गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबैत ११५
मूल चक्र गनेस गैबी, रंग रूप बिसाल वे ॥ ४ ॥
दंड-धारी भुजा भारी, मुकुट की छबि खूब वे ।
अगमी अनाहद अदल है, फजली फजल महबूब वे ॥ ५ ॥
टुक उलट चसमैं सिंध में, झलकै जलाबिंब१ जोर वे ।
अजब रास बिलास बानी, चंद सूर करोर वे ॥ ६ ॥
हलका न भारी है मुरारी, अजब नूरी नैन वे ।
दिल मगज अंदर महल है, तूं समझ ले यह सैन वे ॥ ७ ॥
इक गुमठ२ अटल अनाद है, दुरते सुहंगम चौर वे ।
सेत छत्र सीस सोहै, अजब उज्ज्वल भौर वे ॥ ८ ॥
अजब नूर जहूर जोती, झिलमिलै झलकंत वे ।
हाजिर गुलाम गरीब है, जहाँ देख आदि न अंत वे ॥ ६ ॥
( ४ )
बंदे देखले दुरबीन वे ।
ऐनक उघार बिकार खोलो, चलै जल बिन मीन वे ॥ १ ॥
बिना जल जहाँ मीन चलता, नाम नौका अधर वे ।
बेड़े बिमान अमान देखो, को लखै यह कदर वे ॥ २ ॥
पानी बिना सरवर सरू३, जहाँ फूल है गुलजार वे ।
अधर बाग अनंत फल, कायम कला करतार वे ॥ ३ ॥
कर निगाह अगाह आसन, बरसता बिन बदर४ वे ।
बिन पखावज ताल सुर, बाजे बजैं जहाँ मधुर वे ॥ ४ ॥
बानी बिनोद असोधपुर, चंदा नहीं जहाँ सूर वे ।
पानी पवन नहिं भवन भारी, कला संख सपूर वे ॥ ५ ॥
कायम कुफल कुंजी लगी, खोले सोई सत पीर वे ।
कहता गरीब तबीब, तन चंगा करत कबीर वे ॥ ६ ॥
(१) जल में परछाईं । (२) गुम्बज़ । (३) सर्व का पेड़ । (४) बादल ।