गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 155, कुल 186 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ राग असावरी ॥
मन तू चल रे सुख के सागर, जहाँ सब्द सिंध रतनागर ॥टेक॥
कोट जनम जुग भरमत होगये, कछू न हाथ लगा रे ।
कूकर सूकर खर भया बौरे, कौवा हंस बिगारे ॥ १ ॥
कोट जनम जुग राजा कीन्हा, मिटी न मन की आसा ।
बिच्छुक होकर दर दर हाँडा१, मिला न निरगुन रासा ॥ २ ॥
इन्द्र कुबेर ईस की पदवी, ब्रह्मा बरुन धर्मराया ।
बिस्वनाथ के पुर कूँ पहुँचा, बहुर अपूठा२ आया ॥ ३ ॥
संख जनम जुग मरते हो गये, जीवत क्यूँ न मरै रे ।
द्वादस मद्ध महल मठ बौरे, बहुर न देह धरै रे ॥ ४ ॥
दोजख भिस्त सबै तैं देखे, राज पाट के रसिया ।
तिरलोकी से तिरपत नाहीं, यह मन भोगी खसिया३ ॥ ५ ॥
सतगुरु मिलै तो इच्छा मेटै, पद मिल पदहिं समाना ।
चल हंसा उपदेस पठाऊँ, जहँ आद अमर अस्थाना ॥ ६ ॥
चार मुक्ति जहँ चंपी करिहैं, माया हो रहि दासी ।
दास गरीब अभय पद पर से, मिले राम अबिनासी ॥ ७ ॥
( २ )
मन तूँ सुख के सागर बस रे, और न ऐसा जस रे ॥टेक॥
सब सोने की लंका होती, रावन से रन धीरं ।
एक पलक में राज बिराजी, जम के पड़े जँजीरं ॥ १ ॥
दुर्योधन से राजा होते, संग इकोतर४ भाई ।
ग्यारह छोहनि संग चलै थी, देह गीध ने खाई ॥ २ ॥
साठ हजार सुभट५ के होते, कपिल मुनीस्वर खाये६ ।
एकै पुत्र उत्तानपात के७, परमातम पद पाये ॥ ३ ॥
(१) भरमा । (२) उलटा । (३) हिजड़ा । (४) एक सौ एक । (५) जोधा । (६) देखो
नोट पृष्ठ ८५ । (७) देखो ध्रुव की कथा नोट पृष्ट २७ ।