गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 158, कुल 186 में से
संदर्भ में पढ़ें१४८ गरीबदास जी की बानी
षटकोन चक्र कूँ चीन्ह पियारे, अकस१ अरस अनादं।
तुरही रूप बंकड़ा साहब, लीला अगम अगाधं ॥ २ ॥
हंस मोर के मद्ध चंद्र है, कलँगी कोटि बिराजै।
जाके ऊपर अरस गुमठ है, तीन कलस जहँ साजै ॥ ३ ॥
परानंदनी२ कामधेनु है, गोमुख गंग कहावै।
कल्प रूप साहब सरबंगी, मन बांछित फल पावै ॥ ४ ॥
सुन्न सलहली धजा फरककैं, ध्यान धरै कोई बीना।
अललपंख ज्यूँ करै पयाना, खोज न पावै मीना ॥ ५ ॥
त्रिकुटी कमल पर सेत गुमठ है, जा मध भँवर बिराजै।
दास गरीब कहै रे संतो, सब्द अनाहद बाजै ॥ ६ ॥
( ६ )
संतो निज पद अधर बिवाना, जा मूरत पर कुरबाना ॥ टेक ॥
सेत छत्र सिर मुकुट मनोहर, बना मुकैसी३ चीरा।
संख चक्र गदा पद्म बिराजै, दामन दमकै हीरा ॥ १ ॥
जरीबाफ झिलमिल झिलकंता, पीतंबर परकासा।
हाजिर नाजिर देख अरस में, अवगत चौर खवासा ॥ २ ॥
कच्छ मच्छ औ कुरम धौल से, सेस पार नहिं पाई।
बिना दस्त जहँ चौर होत है, हम देखा रे भाई ॥ ३ ॥
सत्तर खान बहत्तर उबरे, सिव ब्रह्मा से रागी।
नारद नाम कबीरा गावै, सुरत सब्द में लागी ॥ ४ ॥
राग बिहंग भंग नहिं होई, बंधा रहत समीरं।
दास गरीब बजर पट खोले, सतगुरु मिले कबीरं ॥ ५ ॥
( ७ )
बिसमिल कित से आई काजी बिसमिल कित से आई।
ताते बोलो नाम खुदाई४ ॥ टेक ॥
(१) छाया। (२) परम आनंद या रस की खान। (३) कारचोबी। (४) काजी तुमको
खुदा की सौगंध बताओ कि जिबह करने का दस्तूर कहाँ से लाये।