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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

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पृष्ठ 149

राग बँगला १३६
चौथे पद से महरम नाहीं, तीन गुनन में धोका ।
चौथा पद चितामन साहब, सौदा रोकम रोका१ ॥ ४ ॥
आलस नींद जम्हाई जोरा, कर्म नास होई ।
सील संतोष बिबेक न चीन्हा, जनम अकारथ खोई ॥ ५ ॥
आसा त्रिस्ना बनी दुलहिनी, मनसा नारी सोई ।
बँगले के दरवाजे बैठी, देख सहेली दोई ॥ ६ ॥
दूती दोइ दलों बिच खेलै, मोहे सुर नर सारे ।
गन गंधर्प औ ज्ञानी ध्यानी, बँगले माहि पछारे२ ॥ ७ ॥
काम क्रोध औ लोभ मोह की, मदिरा प्याई भारी ।
गरीबदास सतगुरु सौदागर, भौसागर से पारी ॥ ८ ॥
( ६ )
बँगला खूब किया बकसीस, साहब पारब्रह्म जगदीस ॥टेक॥
या बँगले की चीन्ह परी है, बाँधा नौ दस मासा ।
पैसा एक न मेहनत माँगे, धन दासन पति दासा ॥ १ ॥
लख चौरासी बँगले छावै, न्यारी न्यारी भाँती ।
साच्छीभूत सकल सँग खेलै, कीड़ी कुंजर हाथी ॥ २ ॥
या बँगले का तोल न मोलं, संख पदम झनकाईं ।
या बँगले कूँ राख न सक्कैं, सेस महेसर ताई ॥ ३ ॥
हीरे मोती झालर लागे, और लालन की पाँती ।
या बँगले कूँ छाँड़ चलेंगे, ना कोई संग ना साथी ॥ ४ ॥
चंद सूर दो कलस बिराजैं, मध इक अजब फुहारा ।
झलकै जोती बरषै मोती, जानै जाननहारा ॥ ५ ॥
काम धेनु अरु कल्प बृच्छ हैं, ये दो बँगले माहीं ।
अठ सिध नौ निध परम पदारथ, अवगत अलख गुसाँई ॥ ६ ॥
या बँगले में बाघ बसत है, हंसा लेत गिरासी ।
(१) नकद, खरा । (२) गिरा दिया ।