गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराग असावरी १५१
पंडित बेद कहै बहु बानी, काजी पढ़ै कुराने ।
सुअर गऊ को दोय बतावै, दोनों दीन दिवाने ॥ ५ ॥
एकहि मट्टी एकहि चमड़ा, एकहि बोलत प्राने ।
जिभ्या स्वादै मारत है नर, समुझत नहीं हैवाने ॥ ६ ॥
मुरगी बकरी कुकड़ी खाई, कूके बंग मुलाने ।
जैसा दरद आपने होवै, वैसा दरद बिराने ॥ ७ ॥
मन मक्का की हज्ज न कीन्ही, दिल काबा नहिं जाने ।
कैसी काजी कजा१ करत हो, खाते हौ हलवाने२ ॥ ८ ॥
जा दिन साहब लेखा माँगे, द्यो क्या ज्वाब दिवाने ।
ऐसा कुफर तरस नहिं आवै, काटै सीस खुराने ॥ ६ ॥
उस पुर सेतो महरम३ नाहीं, अनहद नाद घुरानै ।
दास गरीब दुनी४ गई दोजख, द्यावै गालि गुरानै५ ॥ १० ॥
( ११ )
अवधू पाया अति आरूढ़ं,
कोट उनंचा६ काहे नाचा तन ढूँढ़े में ढूँढ़ं ॥टेक॥
पोथी थोथी काहे ढूँढ़ो, सुन रे पंडित मूढ़ ।
लंबी जटा अटा क्यूँ बाँधै, काहे मुड़ावै मूड ॥ १ ॥
जल पाषान तरा नहि कोई, सूवा सेम्हर डूँड़ं७ ।
वह नग हीरा परखा नाहीं, क्यूँ खोजत हौ जूड़ं ॥ २ ॥
जल मृग त्रिसना सृष्टि भुलानी, भूल रहा जग भूड़ं ।
नाम अभय पद निःचै निपजै, बीज परे ज्यूँ खूड़ं८ ॥ ३ ॥
बिन आकार अपार पुरुष है, बाल बृद्ध नहिं बूढ़ं ।
दास गरीब अचल अबिनासी, अवगत मंतर गूढ़ ॥ ४ ॥
(१) पाँचो वक्त की नमाज पढ़ना। (२) बकरी का बच्चा। (३) भेदी। (४) दुनिया।
(५) गाली गलौज। (६) उनचास। (७) डौंडी। (८) हराई, रिघाई।