गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराग असावरी १४६
उहाँ तो लोह लुहार नहीं रे, करद१ गढ़ी किन्ह भाई ।
अहरन२ नाहि हथौड़ा नाहीं, बिन आरन३ कहँ ताई ॥ १ ॥
जाम४ भेड़ी का दूध पिवत हो, दही घिरत५ बहु खाई ।
जा कूँ फेर हलाल करत हो, लेकर करद कसाई ॥ २ ॥
गोस्त माटी६ चाम उधेरा, रूह कहाँ पहुँचाई ।
उस दरगह की खबर नहीं है, कौन हुकम से ढाई७ ॥ ३ ॥
हक हक करके मुल्ला बोलै, मसजिद बाँग सुनाई ।
तीसों रोजे खून करत हौ, खोज न पाया राई८ ॥ ४ ॥
सुअर गऊ की एकै माटी, आतम रूह इलाही ।
दास गरीब एक वह साहब, जिन यह उमत९ उपाई ॥ ५ ॥
( ८ )
दिल ही अन्दर हुजरा काजी दिल ही अन्दर हुजरा ।
कर ले उस साहब से मुजरा ॥ टेक ॥
मका मदीना दिल ही अन्दर, काबे कूँ कुरबाना ।
काहे लेट निमाज करत हो, खोजो तन अस्थाना ॥ १ ॥
सत्तर काबे देख नूर के, खोल किवारी झाँकी ।
ता पर एक गुमठ है गैबी, पन्थ डगरिया बाँकी ॥ २ ॥
हक हक करके मुल्ला बोले, काजी पढ़ै कुराना ।
जिन कूँ वह दीदार कहाँ है, काटैं गला बिराना ॥ ३ ॥
अरस कुरस१० में अलह तखत है, खालिक बिन नहिं खाली ।
वै पैगम्बर पाक पुरुष थे, साहब के अबदाली११ ॥ ४ ॥
मुहमद ने नहिं गोस्त खाया, गऊ न बिसमिल कीती ।
एक बेर कहा मनी१२ मुहम्मद, ता पर एती बीती ॥ ५ ॥
(१) छुरी । (२) निहाई । (३) भट्टी । (४) मा । (५) घी । (६) देह । (७) मारा ।
(८) राई के बराबर, रत्ती भर । (९) सृष्टि । (१०) अर्श और कुर्सी दो स्थान ब्रह्मांड के
हैं । (११) भक्त, दास । (१२) मौत, क़तल ।
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