गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४० गरीबदास जी की बानी
पकरै बाघ राग कूँ चीन्है, ताहि मिलै अबिनासी ॥ ७ ॥
पकरा बाघ कबीर पुरुष ने, जड़िया तौक जँजीरं ।
जाका बँगला अजर अमर है, धन पीरन सिर पीरं ॥ ८ ॥
संख कलप जुग परलै जाहीं, बँगला डिगै न डोलै ।
गरीबदास सतगुरु का बँगला, ना कुछ तोल न मोलै ॥ ६ ॥
( १० )
काया खोज ले रे, तो में रहता पुरुष अलेख ।
बिभिचारिन का स्वाँग छाँड़ दे, क्या दिखलावै भेख ॥टेक॥
मुक्ताहल की पैंठ लगी है, चौपड़ के बाजार ।
ब्रह्म सहर बेगम पुर चलिये, अवगत नगर अपार ॥ १ ॥
अष्ट कमल दल भींजन लागे, बरषत अमृत नीर ।
सोहं हंसा किया पयान, मानसरोवर तीर ॥ २ ॥
बिन बादल बिन बिजली चमकै, बूटै१ सुन्न फुहार ।
संख कला झलकंती जोती, गगन मँडल गुलजार ॥ ३ ॥
इस काया में नीझर झरते, औंडे२ दरिया कूप ।
सीसी३ संख४ फिरैं सुर पीवैं, प्याले अजब अनूप ॥ ४ ॥
इस काया में रास मंडल है, बाजैं अनहद तूर ।
सोहं हंसा सिंध मिले हैं, झिलमिल नूर जहूर