गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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( ५ )
बंदे देखले निज मूल वे ।
कला कोटि असंख धारा, अधर निरगुन फूल वे ॥ १ ॥
है अबंच असंच अवगत, अधर आदि अनाद वे ।
कमल मोती जगमगै, जहँ सुरत निरत समाध वे ॥ २ ॥
भवन भारी रवन सोभा, भजो राम रहीम वे ।
साहब धनी कूँ याद कर, जप अलह अलख करीम वे ॥ ३ ॥
मादर पिदर हैं संग तेरे, बिछुरता नहिं पलक वे ।
कायम कला कुरबान जाँ, खालिक बसे है खलक वे ॥ ४ ॥
खालिक धनी है खलक में, तूँ झलक पलक समोय वे ।
अरस आसन है बिहंगम, अधर चसमे जोय वे ॥ ५ ॥
बैराट में इक घाट है, उस घाट में इक द्वार वे ।
उस द्वार में इक देहरा, जहँ खूब है इक यार वे ॥ ६ ॥
सूभ१ है दिलदार साहब, देखना नहिं भूल वे ।
गरीबदास निवास नग२ पर, भई सेजाँ सूल वे ॥ ७ ॥
( ६ )
बंदे अधर बेड़ा चलत वे ।
साँच मान सुगंद३ साहब, नहीं करिया लगत वे ॥ १ ॥
अधर पुहसी अधर गिरवर, अधर सरवर ताल वे ।
अधर नदियाँ बहत हैं जहँ, अधर हीरे लाल वे ॥ २ ॥
अधर नौका अधर खेवट, अधर पानी पवन वे ।
अधर चंदा अधर सूरज, अधर चौदह भुवन वे ॥ ३ ॥
अधर बागं अधर बेलं, अधर कूप तलाव वे ।
अधर माली कुहकता है, अधर फूल खिलाव वे ॥ ४ ॥
(१) प्रकाशमान । (२) ऊँचा स्थान । (३) कसम ।