सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 186 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 137

राग परज १२७
हिरदय में हरि पाइये, त्रिकुटी परवाना रे।
गगन मँडल में गुमठ१ है, जहँ धसा निसाना रे॥ ९ ॥
हाजिर नाजिर है धनी, साहब दिल दाना रे।
पलकों चौंरा२ कीजिये, तापर कुरबाना रे॥१०॥
मन पवन सुरत से अगम है, कह निरत बयाना रे।
जैसे उलट अकास कूँ, धरिहै धुन ध्याना रे॥११॥
आसन बंध अडोल मन, जो पर्दहि समाना रे।
गरीबदास यूँ पाइये, पिव पुरुष पुराना रे॥१२॥
( २ )
लेखा लीजै रे, धनी के लेखा लीजै३ रे॥टेक॥
हाट पटन सब लुट गये, कहु अब क्या कीजै रे।
पूँजी माल गँवाइया, फिर कौन पतीजै रे॥ १ ॥
मैं गाफिल भूला फिरूँ, गढ़ हंस चढ़ीजै रे।
चाकर चोर अनादि का, सिर बोझा दीजै रे॥ २ ॥
सीस काट हाजिर करै, जब सतगुरु रीझै रे।
अमी महारस नाम है, अमृत पय पीजै रे॥ ३ ॥
गगन मँडल भाठी भरै, कमला दल भींजै रे।
सब्द अनाहद घोर है, चल हंस सुनीजै रे॥ ४ ॥
पूँजी साहूकार की, यह हर दम छीजै रे।
गरीबदास दूने करै, सो साह कहीजै रे॥ ५ ॥
( ३ )
लेखा देना रे, धनी का लेखा देना रे॥ टेक ॥
रागी राग उचारहीं, गावत मुख बैना रे।
हस्ती घोड़े पालकी, छाँड़ी सब सैना रे॥ १ ॥
रोकड़ धरी ढकी रही, सब जेवर गहना रे।
(१) गुम्बज। (२) चँवर। (३) ईश्वर के यहां हिसाब लिया जायगा।