गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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राग मंगल १३१
[Main Text]
संकर साहा सोध१, समागम कीजिये ।
बिसुन बिसंभर रोप, अटल बर दीजिये ॥ ५ ॥
नारद पूरे नाद, सकल सुर आवहीं।
सुन्न मंडल सतलोक, अगम घर छावहीं ॥ ६ ॥
जहाँ सेत धजा फहराहिं, अरस२ तंबू तना।
अनहद नाद अगाध, लाये नूरी बना३ ॥ ७ ॥
नाद तूर डफ झाँझ, संख मुरली बजै।
मिरदंग झालर भेरि, अजब तुरही सजै ॥ ८ ॥
रंग महल में रास, बिलास अपार है।
चलो सखी उस धाम, सु कंत हमार है ॥ ६ ॥
दस परकार अपार, अजब धुन ध्यान है।
दूलह बर बरियाम, पिया निःकाम है ॥१०॥
बिखम दुहेली४ बाट, पंथ नहि पाइये।
सुन्न मंडल सतलोक, कौन बिध जाइये ॥११॥
सुन्न मंडल सतलोक, दुलहिनी दूर है।
सब्द अतीत५ पिछान, नूर भरपूर है ॥१२॥
नूर रहा भरपूर, दिवाना देस है।
दुलहिन दास गरीब, तखत जिस पेस है ॥१३॥
( ४ )
अवगत अपरंपार, पार नहि पावै हो ।
नाद बिंद का जीव, भरम डहकावै हो ॥टेक॥
मन मनसा नहिं ठौर, ध्यान कहा धरिये हो ।
का सूँ करूँ फरियाद, कहो क्या करिये हो ॥ १ ॥
तज दुरमत का संग, रंग नहिं लागै हो ।
कोट जनम का स्वान६, हाड़ नहिं छाँड़ै हो ॥ २ ॥
[Footnotes]
(१) लगन सोधना। (२) अर्श = सहसदल कमल । (३) दुलहा। (४) कठिन।
(५) निर्माया। (६) कुत्ता।