गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 148, कुल 186 में से
संदर्भ में पढ़ें१३८ गरीबदास जी की बानी
या बँगले में साहब बैठा, सब्द करै अनुरागा ॥ १ ॥
संख सरसुती बहैं अगोचर१, गुपती गोप गियाना२।
बँगले की पारस की पैंड़ी, पाया पद निरवाना ॥ २ ॥
या बँगले में सेत गुमठ३ है, ता मध अलख गुसाँई ।
सेत छत्र सिर मुकुट बिराजै, दरसा नैनों माहीं ॥ ३ ॥
निरबानी परवानी पद है, रूप बरन सूँ न्यारा।
बँगले में से उड़ै बिहंगम, खेलै अधर अधारा ॥ ४ ॥
अधर अधार अपार पुरुष है, दृष्ट मुष्ट नहि आवै।
सूक्ष्म रूप सरूप जान के, सेस सहस मुख गावै ॥ ५ ॥
उड़े बिहंगम अकल तरंगम, जाके मोह न माया।
सतगुरु भेदी भेद कहत हैं, हम दिब दृष्ट लखाया ॥ ६ ॥
जोजन संख पलक में पहुँचै, बिनही चरनों धावै।
अगमी डोर सुरत से खैंचै, फिर बँगले में आवै ॥ ७ ॥
सुरत सुहंगम मूल बिहंगम, ज्ञान ध्यान से ऊँचा।
घट मठ महतत४ सेती न्यारा, कहा घाट बँध कूचा ॥ ८ ॥
पिंड ब्रह्मांड से न्यारी जोती, बिन ही पेंगन झूलै।
गरीबदास धिरकार जनम कूँ, जो इस पद कूँ भूलै ॥ ६ ॥
( ८ )
बँगला खूब बना दरहाल, जामें रतन अमोले लाल ॥ टेक॥
जल की बूँद महल मठ कीन्हा, नख सिख साज बनाया।
या बँगले में गैबी खेलै, ना मूवा ना जाया ॥ १ ॥
या बँगले के चौसठ खंभा, पाँच पदारथ लागे।
तीन गुनन की गलियाँ माहीं, कोइ सूते कोइ जागे ॥ २ ॥
कोट उनंचा५ पवन गुँजारैं, नौ नाड़ी से नेहा।
धाम बहत्तर धारा नगरी, जासे लगा सनेहा ॥ ३ ॥
(१) इंद्रियों की पहुँच के परे। (२) ज्ञान। (३) गुम्बज़ । (४) महातत्व । (५) उनचास ।