गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 143, कुल 186 में से
संदर्भ में पढ़ेंमान सरोवर परबी, हर दम लीजिये।
झिरै गऊमुख गंग, तहाँ सिर दीजिये ॥ ६ ॥
पलकों चौर दुराहिं, नयन पट बीच है।
गरीबदास गुलजारा, परमल¹ सींच है॥७॥
॥ राग बँगला ॥
बँगला खूब बना है जोर, जामें सूरज चंद कड़ोर ॥टेक॥
या बँगले के द्वादस दर हैं, मध्य पवन परवाना।
नाम भजै तो जुग जुग तेरा, नातर होत बिराना ॥ १ ॥
पाँच तत्त औ तीन गुणन का, बँगला अधिक बनाया।
या बँगले में साहब बैठा, सतगुरु भेद लखाया ॥ २ ॥
रोम रोम तारागन दमकै, कली कली दर चंदा।
सूरज मुखी सबत्तर² साजै, बाँधा परमानन्दा ॥ ३ ॥
बँगले में बैकुंठ बनाया, सप्तपुरी सैलाना।
भुवन चतुरदस लोक बिराजैं, कारीगर करवाना ॥ ४ ॥
या बँगले में जाप होत है, ररङ्कार धुन सेसा।
सुर नर मुनि जन माला फेरैं, ब्रह्मा बिस्नु महेसा ॥ ५ ॥
गन गंधर्प गलतान ध्यान में, तेंतिस कोटि बिराजैं।
सुर निःतन्ती बीना सुनिये, अनहद नादू बाजैं ॥ ६ ॥
इला पिंगला पेंग परी है, सुखमन झूल झुलन्ती।
सुरत सनेही सब्द सुनत है, राग होत निःतन्ती ॥ ७ ॥
पाँच पचीसो मगन भये हैं, देखो परमानंदा।
मन चंचल निःचल भया हंसा, मिले परम सुख सिंधा ॥ ८ ॥
नभ की डोर गगन सूँ बाँधै, तौ इहाँ रहने पावै।
दसो दिसा से पवन झकोरै, काहे दोस लगावै ॥ ६ ॥
(१) निर्मल, सुगंधित। (२) सब जगह।
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