गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 139, कुल 186 में से
संदर्भ में पढ़ेंराग मंगल १२६
कंचन काया छार१ होय, तन ठोंक जराई रे ।
मूरख भोंदू बावरे, क्या मुकत कराई रे ॥ ६ ॥
चमरा२ जुलहा३ तर गये, और छीपा४ नाई५ रे ।
गनिका चढ़ी बिमान में६, सुर्गापुर जाई रे ॥ ७ ॥
स्योरी भिलनी तर गई, और सदन कसाई रे ।
नीच तरे तो सूँ कहूँ, नर मूढ़ अन्याई रे ॥ ८ ॥
सब्द हमारा साँच है, और ऊँट की बाई रे७ ।
धूँएँ के से धौलहर, तिहुँ८ लोक चलाई रे ॥ ६ ॥
कलविष कसमल सब कटै, तन कंचन काई रे ।
गरीबदास निज नाम है, नित परबी न्हाई रे ॥ १० ॥
राग मंगल
लगन लगी सतलोक, अमरपुर चालिये ।
सुन्न मँडल सतलोक, दीप घर बालिये ॥ टेक ॥
जोगिया नाद बजाय, रहा है ओलने९ ।
सत्तलोक के अंक, लिखे हैं चोलने ॥ १ ॥
हम बिभिचारिन, चोरि जारि बहुतै किये ।
मेहरबान महबूब, तुम्हीं अनगिन दिये१० ॥ २ ॥
होते कीट पतंग, संग किस बिध लिये ।
कपै जोरा काल, सही जुग जुग जिये ॥ ३ ॥
अकल उदासी राग, अमर११ में बोलता ।
सुरत निरत भइ नेस१२, पवन नहिं डोलता ॥ ४ ॥
मन राते सतलोक, सिंध में गैब है ।
उलट मिले अनुराग, तहाँ नहिं ऐब है ॥ ५ ॥
(१) राख । (२) रैदास जी । (३) कबीर साहब । (४) नामदेव । (५) सेना भक्त ।
(६) नोट पृष्ठ २१ देखो । (७) सब्द के सिवाय सब पसारा ऊँट की बाव अर्थात् मिथ्या
है । (८) तीनों । (९) परदे में । (१०) तुम्हारी अपार छिमा और दया हुई । (११)
सत्तलोक । (१२) नेष्ठा ।