गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 157, कुल 186 में से
संदर्भ में पढ़ेंकुरम वाय पर सेस वाय१ है, तासु होत उदगार२ ।
दो कूँ जीत जनम जुग जोगी, अवगत खेल अपारं ॥ २ ॥
नाभि कमल में नाद समोवो, नागिन निद्रा मारो ।
दो फुंकार संखिनी जीतो, उरधै नाम बिचारो ॥ ३ ॥
हिरदै कमल सुरत का संजम, निरत कला निरस्वासा ।
सोहं सिंध सैल पद कीजै, ऐसे चढ़ो अकासा ॥ ४ ॥
कंठ कमल से हर हर बोलै, षोड़स कला उगानी ।
यह तो मध मारग सतगुरु का, पंथ बूझ ब्रह्मज्ञानी ॥ ५ ॥
त्रिकुटि मद्धे मूरत दरसै, दो दल दरपन झांहीं ।
कोट जतन कर देखा भाई, बाहर भीतर नाहीं ॥ ६ ॥
वह तो सिंध दोऊ से न्यारा, कहो कहाँ ठहराये ।
सुन्न बेसुन्न मिले नहिं भौंरा, कहाँ रहत घर पाये ॥ ७ ॥
अनहद नाद बजाओ जोगी, बिना चरन चल नगरी ।
काया कासी छाँड़ चलोगे, जाय बसो मन मधरी ॥ ८ ॥
धरती धूत अकार न पाऊँ, मेरु दंड पर मेला ।
गगन मँडल में आसन करहूँ, तो सतगुरु का चेला ॥ ९ ॥
तिल परमान ब्रह्म दरवाजा, तिस घाटी ले जाऊँ ।
चींटी के पग हस्ती बाँधूँ, अधर धार ठहराऊँ ॥ १० ॥
दखिन देस में दीपक जोऊँ, उत्तर धरूँ धियाना ।
पच्छिम देस में देवल हमारा, पूरब पंथ पयाना ॥ ११ ॥
पिंड ब्रह्मांड दोऊ से न्यारा, अगम ज्ञान गोहराऊँ ।
दास गरीब अगम गत आपै, सिधै सिंध मिलाऊँ ॥ १२ ॥
( ५ )
संतो मानो मोर सँदेसा, तातें बहुर न रहै अँदेसा ॥टेक॥
अधर गंग इक अधर सरोवर, अधर पुहुप गुलजारा ।
सूरज मुखी संख सुर सोभा, ऐसा देस हमारा ॥ १ ॥
(१) कुरम और नाग (= सेस) दो वायुओं के नाम हैं । (२) डकारना ।