गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३६ गरीबदास जी की बानी
ब्रह्म रंध्र१ का घाट जहाँ है, साधू चढ़ै सु देखे ॥ ३ ॥
बँगले आगे नटवा२ नाचै, ताहि लखै नहि कोई ।
पड़ै गगन से धरती ऊपर, खंड बिहंड न होई ॥ ४ ॥
बँगले भीतर रतन अमोली, सेत पीत नहिं जरदा ।
बिनहीं चरनों चलै चिदानंद, चसमों आगे फिरदा ॥ ५ ॥
रिग जजु साम अथर्वन चारो, बँगले माहिं बिराजैं ।
सुखम३ बेद से तारी लागी, अनहद नौबत बाजैं ॥ ६ ॥
आसन पदम लगाय रहा है, हाथ कमंडल डंडा ।
ब्रह्मा आदि अनादं बैठे, चार बेद धुन खंडा ॥ ७ ॥
सुखम बेद से सुरत लगावै, सो सुरती महँ अंगा ।
गरीबदास बाहर क्यूँ भरमै, घटही अंदर गङ्गो ॥ ८ ॥
( ५ )
बँगला खूब बना है बेस४, यामें ररङ्कार धुन सेस ॥टेक॥
रोम रोम में नाम चलत है, अजपा तारा लागी ।
सुरत निरत पर अनहद बाजै, सुनते हैं अनुरागी ॥ १ ॥
मूल चक्र का घाट बाँध कर, सुखमन पवन अरोधै ।
परथम आदि गनेस मनावै, नाभि कमल कूँ सोधै ॥ २ ॥
बङ्क नाल का घाट बिकट है, जहाँ खेचरी लावै ।
अमी महारस अमृत पीवै, अजर अमर हो जावै ॥ ३ ॥
दहिने गङ्गा बायें जमुना, मद्ध सुरसती धारा ।
उलटा मीन चढ़ै सरवर में, ऐसा खेल हमारा ॥ ४ ॥
हाथ न पैर पिंड नहि प्राना, सुन सरवर में खेलै ।
बाँस बल्ली नौका नहिं लागै, (तौ) कैसे भौंरा पेलै ॥ ५ ॥
दूरबीन ऐनक अनुसरी, पवन पिंड भर गोला ।
सुरत निरत की सुरङ्ग लगावै, दरसै रतन अमोला ॥ ६ ॥
(१) शिवनेत्र, तीसरा तिल । (२) मन । (३) सूक्ष्म । (४) उत्तम ।