गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराग बँगला १३५
दिल अंदर दीदार होत है, बाहर भीतर सोई।
तिरबेनी असनान कीजिये, मल मुत्तर सब धोई ॥ १ ॥
बँगले आगे संख फुहारा, फूटैं सहसर१ धारा।
दिब्य दृष्ट तो देखत है सो, हर दम बारम्बारा ॥ २ ॥
गंगा जमुना मद्ध सुरसती, पट्टन घाट फुहारा।
कालिन्द्री काया परछाली२, धन बड़ भाग हमारा ॥ ३ ॥
इंदरदौन३ महोधध३ बाजै, रतनागर४ लहराई।
जगन्नाथ जगदीश बिराजै, देखो क्यूँ ना भाई ॥ ४ ॥
हरद्वार हरि पैड़ी न्हाये, बद्रीनाथ बिलासा।
द्वारावती५ दरस नित होई, कर बृन्दावन बासा ॥ ५ ॥
लोहागिर३ पुष्कर३ पद परसे, गया३ पिंड परधाना।
अठसठ तीरथ हैं तन माहीं, मोच्छ मुक्त भये प्राना ॥ ६ ॥
कासी औ कांती६ काया में, मोच्छ दायका माया।
अकल अजोध्या आदि अनादं, सप्त पुरी दरसाया ॥ ७ ॥
अवन्तिकापुरी६ अरथ के माहीं, सुरत निरत से जानी।
गरीबदास साहब का बँगला, अजर अमर परवानी ॥ ८ ॥
( ४ )
बँगला खूब बना प्राचीन, जा में अरस७ कला दुरबीन ॥टेक॥
बँगले आगे ज्योढ़ी लागी, पलकों दी चिक बंधा।
छानबे कोटी मेघ माल८ है, सब्द सिंध गरजंदा ॥ १ ॥
बँगले आगे नग सरवर९ है, तेंतिस कोट तपंता१०।
सहस अठासी मुनिन्दर बैठे, सोहं जाप जपंता ॥ २ ॥
बँगले आगे बाट११ बिहंगम, दो दर हैं भितरी के।
(१) हजार । (२) धोई । (३) तीर्थों के नाम । (४) समुद्र जिसमें मोती पैदा होता
है । (५) द्वारिका । (६) तीर्थों के नाम । (७) सहसदलकँवल । (८) बादलों का समूह ।
(९) रत्न का सागर । (१०) जहाँ तेंतीस कोट देवता तपस्या करते हैं। (११) रास्ता ।