देहूती२, मनही अद्या अत्री ॥१२॥
मनही चंद सूर तारागन, मनही पानी पौना ।
मनही लख चौरासी डोले, मनही का सब गौना ॥१३॥
मन तेंतीसो कोट देवता, मनही सहस अठासी ।
मनही थावर जंगम जोनी, मनही सिध चौरासी ॥१४॥
मनही कीट पतंग भुवंगा, मन जोनी जगदीसं ।
मन के ऊपर निज मन साहब, ताहि नवाऊँ सीसं ॥१५॥
निज मन सेती यह मन हूआ, घर आया अनँत सरीरं ।
दास गरीब अभय अबिनासी, ता मिल रहे कबीरं ॥१६॥
( १३ )
पार किनहुँ नहिं पाये संतो, पार किनहुँ नर्हि पाये ।
जुग छत्तीस रीत नहि जानी, ब्रह्मा कमल भुलाये ॥टेक॥
चार अंड ब्रह्मांड रचाने, कूरम धौल धराये ।
कच्छ मच्छ सेसा नारायन, सहस मुखी पद गाये ॥ १ ॥
चार बेद अस्तुती करत है, ज्ञान अगम गोहराये ।
अकथ कथा अच्छर निःअच्छर, पुस्तक लिखा न जाये ॥ २ ॥
सुरत निरत से अगम अगोचर, मन बुध रहे थकाये ।
ज्ञान ध्यान से अधिक परे रा, क्या गाऊँ रामराये ॥ ३ ॥
नारद मुनी गुनी महमंता, नर से नारि बनाये३।
एक पलक परपूरन साहब, पूत बहत्तर जाये३ ॥ ४ ॥
नौ लख बोरी कासी आई, दास कबीर बढ़ाये४ ।
दास गरीब अगम अनुरागी, पद मिल पदै समाये ॥ ५ ॥
( १४ )
अबधू लेत न मन का लाहा५, चीन्हो ज्ञान अगाहा६ ॥टेक॥
(१) नाश। (२) कपिल देव की माता का नाम । (३) देखो नोट पृष्ठ ६०-६२।
(४) देखो नोट पृष्ठ २६। (५) लाभ (६) गूढ़ ।