गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 163, कुल 186 में से
संदर्भ में पढ़ेंराग असावरी १५३
मनही परसराम परसोतम, छत्री किये निछत्री१।
मनही कपिल देव देहूती२, मनही अद्या अत्री ॥१२॥
मनही चंद सूर तारागन, मनही पानी पौना ।
मनही लख चौरासी डोले, मनही का सब गौना ॥१३॥
मन तेंतीसो कोट देवता, मनही सहस अठासी ।
मनही थावर जंगम जोनी, मनही सिध चौरासी ॥१४॥
मनही कीट पतंग भुवंगा, मन जोनी जगदीसं ।
मन के ऊपर निज मन साहब, ताहि नवाऊँ सीसं ॥१५॥
निज मन सेती यह मन हूआ, घर आया अनँत सरीरं ।
दास गरीब अभय अबिनासी, ता मिल रहे कबीरं ॥१६॥
( १३ )
पार किनहुँ नहिं पाये संतो, पार किनहुँ नर्हि पाये ।
जुग छत्तीस रीत नहि जानी, ब्रह्मा कमल भुलाये ॥टेक॥
चार अंड ब्रह्मांड रचाने, कूरम धौल धराये ।
कच्छ मच्छ सेसा नारायन, सहस मुखी पद गाये ॥ १ ॥
चार बेद अस्तुती करत है, ज्ञान अगम गोहराये ।
अकथ कथा अच्छर निःअच्छर, पुस्तक लिखा न जाये ॥ २ ॥
सुरत निरत से अगम अगोचर, मन बुध रहे थकाये ।
ज्ञान ध्यान से अधिक परे रा, क्या गाऊँ रामराये ॥ ३ ॥
नारद मुनी गुनी महमंता, नर से नारि बनाये३।
एक पलक परपूरन साहब, पूत बहत्तर जाये३ ॥ ४ ॥
नौ लख बोरी कासी आई, दास कबीर बढ़ाये४ ।
दास गरीब अगम अनुरागी, पद मिल पदै समाये ॥ ५ ॥
( १४ )
अबधू लेत न मन का लाहा५, चीन्हो ज्ञान अगाहा६ ॥टेक॥
(१) नाश। (२) कपिल देव की माता का नाम । (३) देखो नोट पृष्ठ ६०-६२।
(४) देखो नोट पृष्ठ २६। (५) लाभ (६) गूढ़ ।