गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३२ गरीबदास जी की बानी
बिषै हलाहल खाय, जगत सब धूता१ हो ।
ज्यूँ हिरना के संग, सिकारी कूता२ हो ॥ ३ ॥
कौवा तजै न बीठ३, हंस कस होई हो ।
अंध गुरू का चेल, खेल सब खोई हो ॥ ४ ॥
बैठा मंझ मँजार४, मूसटे५ खाई हो ।
बाहर किसा६ अचार७, बूड़ी पंडिताई हो ॥ ५ ॥
बक मीनी८ का ध्यान, नहीं नर धरिये हो ।
भौसागर में आन, बहुर क्यूँ परिये हो ॥ ६ ॥
पारस पद कूँ परस, सुरत ठहरावो हो ।
निरत निरन्तर लाय, अगमपुर जावो हो ॥ ७ ॥
जहँ झिलमिल झिलमिल होय, अजब खिलखाना८ हो ।
कहता दास गरीब, सुदेस दिवाना हो ॥ ८ ॥
( ५ )
रतनागर१० सुख सागर, हंसा चाल रे ।
जहँ पारस पदम अनंत, अमीते११ माल रे ॥ १ ॥
रतन सिंध वैराग रे, मुक्ते११ माल हैं।
हीरे मोती मुक्ते, लालों पाल११ हैं ॥ २ ॥
कामधेनु कलबृच्छ१२, चिंतामनि चीन्ह रे ।
लोचन खुलहिं अनंत, अरस दुरबीन रे ॥ ३ ॥
खुलिहैं अंध कपाट, लगै जो चाचरी१३ ।
सिम्भुद्वार१४ दुरबीन, तहाँ पद बाँच री ॥ ४ ॥
बंका हीरा देखि, सुरत हैरान है।
सेत धजा फहराहिं, अमरपुर थान है ॥ ५ ॥
(१) धूर्त, कपटी । (२) कुत्ता । (३) विष्टा । (४) बिल्ली । ५) चूहे । (६) कैसा । (७)
आचार, नेम धरम । (८) बकुला और मछली । (६) खिलवत खाना = एकान्त में मिलने
का स्थान । (१०) सुन्न सरोवर । (११) बहुत । (१२) कल्प वृक्ष । (१३) नाम एक मुद्रा
का । (१४) शिव-नेत्र या तीसरा तिल ।