गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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( १२ )
संतो मन की माला फेरो,
यह मन बाहर जात हेरो ॥ टेक ॥
तीन लोक औ भवन चतुर्दस, एक पलक फिर आवै।
बिनहीं पंखों उड़ै पखेरू, याका खोज न पावै ॥ १ ॥
तत की तसबी१ सुरत सुमिरनी, दृढ़ के धागे पोई।
हर दम नाम निरंजन साहब, यह सुमिरन कर लोई ॥ २ ॥
किलियं ओञ्र्यं हिरियं सिरियं, सोहं सुरत लगावै।
पंच नाम गायत्री गैबी, आतम तत्त जगावै ॥ ३ ॥
ररंकार उच्चार अनाहद, रोम रोम रस तालं।
कर की माला कौन काम जब, आतम राम अबदालं२ ॥ ४ ॥
सुरग पताल सृष्टि में डोलै, सर्व लोक सैलानी।
यह मन भैरो भूत बितालं, यह मन अलख बिनानी ॥ ५ ॥
यह मन ब्रह्मा बिसुन महेसं, इन्दर बरुन कुबेरं।
मनही धर्मराय है भाई, सकल दूत जम जेरं३ ॥ ६ ॥
मनही सनक सनन्दन बाला, गौरज और गनेसा।
मनही कच्छ मच्छ कूरंभा, धौल धरन अरु सेसा ॥ ७ ॥
मनही गोरख दत्त दिगंबर, नारद सुकदे व्यासा।
मनही बलि बावन है आया, मन का अजब तमासा ॥ ८ ॥
मनही ध्रू प्रहलाद अभीखन, मन का सकल पसारा।
मनही हरि हीरा हिरनाकुस, मन नरसिंघ औतारा ॥ ६ ॥
मन सुग्रीव बालि बल अंगद, रावन राम रँगीला।
मनही नौ औतार धरत है, मन की अवगत लीला ॥१०॥
मनही लछमन हनूमान है, मनही चेरी सीता।
मनही चारो बेद बिद्या सब, मन भागवत औ गीता ॥११॥
(१) माला। (२) भक्त । (३) परास्त करना ।