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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

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पृष्ठ 128

११८ गरीबदास जी की बानी
कोटि कटक करहूँ पैमाला । जम किकर का तोड़ूँ जाला ॥
चौदह कोट बाँध जम लाऊँ । धरमराय कूँ त्रास दिखाऊँ ॥
चौदह भुवन दुहाई गाजै । जिस कूँ सुन जम किकर भाजै ॥
भक्ति बीज जो होवै हंसा । कोटिन जीव उधारै बंसा ॥
उधरैं हंस पार हो जाहीं । भवसागर में बहुर न आहीं ॥
॥ साखी ॥
सब्द हमारा मानि है, जाके हिरदय हेत ।
अमर लोक पहुँचावहूँ, रूप धरत है सेत ॥
कहैं कबीर सुनो धर्मराया । हम संखौं हंसा पद परसाया ॥
जिन लीन्हा हमरा परवाना । सो हंसा हम किये अमाना१ ॥
अमृत पान अमी रस चोखा । पीवो हंसा नाहीं धोखा ॥
या रस की जो लगै खुमारी । गगन मँडल में सुन्न अधारी ॥
झरै अमी रस अमृत धारा । जानैगा कोइ पीवनहारा ॥
हंस परेवा२ अमृत पीवै । संखौं कल्प जुगै जुग जीवै ॥
टूटै बंधन होत खुलासा । गरीबदास पद हंस निवासा ॥
( २ )
सेत सिंघासन सेतहि अंगा । सेत छत्र जाको सेतहि रंगा ॥
सेत खवास सेत ही चौंरा । सेतै पुहुप लेत ही भौंरा ॥
सेतै नाद सेत ही तूरा । सेत सिंघासन नाचै हूरा३ ॥
सेतै नदी सेत ही बिरछा । सेतै चंदन मस्तक चरचा४ ॥
सेत सरोवर सेतहि हंसा । सेतै जा का सब कुल बंसा ॥
सेतै मंदिर चंदर जोती । सेतै मानिक मुक्ता मोती ॥
सेतै मुकुट सेत ही थाना । सेत धुजा औ सेत निसाना ॥
गरीबदास वह धाम हमारा । सुर नर मुनि जन करो बिचारा ॥
(१) निश्चिन्त । (२) कबूतर । (३) अप्सरा । (४) लगाया ।