गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 147, कुल 186 में से
संदर्भ में पढ़ेंराग बँगला १३७
कोट कोट दामिन दमकाहीं, गरजै सिंध समूचा।
सीलवंत सैलानी जोगी, मिलै काछ का सूचा१ ॥ ७ ॥
संखौं पदम झिलमिलै जोती, अगम पंथ बैराटा।
गरीबदास सतगुरु के सारै२, उतरै औघट घाटा ॥ ८ ॥
(६)
बँगला अजब बना है खूब, जामें पार ब्रह्म महबूब ॥टेक॥
आगे नौलख पातुर नाचैं, ब्रह्मानंद रिझावैं।
तेज पुंज की सुंदर नारी, अनहद मंगल गावैं ॥ १ ॥
पीतंबर फहरात तासु कै, सूहे३ बस्तर साजैं।
एक कान्ह औ नौलख गोपी, बँगले माहिं बिराजैं ॥ २ ॥
चंद सूर दो अधर चिरागा, हुकमी पौन औ पानी।
सकल संत औ सकल साहबी, बङ्गले माहिं बिनानी ॥ ३ ॥
पाँचो तत्त खवास खड़े हैं, हाजिर नाजिर जाके।
तिरलोकी का राज रसातल, क्या कोड़ी धज लाखै४ ॥ ४ ॥
सब रतनन का रतन नाम है, नाम रतन कूँ जानै।
इन्द्र का राज काग की बिष्टा, जासे उलटा तानै ॥ ५ ॥
हीरा मोती जबाहिर ताईं, पारस पल्ले न बाँधै।
सब्द सिध चिंतामन साहब, सुरत गगन कूँ साधै ॥ ६ ॥
चिंतामन पारस परमेसर, हिरदे माहिं बिराजै।
गरीबदास ताही कूँ सेवै, जाका अविचल राजै ॥ ७ ॥
(७)
बँगला खूब बना है ऐन५।
जामें कलबिरछा६ काम धैन ॥ टेक ॥
गंगा कोट त्रिवेनी संगम, कासी गया प्रयागा।
(१) लँ गोट का पक्का। (२) सहायता से, सहारे। (३) लाल। (४) पारब्रह्म की शोभा
के आगे तीन लोक का राज जहन्नुम के बराबर और करोड़ों की सम्पत गई है। कोड़ी-
धज = कोटिध्वज (देखो नोट पृष्ठ ७७)। (५) सुन्दर। (६) कल्पवृक्ष।