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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

११४ गरीबदास जी की बानी
जिकर फिकर फरियाद कर ले, अंदरूनी अरस वे ।
हाली मवाली १ याद कीजे, ना सरे में तरस वे ॥ २ ॥
रसना रँगीली राम जप ले, अलख कादिर आप वे ।
पीराँ फकीराँ परस ले, पूजो सनेही साध वे ॥ ३ ॥
दरगह मिटै जो डंड तेरा, नेकी निरंतर राख वे ।
नापैद से पैदा किया, तूँ नाम बिन नापाक वे ॥ ४ ॥
दिल सफा कर सैलान कीजै, बंक मारग बाट वे ।
इला पिंगला सुषमना, तूँ उतर औघट घाट वे ॥ ५ ॥
बंक नाल बिसाल बहना, है अमी रस अरस वे ।
रसना बिहूना २ राग गावे, बिना चसमों दरस वे ॥ ६ ॥
प्याला अमी रस पीजिये, खुलिहै बजर कपाट वे ।
अरस कुरस अबंध अवगत, कोल्हू चवै बिन लांट ३ वे ॥ ७ ॥
निरभै निरन्तर नेम रख, अकला ४ अनाहद रात वे ।
मुकता मुलायम याद साहब, दूर कर दिल घात वे ॥ ८ ॥
जोगी बिजोगी बिंद रख ५, सुन में समाना सिंध वे ।
हाजिर गुलाम गरीब है, सोलह कला रबि चंद वे ॥ ६ ॥
( ३ )
बंदे देख ले दरहाल वे ।
सुन्न मंडल सैल करले, अजब गैबी ख्याल वे ॥ १ ॥
जबरूत ६ पर नासूत ६ है, नासूत पर मलकूत ६ वे ।
मलकूत पर लाहूत ६ है, लाहूत पर अनभूत ६ वे ॥ २ ॥
सुन ले सोहंसो जाप कूँ, सुन ६ में सिलहरा बाँध वे ।
सेस के सिर ध्यान धरिये, उलट स्वर कूँ साध वे ॥ ३ ॥
तीन मूरत निरख निःचल, पैठ देख पताल वे ।
(१) दर्बारी, प्रेमीजन । (२) बिना । (३) बिना जाठ के कोल्हू टपकता है।
(४) अँधेरी । (५) जो बीर्य्य को पात न होने दे । (६) अंतरी मुकामों के नाम ।

बैत ११५
मूल चक्र गनेस गैबी, रंग रूप बिसाल वे ॥ ४ ॥
दंड-धारी भुजा भारी, मुकुट की छबि खूब वे ।
अगमी अनाहद अदल है, फजली फजल महबूब वे ॥ ५ ॥
टुक उलट चसमैं सिंध में, झलकै जलाबिंब१ जोर वे ।
अजब रास बिलास बानी, चंद सूर करोर वे ॥ ६ ॥
हलका न भारी है मुरारी, अजब नूरी नैन वे ।
दिल मगज अंदर महल है, तूं समझ ले यह सैन वे ॥ ७ ॥
इक गुमठ२ अटल अनाद है, दुरते सुहंगम चौर वे ।
सेत छत्र सीस सोहै, अजब उज्ज्वल भौर वे ॥ ८ ॥
अजब नूर जहूर जोती, झिलमिलै झलकंत वे ।
हाजिर गुलाम गरीब है, जहाँ देख आदि न अंत वे ॥ ६ ॥
( ४ )
बंदे देखले दुरबीन वे ।
ऐनक उघार बिकार खोलो, चलै जल बिन मीन वे ॥ १ ॥
बिना जल जहाँ मीन चलता, नाम नौका अधर वे ।
बेड़े बिमान अमान देखो, को लखै यह कदर वे ॥ २ ॥
पानी बिना सरवर सरू३, जहाँ फूल है गुलजार वे ।
अधर बाग अनंत फल, कायम कला करतार वे ॥ ३ ॥
कर निगाह अगाह आसन, बरसता बिन बदर४ वे ।
बिन पखावज ताल सुर, बाजे बजैं जहाँ मधुर वे ॥ ४ ॥
बानी बिनोद असोधपुर, चंदा नहीं जहाँ सूर वे ।
पानी पवन नहिं भवन भारी, कला संख सपूर वे ॥ ५ ॥
कायम कुफल कुंजी लगी, खोले सोई सत पीर वे ।
कहता गरीब तबीब, तन चंगा करत कबीर वे ॥ ६ ॥
(१) जल में परछाईं । (२) गुम्बज़ । (३) सर्व का पेड़ । (४) बादल ।

११६ गरीबदास जी की बानी
( ५ )
बंदे देखले निज मूल वे ।
कला कोटि असंख धारा, अधर निरगुन फूल वे ॥ १ ॥
है अबंच असंच अवगत, अधर आदि अनाद वे ।
कमल मोती जगमगै, जहँ सुरत निरत समाध वे ॥ २ ॥
भवन भारी रवन सोभा, भजो राम रहीम वे ।
साहब धनी कूँ याद कर, जप अलह अलख करीम वे ॥ ३ ॥
मादर पिदर हैं संग तेरे, बिछुरता नहिं पलक वे ।
कायम कला कुरबान जाँ, खालिक बसे है खलक वे ॥ ४ ॥
खालिक धनी है खलक में, तूँ झलक पलक समोय वे ।
अरस आसन है बिहंगम, अधर चसमे जोय वे ॥ ५ ॥
बैराट में इक घाट है, उस घाट में इक द्वार वे ।
उस द्वार में इक देहरा, जहँ खूब है इक यार वे ॥ ६ ॥
सूभ१ है दिलदार साहब, देखना नहिं भूल वे ।
गरीबदास निवास नग२ पर, भई सेजाँ सूल वे ॥ ७ ॥
( ६ )
बंदे अधर बेड़ा चलत वे ।
साँच मान सुगंद३ साहब, नहीं करिया लगत वे ॥ १ ॥
अधर पुहसी अधर गिरवर, अधर सरवर ताल वे ।
अधर नदियाँ बहत हैं जहँ, अधर हीरे लाल वे ॥ २ ॥
अधर नौका अधर खेवट, अधर पानी पवन वे ।
अधर चंदा अधर सूरज, अधर चौदह भुवन वे ॥ ३ ॥
अधर बागं अधर बेलं, अधर कूप तलाव वे ।
अधर माली कुहकता है, अधर फूल खिलाव वे ॥ ४ ॥
(१) प्रकाशमान । (२) ऊँचा स्थान । (३) कसम ।

रमैनी ११७
अधर बँगला अधर डेवढ़ी, अधर साहब आप वे ।
अधर पुर गढ़ हूँठ नगरी, नाभि नासा माथ वे ॥ ५ ॥
हूँठ हाथ हजूर हासिल, अधर पर इक अधर वे ।
गरीबदासं अधर ध्यानी, ओढ़ि एकै चदर१ वे ॥ ६ ॥
( ७ )
बंदे पाक नाम पिछान वे ।
पाक मेला पाक परबी, पाक है असनान वे ॥ १ ॥
पाक सेवा पाक पूजा, पाक सालिग्राम वे ।
पाक चंदन पाक अरचन, पाक है वह धाम वे ॥ २ ॥
पाक संखा पाक झालर२, पाक है वो तूर३ वे ।
पाक बीना पाक घंटा, पाक यारा नूर वे ॥ ३ ॥
पाक सिज्जा४ पाक आसन, पाक है वह तख्त वे ।
पाकै पुजारी पूजता, जो पाक है सब रख्त५ वे ॥ ४ ॥
पाक कुरसी पाक तुरसी६, पाक माला फेर वे ।
पाक रागी पाक गावै, पाक नादं भेर७ वे ॥ ५ ॥
पाक भौंरा पाक चौंरा, पाक पुस्पं गंध वे ।
पाक मोती पाक हंसा, पाक सरवर सिंध वे ॥ ६ ॥
पाक लहरा पाक मिहरा, पाक सूरज चंद वे ।
पाक सस्तर पाक बस्तर, पाक पुर आनंद वे ॥ ७ ॥
पाक बानी पाक प्रानी, पाक बोलनहार वे ।
गरीबदासं पाक होकर, पाक कर दीदार वे ॥ ८ ॥
॥ रमैनी ॥
जब लग हंसा हमरी आना। तब लग लगै न तुमरा८ बाना ॥
दोही दे गुरु भरैं हँकारा६। तिन हंसों की चढ़ँ पुकारा ॥
(१) चोला, शरीर । (२) झाँझ । (३) तुरही । (४) पलंग । (५) सामान ।
(६) तुलसी । (७) शहनाई । (८) धर्मराय से कह रहे हैं । (६) गुरू की दोहाई देकर
हाँक मारैं ।
१६

११८ गरीबदास जी की बानी
कोटि कटक करहूँ पैमाला । जम किकर का तोड़ूँ जाला ॥
चौदह कोट बाँध जम लाऊँ । धरमराय कूँ त्रास दिखाऊँ ॥
चौदह भुवन दुहाई गाजै । जिस कूँ सुन जम किकर भाजै ॥
भक्ति बीज जो होवै हंसा । कोटिन जीव उधारै बंसा ॥
उधरैं हंस पार हो जाहीं । भवसागर में बहुर न आहीं ॥
॥ साखी ॥
सब्द हमारा मानि है, जाके हिरदय हेत ।
अमर लोक पहुँचावहूँ, रूप धरत है सेत ॥
कहैं कबीर सुनो धर्मराया । हम संखौं हंसा पद परसाया ॥
जिन लीन्हा हमरा परवाना । सो हंसा हम किये अमाना१ ॥
अमृत पान अमी रस चोखा । पीवो हंसा नाहीं धोखा ॥
या रस की जो लगै खुमारी । गगन मँडल में सुन्न अधारी ॥
झरै अमी रस अमृत धारा । जानैगा कोइ पीवनहारा ॥
हंस परेवा२ अमृत पीवै । संखौं कल्प जुगै जुग जीवै ॥
टूटै बंधन होत खुलासा । गरीबदास पद हंस निवासा ॥
( २ )
सेत सिंघासन सेतहि अंगा । सेत छत्र जाको सेतहि रंगा ॥
सेत खवास सेत ही चौंरा । सेतै पुहुप लेत ही भौंरा ॥
सेतै नाद सेत ही तूरा । सेत सिंघासन नाचै हूरा३ ॥
सेतै नदी सेत ही बिरछा । सेतै चंदन मस्तक चरचा४ ॥
सेत सरोवर सेतहि हंसा । सेतै जा का सब कुल बंसा ॥
सेतै मंदिर चंदर जोती । सेतै मानिक मुक्ता मोती ॥
सेतै मुकुट सेत ही थाना । सेत धुजा औ सेत निसाना ॥
गरीबदास वह धाम हमारा । सुर नर मुनि जन करो बिचारा ॥
(१) निश्चिन्त । (२) कबूतर । (३) अप्सरा । (४) लगाया ।

रमैनी ११६
( ३ )
बिनहीं पंथ पंथ है भाई । बिन चरनों चालै सो जाई ॥
बिनहीं देह धरै जहँ ध्याना। देह न गेह१ न पिंड न प्राना ॥
पिंड ब्रह्मांड बाक नहिं बानी । मन बुधि सेती अगम निसानी ॥
अलिफ इलाम२ गाम नहिं गेहा । गगन मँडल में जुरा सनेहा ॥
एता ईलम३ जो दिखलावै । सो सतगुरु साँचा कहलावै ॥
गरीबदास मन धरै न धीरं । अधर धार पंथ बाट कबीरं ॥६॥
( ४ )
रूप न रेख भेष नहिं बाना । आसन असल लना४ अस्थाना ॥
अकल अभूनी५ गम नहिं मोरी । हे सतगुरु कहँ पाऊँ डोरी ॥
ऊँचा धाम गाम नहि कोई । बिना चरन जहँ चलना होई ॥
अचरज लीला अगम अपारा । कैसे पाऊँ पंथ तुम्हारा ॥
सुरत निरत का सार सनेसा६ । उतरै हंसा पार हमेसा ॥
कहै कबीर पुरुष बरियामं७ । गरीबदास इक नौका नामं ॥
( ५ )
आदि सनातन पंथ हमारा । जानत नाहीं यह संसारा ॥
पंथों सेती पंथ अलहदा । भेखों बीच पड़ा है बहदा८ ॥
षट दरसन सब खटपट होई । हमरा पंथ न पावै कोई ॥
हिन्दू तुरक कदर नहिं जाने । रोजा ग्यारस करै धिक ता नेह९ ॥
दोनों दोन यकौ न आसा । वे पूरब वे पच्छिम निवासा ॥
दुहूँ दोन का छोड़ा लेखा । उत्तर दखिनन में हम देखा ॥
गरीबदास हम निःचै जाना । चारो खूँट दसो दिस ध्याना ॥
( ६ )
कैसे हिंदू तुरक कहाया । सबही एकै द्वारे आया ॥ १ ॥
(१) घर । (२) अल्लाह में अलिफ और लाम दो हर्फ़ हैं—अलाम के अर्थ सर्वज्ञ
के भी हैं । (३) विद्या । (४) लामकान । (५) तुच्छ बुद्धि । (६) सँदेसा । (७) श्रेष्ठ ।
(८) बाद बिबाद । (६) मुसलमान रोजा रखते हैं और हिन्दू एकादशी का व्रत सो दोनों
को धिक्कार है।

१२० गरीबदास जी की बानी
कैसे ब्राह्मन कैसे सूद्रं । एकै हाड़ चाम तन गूदं ॥ २ ॥
एकै बिंद एक भग द्वारा । एकै सब घट बोलनहारा ॥ ३ ॥
कौम छत्तीस एकही जाती । ब्रह्म बीज सबकी उतपाती ॥ ४ ॥
एकै कुल एकै परिवारा । ब्रह्म बीज का सकल पसारा ॥ ५ ॥
ऊँच नीच इस बिध है लोई । कमे कुकर्म कहावै दोई ॥ ६ ॥
गरीबदास जिन नाम पिछाना । ऊँच नीच पद ये परमाना ॥७॥
॥ आरती ॥
अदली आरत अदल समोई । निरभय पद में मिलना होई ॥टेक
दिल का दीप पवन की बाती । चित का चंदन पाँचो पाती ॥
तत का तिलक ध्यान की धोती । मन की माला अजपा जोती ॥
नूर के दीप नूर के चौरा । नूर के पुहुप नूर के भौंरा ॥
नूर की झाँझ नूर की झालर१ । नूर के संख नूर की टालर२ ॥
नूर की साँझी३ नूर की सेवा । नूर के सेवक नूर के देवा ॥
आदि पुरुष अदली अनुरागी । सुन संपुट में सेवा लागी ॥
खोजो कमल सुरति की डोरी । अगर दीप में खेलो होरी ॥
निरभय पद में निरत समानी । दासगरीब दरस दरबानी ॥
( २ )
अदली आरत अदल उजारा । सत्त पुरुष दीजो दीदारा ॥टेक
कैसे कर छूटै चौरासी । जूनी संकट बहुत तिरासी ॥
जुगन जुगन हम कहते आये । भवसागर से जीव छुटाये ॥
कर बिस्वास स्वास कूँ पेखो । या तन में मन मूरत देखो ॥
स्वासा पार सु भेद हमारा । जो खोजे सो उतरे पारा ॥
स्वासा पार सु आदि निसानी । जो खोजै सो होय दरबानी ॥
हर दम नाम सुहंगम सोई । आवा गमन बहुर ना होई ॥
(१) बिजय घंट । (२) ताल । (३) रंग या फूल पत्ती की चित्रकारी जो ठाकुरजी के
सामने बनाई जाती है ।

अब तो चढ़े नाम के छाजैं१। गगन मँडल में नौबत बाजै ॥
अगर अलेल सब्द सहदानी। दासगरीब बिहंगम बानी ॥
( ३ )
अदली आरत अदल बखाना। कोली बुन बिहंगम ताना ॥टेक
ज्ञान का राछ२ ध्यान की तुरिया। नाम का धागा निःचै जुरिया ॥
प्रेम की पान३ कमल की खाड़ी४। सुरत का सूत बुनें निज गाढ़ी ॥
नूर की नाल५ फिरैं दिन राती। जा कोली कूँ काल न खाती ॥
कल का खूँटा धरनी६ गाड़ा। गहिर गभीना७ ताना गाड़ा ॥
निरत की नली बुन जो कोई। सो तो कोली अविचल होई ॥
रेजा८ राजिक का बुन दीजै। ऐसे सतगुरु साहब रीझै ॥
दासगरीब सोई सत कोली। ताना बुनिहै अरस अमोली ॥
( ४ )
अदली आरत अदल अजूनी। नाम बिना है काया सूनी॥टेक
झूठी काया खाल लुहारा। इला पिंगला सुखमन द्वारा ॥
किरतघनी९ भूले नर लोई। जा घट निःचा नाम न होई ॥
सो नर कीट पतंग भुवंगा१०। चौरासी में धरिहैं अंगा ॥
उद्भिज११ खानी भुगतै प्रानी। समझै नहीं सब्द सहदानी ॥
हम हैं सब्द सब्द हम माहीं। हम से भिन्न और कछु नाहीं ॥
पाप पुन्न दो बीज बनाया। सब्द भेद कोउ बिरले पाया ॥
सब्दै सर्ब लोक में गाजै। सब्द वजीर सब्द है राजै ॥
सब्दै स्थावर जंगम जोगी। दास गरीब सब्द रस भोगी ॥
( ५ )
अदली आरत अदल जमाना। जम जोरा मेटौं तलब्राना ॥टेक
धरमराय पर हमरी धाई१२। नौबत नाम चढ़े ले भाई ॥
(१) छज्जा । (२) एक आला कपड़ा बुनने का जो कंघी की सूरत का होता है ।
(३) माड़ी । (४) गड़हा जिसमें पैर लटका कर बैठते हैं । (५) ढरकी । (६) जमीन ।
(७) गभिन । (८) कपड़ा । (९) नाशुकरा । (१०) साँप । (११) बनस्पति । (१२) धावा ।

१२२ गरीबदास जी की बानी
चित्रगुप्त१ के कागज चीरौं । जुगन जुगन मेटौं तसकीरौं ॥
अदली ज्ञान अदल इक रासा२ । सुन कर हंसन३ पावैं त्रासा ॥
इजराईल४ जुसा बरदाना। धरमराय का है तलबाना ॥
मेटौं तलब करौं तागीरा५ । भेंटे दास गरीब कबीरा ॥
( ६ )
अदली आरत अदल पठाऊँ । जुगन जुगन का लेखा पाऊँ॥टेक
जा दिन नहिं थे पिंड न प्राना । पानी पवन जिमीं असमान॥
कच्छ मच्छ कूरम नहिं काया । चंद सूर नहिं दीप बनाया ॥
सेस महेस गनेस न ब्रह्मा । नारद सारद ना बिसकर्मा ॥
सिध चोरासी ना तेंतीसौ । नौ औतार नहीं चौबीसौ ॥
पाँच तत्त नाहीं गुन तीना । नाद बिंद नाहीं घट सीना ॥
चित्रगुप्त६ नहिं किर्तुम बाजी । धरमराय नहिं पंडित काजी ॥
धुँधूकार अनंत जुग बीते । जा दिन कागद कोउ के चीते७ ॥
जा दिन थे हम तखत खवासा । तन के पाजी सेवक दासा ॥
संख जुगन परलूँ परवाना । सत्तपुरुष के संग रहाना ॥
दास गरीब कबीर का चेरा । सत्तलोक अमरापुर डेरा ॥
( ७ )
ऐसी आरत अपरम्पारा । थाके ब्रह्मा बेद उचारा ॥टेक
अनंत कोट जाके संभू ध्यानी । ब्रह्मा संख बेद पढ़ैं बानी ॥
इंद्र अनंत मेघ रस माला । सब्द अतीत वृद्ध नहिं बाला ॥
चंद सूर जाके अनंत चिरागा । सब्द अतीत अजब रँग बागा॥
सात समुद्र जाके अंजन नैना । सब्द अतीत अजब रँग बैना ॥
अनंत कोट जाके बाजे बाजैं । पूरन ब्रह्म अमरपुर छाजैं ॥
तीस कोट रामा औतारी । सीता संग रहंती नारी ॥
(१) जमपुरी में कर्मों का लेखा रखने वाला देवता । (२) एक रस । (३) जीव ।
(४) जान निकालने वाले फ़िरिश्ते का नाम । (५) तंगो । (६) कर्मों का लेखा रखने वाले
देवता । (७) तब तक कर्मों का हिसाब किसी का नहीं खुला था ।

तीन पदम जाके भगवाना। सप्त नील¹ कन्हवा² सँग जाना ॥
तीस कोट सीता सँग चेरी। सप्त नील राधा दें फेरी ॥
(जाके) अर्ध रूप पै सकल पसारा। ऐसा पूरन ब्रह्म हमारा ॥
दास गरीब कहै नर लोई। यह पद चीन्है बिरला कोई ॥
॥ दोहा ॥
सतबादी सब संग हैं, आप आपने धाम।
आजिज³ की अरदास⁴ है, सकल संत परनाम ॥
॥ राग कल्यान ॥
सेस सहस मुख गावै, साधो सेस सहस मुख गावै ॥टेक॥
ब्रह्मा बिस्नु महेसर थाके, नारद नाद बजावै।
सनक सनंदन ध्यान धरत हैं, दृष्ट मुष्ट नहिं आवै ॥ १ ॥
लघु दीरघ कछु कहा न जाई, जो पावै सो पावै।
जी⁵ जूनी कूँ कैसे दरसै, गौरज सीस चढ़ावै ॥ २ ॥
ब्रह्म रंध्र का घाट जहाँ है, उलट खेचरी⁶ लावै।
सहस कमल दल झिलमिल रंगा, चोखा फूल चुवावै ॥ ३ ॥
गंगा जमना मद्ध सरसुती, चरन कमल से आवै।
परबी कोटि परम पद माहीं, सुख के सागर न्हावै ॥ ४ ॥
सुरत निरत मन पौन पदारथ, चारो तत्त मिलावै।
आकासै उड़ चलै बिहंगम, गगन मँडल कूँ धावै ॥ ५ ॥
मोर मुकुट पीताँबर राजै, कोटि कला छबि छावै।
अबरन बरन तासु के नाहीं, बिचरत हैं निरदावै ॥ ६ ॥
बिनही चरनों चलै चिदानंद, बिन मुख बैन सुनावै।
गरीबदास यह अकथ कहानी, ज्यूँ गूँगा गुड़ खावै ॥ ७ ॥
कबहुँ न होवे मैला नाम धन, कबहुँ न होवे मैला।
चेतन होकर जड़ कूँ पूजै, मूरख मूढ़र बैला ॥ १ ॥
(१) नील = एक सौ खरब । (२) कन्हैया या कृष्ण । (३) आधीन । (४) अर्जदाश्त,
प्रार्थना । (५) जीव । (६) नाम एक मुद्रा का ।

१२४ गरीबदास जी की बानी
जिस दगड़े पंडित उठ चालै, पीछे पड़ गया गैला१ ।
औघट घाटी पंथ बिकट है, जहाँ हमारी सैला ॥ २ ॥
बिनय बंदगी म्हेसा२ कीजै, बोक३ बनै के खैला४ ।
कूकर सूकर खर कीजैगा, छ्वाँड़ सकल बद फैला५ ॥ ३ ॥
घरही कोस पचास परत हैं, ज्यूँ तेली के बैला ।
पीसत भाँग तमाखू पीवै, मूरख मुख सूँ मैला ॥ ४ ॥
सहस इक्कीसौ छःसै दम है, निस बासर तूँ लैला६ ।
गरीबदास सुन पार उतर गये, अनहद नाद घुरैला७ ॥ ५ ॥
( ३ )
घट ही में चंद चकोरा, साधो घट ही चंद चकोरा ॥टेक॥
दामिन दमकै घनहर८ गरजै, बोलै दादुर मोरा ।
सतगुरु गस्ती गस्त फिरावै, फिरता ज्ञान ढँढोरा ॥ १ ॥
अदली राज अदल बादसाही, पाँच पचीसो चोरा ।
चीन्हो सब्द सिंध घर कीजै, होना गारतगोरा ॥ २ ॥
त्रिकुटी महल में आसन मारो, जहँ न चलै जम जोरा ।
दास गरीब भक्ति को कीजो, हुआ जात है भोरा६ ॥ ३ ॥
( ४ )
घट से दरस जहूरा, साधो घट से दरस जहूरा ॥टेक॥
कायर कीर उलट कर भागे, पहुँचेगा कोइ सूरा ।
गगन मँडल में अनहद बाजै, भनकैं झीने तूरा१० ॥ १ ॥
त्रिकुटी महल में ध्यान समोवो, झिलमिल झिलमिल नूरा ।
अगर दीप में आसन मारो, मिट गई जम की घूरा११ ॥ २ ॥
संख पदम जहँ परघट देखे, मुरसिद मिलिया पूरा ।
दास गरीब अटल जागीरा, काढ़ कौन कसूरा ॥ ३ ॥
(१) जिस रास्ते पर पंडित चलते हैं उसी पर सब चलने लगते हैं। (२) हमेशा ।
(३) भारी बकरा । (४) साँड़ । (५) कुकर्म । (६) लेता है । (७) जिसकी अन्तर में धुन
हो रही है । (८) बादल । (६) सबेरा । (१०) तुरही । (११) टेढ़ी निगाह ।

राग बिजोग १२५
( ५ )
जो सूते सो जना बिगूते१, जागे सोई जगे हैं ॥टेक॥
सूरे तेई नगर पहुँचे, कायर उलट भगे हैं।
नौवें द्वारे दरस दरीबा२, दसमें ध्यान लगे हैं ॥ १ ॥
सुन्न सहर में हुई सगाई, हमरे हंस मँगे हैं।
निरगुन नाम निरालंब चीन्हो, हमरे साध सगे हैं ॥ २ ॥
बिन मुख बानी सतगुरु गावै, नाहीं दस्त३ पगे४ हैं।
दास गरीब अमर पुर डेरे, सत्त के दाग दगे हैं ॥ ३ ॥
( ६ )
नाम निरंजन नीका, साधो नाम निरंजन नीका ॥टेक॥
तीरथ बरत थोथरे५ लागैं, जप तप संजम फीका ॥ १ ॥
भजन बंदगी पार उतारै, समरथ जीवन जी का ॥ २ ॥
करम कांड ब्योहार करत है, नाम अभय पद टीका ॥ ३ ॥
कहा भयो छत्र की छाँह चलैया, राज पाट दिहली का ॥ ४ ॥
नाम सहित बेवतन भला है, दर दर माँगे भीखा ॥ ५ ॥
आदि अनादि भक्ति है नौधा६, सुनो हमारी सीखा ॥ ६ ॥
गरीबदास सतगुरु की सरनै, गगन मँडल में दीखा ॥ ७ ॥
॥ राग बिजोग ॥
सुनियो संत सुजान, दिया मैं हेला रे ॥टेक॥
और जनम बहुतेरे होंगे, मानुष जनम दुहेला७ रे ॥ १ ॥
तू जकिहै८ मैं लसकर जोरों, चलना तुझे अकेला रे ॥ २ ॥
अरब खरब लग माया जोरी, संग न चलसी धेला रे ॥ ३ ॥
या तो मेरी सत की निबरिया, सतगुरु पार पहेला रे ॥ ४ ॥
दास गरीब कहै रे संतो, सब्द गुरू चित चेला रे ॥ ५ ॥
(१) बिगड़े। (२) हाट। (३) हाथ। (४) पाँव। (५) थोथे। (६) नौ प्रकार की।
(७) कठिन। (८) बिचारता है।
१७

१२६ गरीबदास जी की बानी
( २ )
सुनिये संत सुजान, गरब नहिं करना रे ॥ टेक ॥
चार दिनाँ की चिहर¹ बनी है, आखिर तोकूँ मरना रे ॥ १ ॥
तूँ जाने मेरि ऐसी निभेगी, हर दम लेखा भरना रे ॥ २ ॥
खाय ले पी ले बिलस ले हंसा, जोड़ जोड़ नहि धरना रे ॥ ३ ॥
दास गरीब सकल में साहब, नहीं किसी सूं अड़ना रे ॥ ४ ॥
॥ राग परज ॥
राम न जाना रे, मूढ़ नर राम न जाना रे ॥टेक॥
जल की बुंद महल रचा, यह सकल जहाना रे।
जठर अगिन सूं राखिया, तेरा पिंड अरु प्राना रे ॥ १ ॥
जहँ तो कूँ भोजन दिया, अमृत रस खाना रे।
गरभ बास तें काढ़ि कै, नर बाहर आना रे ॥ २ ॥
लीला अगम अगाध है, सूरत बिध नाना रे।
मात पिता सुत बंधवा, क्या देख भुलाना रे ॥ ३ ॥
इनमें तेरा को नहीं, क्यों भया दिवाना रे।
जा तन चंदन लेपते, ले धरे मसाना रे ॥ ४ ॥
सूवे सेंभल सेइया, तर देख लुभाना रे।
चंच² मार ब्याकुल भया, बहुतै पछताना रे ॥ ५ ॥
मानसरोवर कमल दल, घर दूर पयाना रे।
गये रसातल राह को, पढ़ पोथी पाना³ रे ॥ ६ ॥
सतगुरु संत सेये नहीं, पूजे पाषाना रे।
मरकव भये कुम्हार के⁴, फिर सूकर स्वाना रे ॥ ७ ॥
पंथ पुरातम⁵ बूझि है, कोई संत सुजाना रे।
स्वासा पारस नाम है, नाभी अस्थाना रे ॥ ८ ॥
(१) जिन्दगी । (२) चोंच । (३) पन्ना । (४) कुम्हार के चढ़ने का जानवर यानी गधा ।
(५) प्राचीन ।

राग परज १२७
हिरदय में हरि पाइये, त्रिकुटी परवाना रे।
गगन मँडल में गुमठ१ है, जहँ धसा निसाना रे॥ ९ ॥
हाजिर नाजिर है धनी, साहब दिल दाना रे।
पलकों चौंरा२ कीजिये, तापर कुरबाना रे॥१०॥
मन पवन सुरत से अगम है, कह निरत बयाना रे।
जैसे उलट अकास कूँ, धरिहै धुन ध्याना रे॥११॥
आसन बंध अडोल मन, जो पर्दहि समाना रे।
गरीबदास यूँ पाइये, पिव पुरुष पुराना रे॥१२॥
( २ )
लेखा लीजै रे, धनी के लेखा लीजै३ रे॥टेक॥
हाट पटन सब लुट गये, कहु अब क्या कीजै रे।
पूँजी माल गँवाइया, फिर कौन पतीजै रे॥ १ ॥
मैं गाफिल भूला फिरूँ, गढ़ हंस चढ़ीजै रे।
चाकर चोर अनादि का, सिर बोझा दीजै रे॥ २ ॥
सीस काट हाजिर करै, जब सतगुरु रीझै रे।
अमी महारस नाम है, अमृत पय पीजै रे॥ ३ ॥
गगन मँडल भाठी भरै, कमला दल भींजै रे।
सब्द अनाहद घोर है, चल हंस सुनीजै रे॥ ४ ॥
पूँजी साहूकार की, यह हर दम छीजै रे।
गरीबदास दूने करै, सो साह कहीजै रे॥ ५ ॥
( ३ )
लेखा देना रे, धनी का लेखा देना रे॥ टेक ॥
रागी राग उचारहीं, गावत मुख बैना रे।
हस्ती घोड़े पालकी, छाँड़ी सब सैना रे॥ १ ॥
रोकड़ धरी ढकी रही, सब जेवर गहना रे।
(१) गुम्बज। (२) चँवर। (३) ईश्वर के यहां हिसाब लिया जायगा।

१२८ गरीबदास जी की बानी
फूँक दिया मैदान में, कुछ लेन न देना रे ॥ २ ॥
मुगदर मारै सीस में, जम किंकर दहना रे।
उतर चला तागीर१ हो, ज्यूँ मरदक सहना२ रे ॥ ३ ॥
फूला सो कुम्हलात है, चुनिया सो ढहना३ रे।
चित्रगुप्त लेखा लिया, जब कागद पहना४ रे ॥ ४ ॥
चलिये अब दीवान में, सतगुरु से कहना रे।
मुसकिल से आसान हो, ज्यूँ बहुर मरै ना रे ॥ ५ ॥
बोया अपना सब लुनै५, पकरैं हम अहना६ रे।
चरन कमल के ध्यान से, छूटै सब फैना७ रे ॥ ६ ॥
परानन्दनी८ संग है, जाके कमधैना९ रे।
गरीबदास फिर आवही, जो अजर जरै ना रे ॥ ७ ॥
( ४ )
भजन कर राम दुहाई रे ॥ टेक ॥
जनम अमोला तुझ दिया, नर देही पाई रे।
देही कूँ या ललचहीं, सुर नर मुनि भाई रे ॥ १ ॥
सनकादिक नारद रटैं, चहुँ बेदा गाई रे।
भक्ति करै भवजल तरै, सतगुरु सरनाई रे ॥ २ ॥
मिरगा१० कठिन कठोर है, कहो कहाँ दहकाई११ रे।
कस्तूरी है नाभ में, बाहर भरमाई रे ॥ ३ ॥
राजा बूड़े मान में, पंडित चतुराई रे।
ज्ञान गली में बंक१२ है, तन धूर मिलाई रे ॥ ४ ॥
उस साहब कूँ याद कर, जिन सौंज१३ बनाई रे।
देखत ही हो जात है, परबत से राई रे ॥ ५ ॥
(१) तंग । (२) मसल मशहूर है “उतरा शहना मर्दक नाम”। (३) जो घर चुना
या बनाया जाता है वह कोई दिन गिर जायगा । (४) लंबा चौड़ा । (५) काटै। (६) लोहा ।
(७) फन्दा । (८) परम आनन्द या रस की खान । (६) कामधेनु । (१०) मन । (११)
धोखा खाया । (१२) टेढ़ाई, पेच । (१३) साज ।

राग मंगल १२६
कंचन काया छार१ होय, तन ठोंक जराई रे ।
मूरख भोंदू बावरे, क्या मुकत कराई रे ॥ ६ ॥
चमरा२ जुलहा३ तर गये, और छीपा४ नाई५ रे ।
गनिका चढ़ी बिमान में६, सुर्गापुर जाई रे ॥ ७ ॥
स्योरी भिलनी तर गई, और सदन कसाई रे ।
नीच तरे तो सूँ कहूँ, नर मूढ़ अन्याई रे ॥ ८ ॥
सब्द हमारा साँच है, और ऊँट की बाई रे७ ।
धूँएँ के से धौलहर, तिहुँ८ लोक चलाई रे ॥ ६ ॥
कलविष कसमल सब कटै, तन कंचन काई रे ।
गरीबदास निज नाम है, नित परबी न्हाई रे ॥ १० ॥
राग मंगल
लगन लगी सतलोक, अमरपुर चालिये ।
सुन्न मँडल सतलोक, दीप घर बालिये ॥ टेक ॥
जोगिया नाद बजाय, रहा है ओलने९ ।
सत्तलोक के अंक, लिखे हैं चोलने ॥ १ ॥
हम बिभिचारिन, चोरि जारि बहुतै किये ।
मेहरबान महबूब, तुम्हीं अनगिन दिये१० ॥ २ ॥
होते कीट पतंग, संग किस बिध लिये ।
कपै जोरा काल, सही जुग जुग जिये ॥ ३ ॥
अकल उदासी राग, अमर११ में बोलता ।
सुरत निरत भइ नेस१२, पवन नहिं डोलता ॥ ४ ॥
मन राते सतलोक, सिंध में गैब है ।
उलट मिले अनुराग, तहाँ नहिं ऐब है ॥ ५ ॥
(१) राख । (२) रैदास जी । (३) कबीर साहब । (४) नामदेव । (५) सेना भक्त ।
(६) नोट पृष्ठ २१ देखो । (७) सब्द के सिवाय सब पसारा ऊँट की बाव अर्थात् मिथ्या
है । (८) तीनों । (९) परदे में । (१०) तुम्हारी अपार छिमा और दया हुई । (११)
सत्तलोक । (१२) नेष्ठा ।

१३० गरीबदास जी की बानी
निरगुन झड़१ का भेद, भँवर कोई जानसी ।
दास गरीब समाध, अमरपुर ठानसी ॥ ६ ॥
( २ )
दीन के दयाल, भक्ति बिर्द२ दीजिये ।
खानाजाद गुलाम, अपन कर लीजिये ॥ १ ॥
खानाजाद गुलाम, तुम्हारा है सही ।
मेहरवान महबूब, जुगन जुग पत रही ॥ २ ॥
बाँदी-जाम३ गुलाम, गुलाम गुलाम है।
खड़ा रहै दरबार, सु आठो जाम है ॥ ३ ॥
सेवक तलबदार४, दर तुम्हरे कूकहीं ।
औगुन अनँत अपार, परी मोहि चूक हीं ॥ ४ ॥
मैं घर का बन्दाजादा, अरज मोरि मानिये ।
कहता दास गरीब, अपन कर जानिये ॥ ५ ॥
( ३ )
धन सतगुरु बरियाम५, अटल बर हम बरी ।
दुलहिन के बड़ भाग, सुहागिन धन घरी ॥ टेक ॥
चलो सखी सतलोक, सेहरा गाइये ।
मोतियन थाल भराय, सु चौक पुराइये ॥ १ ॥
हलदवान६ हित कीन, बीन जहाँ बाजहीं ।
धन सतगुरु उपदेस, दिहाड़ा७ आजहीं ॥ २ ॥
दुलहिन धोये देह, सु मंगल गावहीं ।
सत्त पुरुष के धाम, सु चौर दुरावहीं ॥ ३ ॥
ढुरै सुहंगम चौर, सु चौरी८ गाइये ।
ब्रह्मा कथते बेद, लाड़ी परनाइये६ ॥ ४ ॥
(१) झाड़, फुलवारी । (२) साख । (३) लौंडी-बच्चा । (४) तनखाह पानेवाले । (५)
बरीयान-श्रेष्ठ । (६) हल्दीहाथ की रसम । (७) दिन । (८) मंडप की गीत । (६) दुलहिन
को ब्याहिये ।

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राग मंगल १३१

[Main Text]
संकर साहा सोध१, समागम कीजिये ।
बिसुन बिसंभर रोप, अटल बर दीजिये ॥ ५ ॥
नारद पूरे नाद, सकल सुर आवहीं।
सुन्न मंडल सतलोक, अगम घर छावहीं ॥ ६ ॥
जहाँ सेत धजा फहराहिं, अरस२ तंबू तना।
अनहद नाद अगाध, लाये नूरी बना३ ॥ ७ ॥
नाद तूर डफ झाँझ, संख मुरली बजै।
मिरदंग झालर भेरि, अजब तुरही सजै ॥ ८ ॥
रंग महल में रास, बिलास अपार है।
चलो सखी उस धाम, सु कंत हमार है ॥ ६ ॥
दस परकार अपार, अजब धुन ध्यान है।
दूलह बर बरियाम, पिया निःकाम है ॥१०॥
बिखम दुहेली४ बाट, पंथ नहि पाइये।
सुन्न मंडल सतलोक, कौन बिध जाइये ॥११॥
सुन्न मंडल सतलोक, दुलहिनी दूर है।
सब्द अतीत५ पिछान, नूर भरपूर है ॥१२॥
नूर रहा भरपूर, दिवाना देस है।
दुलहिन दास गरीब, तखत जिस पेस है ॥१३॥

( ४ )
अवगत अपरंपार, पार नहि पावै हो ।
नाद बिंद का जीव, भरम डहकावै हो ॥टेक॥
मन मनसा नहिं ठौर, ध्यान कहा धरिये हो ।
का सूँ करूँ फरियाद, कहो क्या करिये हो ॥ १ ॥
तज दुरमत का संग, रंग नहिं लागै हो ।
कोट जनम का स्वान६, हाड़ नहिं छाँड़ै हो ॥ २ ॥

[Footnotes]
(१) लगन सोधना। (२) अर्श = सहसदल कमल । (३) दुलहा। (४) कठिन।
(५) निर्माया। (६) कुत्ता।

१३२ गरीबदास जी की बानी
बिषै हलाहल खाय, जगत सब धूता१ हो ।
ज्यूँ हिरना के संग, सिकारी कूता२ हो ॥ ३ ॥
कौवा तजै न बीठ३, हंस कस होई हो ।
अंध गुरू का चेल, खेल सब खोई हो ॥ ४ ॥
बैठा मंझ मँजार४, मूसटे५ खाई हो ।
बाहर किसा६ अचार७, बूड़ी पंडिताई हो ॥ ५ ॥
बक मीनी८ का ध्यान, नहीं नर धरिये हो ।
भौसागर में आन, बहुर क्यूँ परिये हो ॥ ६ ॥
पारस पद कूँ परस, सुरत ठहरावो हो ।
निरत निरन्तर लाय, अगमपुर जावो हो ॥ ७ ॥
जहँ झिलमिल झिलमिल होय, अजब खिलखाना८ हो ।
कहता दास गरीब, सुदेस दिवाना हो ॥ ८ ॥
( ५ )
रतनागर१० सुख सागर, हंसा चाल रे ।
जहँ पारस पदम अनंत, अमीते११ माल रे ॥ १ ॥
रतन सिंध वैराग रे, मुक्ते११ माल हैं।
हीरे मोती मुक्ते, लालों पाल११ हैं ॥ २ ॥
कामधेनु कलबृच्छ१२, चिंतामनि चीन्ह रे ।
लोचन खुलहिं अनंत, अरस दुरबीन रे ॥ ३ ॥
खुलिहैं अंध कपाट, लगै जो चाचरी१३ ।
सिम्भुद्वार१४ दुरबीन, तहाँ पद बाँच री ॥ ४ ॥
बंका हीरा देखि, सुरत हैरान है।
सेत धजा फहराहिं, अमरपुर थान है ॥ ५ ॥
(१) धूर्त, कपटी । (२) कुत्ता । (३) विष्टा । (४) बिल्ली । ५) चूहे । (६) कैसा । (७)
आचार, नेम धरम । (८) बकुला और मछली । (६) खिलवत खाना = एकान्त में मिलने
का स्थान । (१०) सुन्न सरोवर । (११) बहुत । (१२) कल्प वृक्ष । (१३) नाम एक मुद्रा
का । (१४) शिव-नेत्र या तीसरा तिल ।

मान सरोवर परबी, हर दम लीजिये।
झिरै गऊमुख गंग, तहाँ सिर दीजिये ॥ ६ ॥
पलकों चौर दुराहिं, नयन पट बीच है।
गरीबदास गुलजारा, परमल¹ सींच है॥७॥
॥ राग बँगला ॥
बँगला खूब बना है जोर, जामें सूरज चंद कड़ोर ॥टेक॥
या बँगले के द्वादस दर हैं, मध्य पवन परवाना।
नाम भजै तो जुग जुग तेरा, नातर होत बिराना ॥ १ ॥
पाँच तत्त औ तीन गुणन का, बँगला अधिक बनाया।
या बँगले में साहब बैठा, सतगुरु भेद लखाया ॥ २ ॥
रोम रोम तारागन दमकै, कली कली दर चंदा।
सूरज मुखी सबत्तर² साजै, बाँधा परमानन्दा ॥ ३ ॥
बँगले में बैकुंठ बनाया, सप्तपुरी सैलाना।
भुवन चतुरदस लोक बिराजैं, कारीगर करवाना ॥ ४ ॥
या बँगले में जाप होत है, ररङ्कार धुन सेसा।
सुर नर मुनि जन माला फेरैं, ब्रह्मा बिस्नु महेसा ॥ ५ ॥
गन गंधर्प गलतान ध्यान में, तेंतिस कोटि बिराजैं।
सुर निःतन्ती बीना सुनिये, अनहद नादू बाजैं ॥ ६ ॥
इला पिंगला पेंग परी है, सुखमन झूल झुलन्ती।
सुरत सनेही सब्द सुनत है, राग होत निःतन्ती ॥ ७ ॥
पाँच पचीसो मगन भये हैं, देखो परमानंदा।
मन चंचल निःचल भया हंसा, मिले परम सुख सिंधा ॥ ८ ॥
नभ की डोर गगन सूँ बाँधै, तौ इहाँ रहने पावै।
दसो दिसा से पवन झकोरै, काहे दोस लगावै ॥ ६ ॥


(१) निर्मल, सुगंधित। (२) सब जगह।
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