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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

पृष्ठ 160, कुल 186 में से

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पृष्ठ 160

१५० गरीबदास जी की बानी
नबी मुहम्मद नमस्कार है, राम रसूल कहाया।
एक लाख अस्सी कूँ सौगँद, जिन नहिं करद चलाया ॥ ६ ॥
वेई मुहम्मद वेई महादेव, वेई र्बिसुन वेई ब्रह्मा।
दास गरीब दूसरा को है, देखो अपने घर माँ ॥ ७ ॥
( ६ )
कोई बाँका सूरा, लड़त बेहद मैदाना ॥ टेक ॥
नैनन की बंदूक बनी है, स्रवन बरूद समाना।
काल बली को मार गिरावो, सुरत की गोली ताना ॥ १ ॥
मन को टेर१ दया को बखतर, सुरत कटारी ठाना।
पाँच पचीस मिल टक्कर मारो, अमर लोक अस्थाना ॥ २ ॥
ईथर पाथर कभी न पूज्यो, तीरथ बर्त न माना।
सत्त सब्द में रह्यो समाई, तब मेरो मन जाना ॥ ३ ॥
जूझैगा कोई परम सूरमा, घाव लगै निर्बाना।
दास गरीब कबीर का चेला, जूँ का त्यूँ ठहराना ॥ ४ ॥
( १० )
जो कोई ना मानै ना मानै,
जाकूँ अजाजील्लै रानै२ ॥ टेक ॥
करै अचार बिचार असंभी, पूजत जड़ पाषानै।
पाती तोर चढ़ावत अँधरे, जीवत जी कूँ भानै३ ॥ १ ॥
पिंड प्रदान करै पितरों के, तीरथ जग औ दानै।
बिना बंदगी मोच्छ नहीं रे, भूल रहे सुर४ ज्ञानै ॥ २ ॥
सुकदे स्यू का तंत सुना है, भक्ति दई धिग ता ने।
सतगुरु जनक बिदेही भेंटे, पद मिल पदै समाने५ ॥ ३ ॥
अकथ कथा कुछ कही न जाई, देखत नयन सिराने६।
प्रबल बली दरियाव बिहंगम, लाय ले चोट निशाने ॥ ४ ॥
(१) टोपा, खोड़। (२) उसको शैतान गिरावै। (३) मारै। (४) देवता। (५)
शुकदेव जी ने पहिले भक्ति का निरादर किया था और ज्ञान ही को मानते थे, देखो नोट
पृष्ट ६४ और ८६। (६) शीतल हुए।